आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
२८ आल्हखण्ड । २६६ इतना सुनिकै रूपन बोले दोऊहाथजोरिशिरनाय १४५ ऐपनवारी बारी लै कै दूसर जाय आज महराज ॥ नैना भुन्ना औ दिल्ली में कीन्हे हमीं अकेले काज १४६ मूड़ कटावन हम जैबे ना मानो कही वीर मलखान ॥ इतना सुनिकै मलखे बोले ⁃हारीबात कहौ तुम ज्वान १४७ गदका बाना पटा बनेठी अइहैं कौन दिवस ये काज ॥ पहिले मुर्चा तुम्हीं कैकै राख्यो देशदेशमें लाज १४८ उदन वियाहे का रहिहैं ना बतियाँ कहिबे का रहिजायँ ॥ यहु दिनमिलिहैं फिरिकबहूंना तातेसोचिसमझिवतलाय १४६ इतना सुनिकै रूपन बोला ठाकुर सिरसा के सरदार ॥ घोड़ बेंडुला हमको देवो ऊदन केरि देउ तलवार १५० घोड़ बेंडुला को मँगवायो औ दैदीन ढाल तलवार ॥ ऐपनवारी बारी लै कै , बेंडुल ऊपर भयो असवार १५१ ऐंड़ा मसक्यो जब बेंडुलके तुरतै चला हवाकी चाल ॥ राजा नरपति के द्वारेपर रूपनपहुँचिगयोततकाल १५२ द्वारपालने तब ललकार्यो नाहर घोड़े के असवार ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ कहँ है देश रावरे क्यार १५३ इतना सुनिकै रूपन बोले तुम सुनि लेउ हमारो हाल ॥ देश हमारो नगर मोहोबा जहँपर बसैं रजा परिमाल १५४ छोटो भय्या जो आल्हा को बेटा देशराज को लाल ॥ कारी कन्या जो नरपति कै ब्याहनअयेरजापरिमाल १५५ ऐपनवारी हम लै आये रूपन बारी नाम हमार ॥ खबरि जनावो तुम राजा को बारी खड़ा तुम्हारे द्वार १५६ नेग आपने को झगरत है सो अब पड़े देयँ सरदार ॥
उदयसिंहका विवाह । २६७ २६ इतना सुनिकै द्वारपाल कह बारी घोड़े के असवार १५७ नेग बतावो तुम द्वारे का राजै सबऊ सुनावैं जाय ॥ इतना सुनिकै रूपन बोला तुमसों साँचदेयँ बतलाय १५८ चार घरीभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥ नेग - हमारो यह साँचा है याँच आय तुम्हारे द्वार १५६ सुनिकै बातें ये रूपन की बोला द्वारपाल ततकाल ॥ पीकै दारू द्वारे आये टेढ़ी बात कहै मतवाल १६० टरिजा टरिजा अब द्वारे ते ओ मतवाले जाति गँवार ॥ असगति नाहीं क्यहुराजा की द्वारे करै आय तलवार १६१ काल गाल माँ तू बैठा है मानै साँच बात यहिवार ॥ हवा खायकै ठंढे ह्वैकै बोलै घोड़े के असवार १६२ इतना सुनिकै रूपन बोला गरुई हाँक दीन ललकार ॥ हाथ सिपाही पर डारै ना जबलग मिलै ढूँढ़िसरदार १६३ हमका जानैं दिल्ली वाले जिनके द्वारकीन तलवार ॥ भुन्नागढ़ औ नैनागढ़ में द्वारे बही रक्तकी धार १६४ चारि रुपल्ली का नौकर तू टिलटिलटिलटिल रहा मचाय ॥ इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि सुनाई जाय १६५ जितनी गाथा रूपन बोले गासो यथातथ्य सब गाय ॥ सुनिकै बातें द्वारपाल की नरपति तुरतै उठा रिसाय १६६ हुकुम लगायो मकरन्दा ते बारी पकरि दिखावै आय ॥ विजयसिंह विजहट को राजा मकरँदसाथचला रिसियाय१६७ द्वारे दीख्यो जब रूपन को गरुई हाँक दीन ललकार ॥ खबरदार हो खबरदार हो बारी घोड़े के असवार १६८ काल गाल माँ तू बैठा है अबहीं जान चहत यमद्वार ॥
३० आल्हखण्ड । २६८ इतना सुनिकै विजयसिंहने अपनी खैंचिलई तलवार १६६ खैंचि सिरोही रूपन लीन्ह्यो द्वारे होन लगी तब मार ॥ अगल बगल में बेंदुल मारै रूपन खूब कीन तलवार १७० घायल ह्वैगे विजयसिंह जब तब सब बढ़े लड़ैया ज्वान ॥ दांतन काटै टापन मारै बेंदुल खूब कीन मैदान १७१ कोगति वरनै तहँाँ त्येनकै दोऊ हाथ करै तलवार ॥ रंग बिरंगे क्षत्री ह्वैगे मानो होली खेलैं गँवार १७२ कितन्यों क्षत्री घायल ह्वैगे कितन्यों गिरिगे खाय पछार ॥ मूंड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार १७३ बड़ी लड़ाई भै रूपन ते द्वारे बही रक्तकी धार ॥ देखि तमाशा त्यहि बारीका क्षत्री गये मनैमन हार १७४ ऐंड़ा मसक्यो फिरि बेंदुल कें फाटक पार पहुँचा जाय ॥ मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री चले पछारी धाय १७५ रूपन पहुँचा त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ॥ जितने क्षत्री नरवरगढ़के आये लौटि सबैकिसियाय १७६ जितनी गाथा रह द्वारे की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥ रूपन बारी की बातें सुनि भे मन खुशी बनाफररांय १७७ खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १७८ माथ नवायौं पितु अपने को ह्यँाँ ते करों तरँगको अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं माँगों यही भवानीकन्त १७६ इतिश्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भववुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतरूपनबिजम वर्णनौनामद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥
उदयसिंहका विवाह। २६६ ३१ सवैया ॥ दीनदयाल कृपाल भुवाल तुम्हीं सब काल करो रखवारी । मारीच सुबाहु सुरासुरनाहु तुम्हीं पल एकहि में संहारी ॥ बालिवली खरदूषण रावण आप हन्यो सबको धनुधारी । काम औ क्रोध औ लोभ हटाय करो ललिते रघुनाथ सुखारी १ सुमिरन ॥ दोउ पद वन्दौं भरतलालके जिनसम धन्यजगतकोआन ॥ बड़े पियारे रघुनन्दन के इनयशबालमीकि करगान १ भायप निबह्यो जस भारत जग आरत भये रामसों जाय ॥ राज्य न लीन्ही रघुनन्दन जब आपौ कीन योग घर आय २ सब जग ध्यावै रघुनन्दन को रघुवर करैं भरतको याद ॥ रघुवर लछिमन भरत शत्रुहन चहु ज्यहि भजैं छांड़िकै बाद ३ जो ज्यहि भावै सो त्यहि ध्यावै आवै सबै आपने काज ॥ क्यहू न ध्यावै सो दुखपावै औ बड़ होवै तासु अकाज ४ हमरे सर्वोपरि एकै हैं स्वामी रामचन्द्र महराज ॥ तिन्हें बिसारैं तौ दुखपावैं यह मन सदा हमारे राज ५ छूटि सुमिरनी गै रघुवर कै सुनिये नरवर केर हवाल ॥ ब्याह बखानैं उदयसिंह का लड़िहैं बड़े बड़े नरपाल ६ अथ कथाप्रसंग ॥ नरपति राजा नरवरगढ़ का भारी लाग राजदरवार ॥ बैठे छत्री अलबेला तहँ एकते एक शूर सरदार १ नरपति बोला मकरन्दा ते तुम सुत मानो कही हमार ॥ बड़े लड़ैया मोहबेवाले बारी भली कीन तलवार २ काह तुम्हारे अब मनमाँ है हमसे साँच देउ बतलाय ।
३२ आल्हखण्ड । २७० रारि बचैहौ की लड़िजैहौ तैसो जल्दी करी उपाय ३ इतना सुनिकै मकरँद बोला दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ हुकुम जो पावैं महाराजा को सबको बांधि दिखावैं आय ४ सुनिकै बातैं मकरन्दा की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥ तुरत नगड़ची को बुलवायो पुरमें डौंडी दीन पिटाय ५ हुकुम पायकै मकरन्दा का फौजैं होन लगीं तय्यार ॥ रण की मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ६ बाजे डंका अह्तंका के क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद उच्चार ७ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दुसरे बांधि लीन हथियार ॥ तिसर नगाड़ा के बाजत खन क्षत्री सबै भये तय्यार ८ मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ बैठ्यो घोड़ा पर मकरन्दा मनमें सुमिरि यशोदालाल ९ कूच करायो नरवरगढ़ ते पहुँच्यो समरभूमि मैदान ॥ गर्दा दीख्यो आसमान में बोल्यो यहां वीर मलखान १० यहु दल आवतहै नरपति का गर्दा छाय रही असमान ॥ सँभरो सँभरो ओ रजपूतौ हमरे करो बचन अब कान ११ इतना सुनिकै मोहबेवाले तुरतै बाँधि लीन हथियार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार १२ बड़िबड़ि तोपैं अष्टधातु की सो चरखिन में दीन चढ़ाय ॥ दुहूँ ओर ते गोला छूटे हाहाकार शब्द गा छाय १३ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के आधे सरग लिहे मड़राय ॥ गोला लागै ज्यहि घोड़े के धुनकततूलसरिसउड़िजाय १४ गोला लागै ज्यहि हाथी के मानो गिरा धौरहर आय ॥
उदयसिंहका विवाह । २७१ ३३ गोला लागै ज्यहि साँड़िया के तुरतै गिरै भूमि अललाय १५ जौने बैलके गोला लागै मानो मगर फुल्यावै खायँ ॥ जौने रथमाँ गोला लागै ताके टूक टूक द्वैजायँ १६ बड़ी दुर्दशा भै तोपन में धुवना रहा सरग में छाय ॥ दूनों दल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द द्वैजाय १७ उठीं बँदूकै बादलपूर की जो नब्बे कै याक बिकाय ॥ मघा के बूंदन गोली बरसें झरसैं सबै शूर त्यहि घाय १८ दूनों दल आगे को बढ़िगे रहिगा एक खेत मैदान ॥ भाला बरछी तलवारिन का लाग्यो होन घोर घमसान १६ अपन परावा कछु चीन्हैंना मारैं एक एक को जवान ॥ सूंढ़ि लपेटा हाथी भिड़िगे घोड़न भिरी रान में रान २० कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि कहुँ कहुँ देखि परै तलवार ॥ दूनों दिशिके रजपूतन ने कीन्ह्यो तहां भड़ामड़मार २१ चलै कटारी बूँदी वाली ऊना चलै विलाइति क्यार ॥ तेगा धमकैं बर्दवान के कटि कटि गिरैं शूरसरदार २२ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ रुधिर किसरिता तहँ बहिनिकरी जूझे क्षत्री अमित अपार २३ हाथी सोहैं त्यहि सरिता माँ छोटे दीपन्न के अनुमान ॥ परे बछेड़ा त्यहि नदिया माँ तिनको नदी कगाराजान २४ छुरी कटारी मछली ऐसीं ढालैं कछुवा परैं दिखाय ॥ वहैं सेवारा जस नदिया माँ तैसे बहे०गार तहँ जायँ २५ नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे मज्जैं भूत प्रेत बैताल ॥ परीं लहासैं जो मनइन की तिनकाखावैं श्वानशृगाल २६ बड़ी सनेही नरदेही में कहुँ कहुँ चढ़े काक खगजायँ ॥
१४ आल्हाखण्ड । २७२ नदी नेवांरा जस नर ख्यालैं तैसे काक कंक गतिभाय २७ को गति बरणै समरभूमि कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ जितने कायर रहें फौजन में तर लोथिन के रहे लुकाय २८ हेला आवै जब हाथिन का तब बिन मरे मौत व्हैजाय ॥ छाती धड़कै रण कायर कै सायरखुशीहोयअधिकाय २६ परम पियारी जिनके नारी आरी भये समर में आय ॥ कीरति प्यारी जिन क्षत्रिन के सम्मुख सहैं खड्ग के घाय ३० मकरँद ठाकुर मलखाने का परिगा समर बरोबरि आय ॥ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ लेवैं वार बचाय ३१ मकरँद बोले मलखाने ते ठाकुर लौटि धामको जाय ॥ वार हमारी ते बचिहै ना नाहक फँसे समर में आय ३२ सुनिकै बातें मकरन्दा की बोला बच्छराज को लाल ॥ बहिनि बियाहै तौ बचिजइहै नाहीं परे काल के गाल ३३ ज्यहिकी बिटिया सुन्दरि द्याखै त्यहिपर चढ़ै वीर मलखान ॥ बिना बियाहे घर नहिं जावै तजिकै कब्रों समर मैदान ३४ इतना सुनतै मकरँदठाकुर तुरतै खैंचि लीनि तलवार ॥ ऐंचिकै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ३५ सुमिरि भवानी शिवशङ्करको मारी साँग वीरमलखान ॥ मूड़ बिसानी सो घोड़ा के घोड़ा भाग्यो लिहे परान २६ सवैया ॥ भागिगयो [गोल्ह] तबै अरु जायकै धाममें बेगि विराजा । काटक छोड़ औ सेल शनीचर वाण अजीत लियो जय काजा ॥ मालिनि धाम गयो फिरि धाय बुलाय चल्यो रण साजिसमाजा । आगयो रणखेतन में ललिते मकरन्द बली फिरि गाजा ३७
This image is completely blank and contains no visible text to transcribe.
३६ आल्हाखण्ड । २७४ ऊदन मारैं तलवारी सों बेंदुल हनै टाप के घाय ४८ यकइस हाथी असवारन को ऊदन दीन्ह्यो तुरत सुलाय ॥ ऊदन ठाकुर के मोर्चापर कउ राजपूत न रोंकै पायँ ४९ देखि वीरता बघऊदन की मकरँद दौरा गुर्ज उठाय ॥ यह गति दीख्यो मकरन्दा कै हिरियाबोली शीशनवाय ५० हमका लाये तुम काहे को जो अब दौरै गुर्ज उठाय ॥ जादू डारों बङ्गाले की इनकी कैद लेउ करवाय ५१ इतना कहिकै हिरिया मालिनि औ ऊदनपर डरा मशान ॥ मकरँद ठाकुर त्यहि समया में तुरतै बांधि लीन तहँ आन ५२ गा हरकारा तब आल्हा ढिग औ रण हाल बतावा जाय ॥ आल्हा बोले तब देवा ते तुम इन्दल का लवो बुलाय ५३ इतना सुनतै देवा ठाकुर अपने घोड़ भयो असवार ॥ माथ नवायो सो आल्हा को अपनी लई ढाल तलवार ५४ देवा चलिभा ह्याँ तम्बू ते दशहरिपुरै पहुँचा जाय ॥ जीति के डंका बाजन लागे मकरँद कूच दीन करवाय ५५ बड़ी खुशाली नरपति कीन्ह्यो हिरिये द्रव्यदियो अधिकाय ॥ देवा भेटा ह्याँ सुनवाँ का सबियाँहालगयोफिरिगाय ५६ देवा भेटा फिरि द्यावलि को दोऊ चरणन शीशनवाय ॥ कही हकीकति सब नरवर की देवलि गिरी मूर्च्छा खाय ५७ कैदी द्वैगे बघऊदन जो पकरे गये सबै सरदार ॥ मोहिं अभागिनि के बेड़ा को अवधौं कौन लगावै पार ५८ इतना देवलि के कहतै खन इन्दल तहाँ पहुँचाआय ॥ हाथ जोरिकै सो देवा के बोल्यो चरणनशीशनवाय ५६ कहौ हकीकति तुम चाचा की नरवर हाल देउ बतलाय ॥
उदयसिंहका विवाह । २७५ ३७ देवा बोला तहँ इन्दल ते बेटा कही बूत ना जाय ६० हिरिया मालिनि की जादूते पकड़े गये उदयसिंहराय ॥ जे व्यवहारी तुम्हरे दिशि के मकरँद कैद लीन करवाय ६१ घोड़ी जख्मी भै मलखे कै आल्हा पठयो तुम्हें बुलाय ॥ इतना सुनिकै इन्दल बोले सबकी कैद देउँ छुड़वाय ६२ हुकुम जो पावों महतारी को दादा चरण विलोकों जाय ॥ काह हकीकति है मालिनि कै सम्मुख लड़ै हमारे आय ६३ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटै बार बार समझाय ॥ पिता आज्ञा रघुनन्दन करि चौदह बर्ष रहे बनजाय ६४ कौन सिखाई सुत अपने को तुम ना करो पिताके बैन ॥ कही न मानैं पितु अपने की तेई गिरैं नरकके ऐन ६५ जैसे देवता पति नारी को तैसे पिता पुत्र को देव ॥ नीके जानैं धर्म शास्त्र जे ते नित करें पिता की सेव ६६ तेई सपूते नर बाजत हैं जिनके पिता बचन विशवाश ॥ कौन भरोसा नरदेही का कलियुग कौन जियनकी आश ६७ पिताहितैषी जग सब को है अपनो हुनर देय बतलाय ॥ रहै लालसा पितु उरमाहीं हमसों पुत्रहोय अधिकाय ६८ जे नहिं मानैं पितु अपने को तेई नीच जगत में भाय ॥ येई कुलीने अकुलीने के लक्षण साफपरै दिखलाय ६९ निन्दक होवैं रघुनन्दन को तासों कौन हमारो नात ॥ नेही गेही नरदेही का जगमें साँचो राम लखात ७० इतना सुनिकै इन्दलठाकुर देवी चरण शरण गा धाय ॥ विनय सुनाई भल देवी को पढ़िपढ़िवेदऋचनको भाय ७१ बरंबुहिभै तब मठिया ते इन्दल बोल्यो शीश नवाय ॥
आल्हाखण्ड । २७६ विजय हमारी नरवर होवै तुम सुनिलेउ शारदामाय ७२ एवमस्तु भा फिरि मठिया माँ इन्दल चलिभा शीशनवाय ॥ आयसु माँग्यो फिरि माता ते सुनवाँलीन्ह्यो हृदयलगाय ७३ यन्त्र बांधिकै भुजदण्डन में मस्तक रचना दियोलगाय ॥ पढ़ि पढ़ि रक्षाके मन्त्रन को भूली जादू दीन बताय ७४ घोड़ करिलिया आल्हावाला इन्दल तुरत लीन कसवाय ॥ विदा मांगिकै महतारी सों देवा साथ चले हरषाय ७५ देवी चलिकै मठभीतर सों नरवर गढ़ै पहुंची आय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता लीन्ह्योसेल शनीचरजाय ७६ किरपा करिकै जगदम्बा तहँ चेतन कीन फौजको जाय ॥ इन्दल पहुंचे जब तम्बू में आल्हालीन्ह्यो गोदबिठाय ७७ चूम्यो चाट्यो हृदय लगायो औ सब दीन्ह्यो कथासुनाय ॥ इन्दल बोल्यो तब आल्हा ते दादा सत्य देयँ बतलाय ७८ करो तयारी अब नरवर की सबकी कैद लेयँ छुड़वाय ॥ ठाढ़ो हाथी पचशब्दा था आल्हा तुरत लीन सजवाय ७९ बैठे हाथी आल्हाठाकुर इन्दल तुरत भये तय्यार ॥ बैठ कबूतरी पर मलखाने देवा भयो घोड़ असवार ८० मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रथ्वा चले पवनकी चाल ८१ कूचकराये आल्हा ठाकुर नरवरगढ़ै चले ततकाल ॥ कउ कउ घोड़ा हिरनचाल पर कउ कउ चलैं मोरकी चाल ८२ कउ कउ घोड़ा हंस चालपर कउ कउ सरपट रहे भगाय ॥ कदम चालपर कोऊ घोड़ा केहू टाप न परै सुनाय ८३ या विधि छैला अलबेला सब पहुँचे समरभूमि में जाय ॥
उदयसिंहका विवाह । २७७ १५
गा हरिकारा तब नरवरमें राजै खबरि दीन बतलाय ८४ गाफिल बैठे का महराजा शिरपर फौज पहूँची आय ॥ सुनिकै बातें हरिकारा की राजा गये सनाकाखाय ८५ आज्ञा दीन्ह्यो मकरन्दा को जावो समरभूमि तुम धाय ॥ इतना सुनतै मकरँद चलिभा तुरतै राजै शीश नवाय ८६ बाण अजीता सेल शनीचर ढूँढ़्यो घोड़ काठको जाय ॥ पता न पायो इन काहूका लाग्यो बार बार पछिताय ८७ हिरिया मालिनि के घर पहुँचा लीन्ह्यो ताको संग लिवाय ॥ चलि मकरन्दा भा नरवरते पहुँचा समरभूमि में आय ८८ आगे घोड़ा मकरन्दा का पाछे सकल सेन समुदाय ॥ ऐसी आगे इन्दल ठाकुर पहुँच्यो समरभूमिमें आय ८६ इन्दल बोल्यो मकरन्दा ते मामा काह गयो बौराय ॥ भाँवरि कैद्यो म्वरे चाचाकी चाची घरै देउ पठवाय ६० जीति न पैहौ कुल पूज्यनते मामा साँच दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये इन्दल की मकरँद बोला बचनरिसाय ६१ सुनवाँ भौजी के बालकतूम इन्दल बेटा लगो हमार ॥ समर जो करिहौ तुम फूफा ते जैहौ अवशि यमनके द्वार ६२ इतना कहिकै मकरँद ठाकुर तुरतै खैंचिलीन तलवार ॥ रान रान सों घोड़ा भिड़िगे ऊंटन भिड़िगै ऊंट कतार ६३ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन क्यार ॥ तेगा छूटे बर्दवान के कोताखानी चलीं कटार ६४ भाला बलछिनकी मारुइ कहुँ कहुँ कहुँ कड़ावीन की मार ॥ चलै भुजाली कहुँ कहुँ गद्दर कहुँकहुँकठिनचलैतलवार ६५ छूटे भाला बलछी सोहैं पै जस खेत बाजरे क्यार ॥
३. तृतीय भाग: बेला का विवाह, सिरसा की लड़ाई व मलखान का वीर-गति
मुण्डन केरे मुड़ चौरा मे औ रुण्डनके लगे पहार ६६ बड़ी लड़ाई भै नत्वर में मकरँद इन्दल के मैदान ॥ बड़े लड़ैया दूनों ठाकुर रणमाँ करें घोर घमसान ६७ मकरँद बोला तहँ हिरिया ते यहिपर छाँड़ो घोर मशान ॥ इतना सुनतै इन्दल ठाकुर हिरिया पास पहुँचा ज्वान ६८ पकरिकै जूरा त्यहि हिरियाको इन्दल काटिलीन ततकाल ॥ जादू झूठी भईं हिरिया की तुरतै हैगै हाल बिहाल ६६ देखि दुर्दशा यह हिरिया कै मकरँद खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचिकै मारा सो इन्दल के इन्दल लीन ढालपर वार १०० बचा कुँवरुवा आल्हावाला त्यहिका राखिलीन भगवान ॥ औ ललकारा मकरन्दा को मामा मौत आपनी जान १०१ ढाल कि औझरि इन्दलमारा मकरँद गिरा मूरछाखाय ॥ उतरिकै घोड़ी ते मलखाने तुरतै मुशकलीन बँधवाय १०२ मकरँद बँधिगे समरभूमि में भगिगे सबै सिपाही ज्वान ॥ कोउन रहिगा त्यहि समया में जो क्षण एक करै मैदान १०३ कूच करायो आल्हा ठाकुर तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ खबरि पाय कै नरपति राजा तुरतै गयो सनाकाखाय १०४ कछू न सूझी तब नरपति को अपने मंत्री लये बुलाय ॥ मंत्र पूँछिकै तिन मंत्रिन सों आल्हा पास पहुँचे आय १०५ हाथ जोरिकै नरपति बोले मानो कही बनाफरराय ॥ कैद छुड़ायो सुत हमरे की अपने शूर लेउ छुड़वाय १०६ बेटी ब्याहैं हम ऊदन को सुख सों लौटि मोहोवे जाउ ॥ दगा जो राखै तुम्हरे सँग माँ नरपति कह्यो हमारो नाउँ १०७ सुनिकै बातें ये नरपति की आल्हा मकरँद दीन छुड़ाय ॥
उदयसिंहका विवाह । २७६ ४१ जायके छांड़्यो राजा सबको तम्बु गयो यऊ सब आय १०८ साइति शोधी चूड़ामणि ने आल्है खबरि दीन पहुँचाय ॥ कालिह सबेरे भौंरी हैहैं नरपति खबरिगये यहपाय १०९ इतना सुनिकै माहिल चलिभा लिल्ली घोड़ीपर असवार ॥ जायकै पहुँचा नरवरगढ़ में जहँपर नरपति का दरबार ११० बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥ माहिल बोले तहँ राजा ते मानो कही हमारी भाय १११ शूर छिपावो तुम महलन में भौरिन कटा देउ करवाय ॥ जाति बनाफर की नीची है हल्ला देशदेश अधिकाय ११२ पानी पीहै कोउ तुम्हरे ना मानो नरवर के महराज ॥ पगिया अरझी नहिं माहिलकै भावै तौन करो तुमकाज ११३ इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ तैसे कीन्ह्यो नरपति राजा जैसे माहिल गये बताय ११४ माड़ो छायो मालिन तुरतै राजै खम्भ दीन गड़वाय ॥ गऊ के गोबर आँगन लीप्यो बारिनि तुरततहांपरआय ११५ चौक बनावन प्रोहित लाग्यो आई नगर सुहागिल धाय ॥ ब्याह गीत सब गावन लागीं उत्सवदेखिपरे अधिकाय ११६ तब मकरन्दा को बुलवायो नरपति हालकह्यो समुझाय ॥ लैके नेगी तुम चलिजावो घरके ठाकुर लवो बुलाय ११७ इतना सुनिकै मकरँद चलिभा नाई बारी सङ्ग लिवाय ॥ जायकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ११८ हाथ जोरिकै मकरँद बोल्यो जो कछु राजै दीन सिखाय ॥ दशै आदमी भौरिन आवैं यहजब सुन्यो बनाफरराय ११९ विस्मय कीन्ह्यो आल्हा मनमों मकरँद फेरि कहा समुझाय ॥
[Header] ४२ माहलखण्ड । १८०
रारि करैया को तुमते है हमहूँलड़िभिड़िगयनअघाय १२० इतना सुनिकै मलखे बोले मानी बात तुम्हारी भाय ॥ दशही चलिहैं अब भौंरिन में आल्है हुकुम दीन फर्माय १२१ मलखे सुलखे देवौं आल्हों इन्दलैं तुरत भयो तय्यार ॥ जोगाँ भोगाँ मन्नाँ ब्रह्माँ जंगनिक भैन चँदेलेक्यार १२२ चढ़ि चढ़ि घोड़ा हाथिन ठाकुर मड़येतर को भये तयार ॥ सुमिरि शारदा मइहरवाली ऊदनपलकी भे असवार १२३ नरपति राजा के द्वारेपर पहुँचे तुरत बनाफरराय ॥ मकरँद ठाकुर सब बीरन को घरके भीतरगयो लिवाय १२४ फाटक बन्दीकरि नरपति ने कन्या तुरत लीन बुलवाय ॥ वर औ कन्या इकठौरी भे भौरिनसमयगयोतहँआय १२५ फुलवा ऊदन का गठिबन्धन नाइनि बारिनि दीन कराय ॥ पग परछाल्यो नरपति राजा कन्या दान दीन हरषाय १२६ पहिली भाँवरिके परतै खन सबियाँ शूर गये तहँ आय ॥ मारु मारु का हल्ला हैगा येऊ उठे तड़ाका धाय १२७ आधे आँगन भाँवरि होवैं आधे चलन लागि तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के आँगन बही रक्तकी धार १२८ कोगति बरणै राजपूतन कै मानैं नहीं नेकहू हार ॥ ना मुँह फेरैं नरवलवाले ना ई मोहवे के सरदार १२६ बड़ी गचापच भै आँगन में मुण्डन लागे ऊंच पहार ॥ जोगा भोगा दोनों भाई दोनों हाथ करैं तलवार १३० बड़ा लड़ैया मकरँद ठाकुर आँगन भली मचाई रार ॥ जीति न दीख्यो इन दशहूँ ते नरपति गयो हियेसोंहार १३१ हाथ जोरिकै नरपति बोल्यो मानो कही बनाफरराय ?'
[Header] उदयसिंहका विवाह । २८१ ९३
बाजी लरिका मकरन्दा है ज्यहियहदीन्ह्यो रारिमचाय १३२ स्याबसिस्याबसि तुमेकाआल्हा काहे न विजयहोय सबकाल ॥ मलखे सुलखे जिनके भाई नामी बच्छराजके लाल १३३ मेलजोल भा दुहुँ तरफा ते हैगै मारु बन्द त्यहिकाल ॥ सातौ भाँवरि फुलवा सँगमें घूमी देशराज के लाल १३४ राजा नरपति के महलन में तुरतै भात भयो तय्यार ॥ भयो बुलौवा फिरि क्षत्रिनको पहुँचे मोहबे के सरदार १३५ जेंवन बैठे आल्हा ऊदन तबहूँ चलनलागि तलवार ॥ गेडुवा पाटन की मारुन में सबियाँ शूरगये तहँ हार १३६ कीनि नम्रता फिरि नरपतिने बेटी बिदा दीन करवाय ॥ दायज दीन्ह्यो भल नरपतिने आल्हासबधनदीनलुटाय१३७ उठी पालकी नृप द्वारेते तम्बुन फेरि पहुँची आय ॥ कूचको डङ्का बाजन लाग्यो हाहाकार शब्द गोहाय १३८ खीमा उखरे रजपूतन के सो छकरन में लिये लदाय ॥ कूच करायो नरवरगढ़ते मोहबे चले शूर समुदाय १३६ बारा दिनका धावाकरिकै दशहरिपुरै पहुँचे आय ॥ दगैं सलामी तहँ आल्हाकी सुनवाँचढ़ी अटापरधाय १४० दीख कबूतरी पर मलखाने बेंदुल चढ़ा लहुरखाभाय ॥ आल्हा इन्दल इक हौदा पर सुनवाँ गई द्वारपर आय १४१ पलकी आई तहँ फुलवा की नारिन कीन नेग सबगाय ॥ घर के भीतर के जानेकी पण्डितसाइतिदीनबताय १४२ बधू पुत्र घर भीतर गमने द्यावलि रूपन लीन बुलाय ॥ जल्दी जावो तुम मोहबे को मल्हनेखबरिजनावोजाय १४३ इतना सुनिकै रुपना चलिभा मल्हना महल पहुँचाआय ॥
९४ आल्हखण्ड । २८२ खबरि सुनाई सब मल्हना को रूपना वारबार शिरनाय १४४ बारह रानी परिमालिक की अपने कीन सबन श्रृंगार ॥ मनियादेवन को सुमिरन करि पलकी उपरभई असवार १४५ आल्हा ऊदनके महलन में रानी गई तड़ाका आय ॥ रूप देखिकै तहँ फुलवा को रानिनखुशीभईअधिकाय १४६ विदा माँगिकै न्यवतहरी सब अपने नगर चले ततकाल ॥ बाजत डङ्का अहतङ्का के पहुँचतभयेनगरनरपाल १४७ पूर मनोरथ भे ऊदन के घर घर भयो मंगलाचार ॥ ब्याह पूरभा अब फुलवा का सोये सबै शूरसरदार १४८ खेत छूटि गा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाकरकेर ॥ तुम सों ब्रह्मा यह मागतहौं सबविधिअपनिदीनताहेर १४९ नदी औ पर्वत चहु जंगल में कतहूँ जाय लेउँ अवतार ॥ तहँ तहँ स्वामी रघुबर होवें चाहौं यही सृष्टि कर्त्तार १५० करों बन्दना पितु अपने की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायणभाय १५१ बढ़े साहिबी दिन दिन दूनी औ कविकरैं सुयशको गान ॥ ललिते ऐसे नर दुर्बल को करतो कौन और सनमान १५२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललितेके तबलों तुम यशसोंरहौ सदा भरपूर १५३ माथ नवायौं शिवशंकर को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५४ इति श्रीलखनऊनिवार्सि(सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रागनारायण जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपा- ऽनु पण्डितललिताप्रसादकृतउदनपाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः॥ ३॥ इति उदयसिंहका विवाह सम्पूर्ण ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ चन्द्रावलिकी चौथि अथवा बौरीगढ़की लड़ाई ॥ सवैया ॥ शेष महेश गणेश रमेश धनेश सुरेश दिनेश मनावैं । बावन पावन धोवन को सुखकारि पुरारि धरे सुखपावैं ॥ सोई भये जमदग्नि के बंश औ पूरण अंश पुराण बतावैं । वोई भये रघुनन्दन भूप सो रूप लखे ललिते मुद पावैं १ सुमिरन ॥ धन्य बखानों मैं दिनकर को जिनते पढ़ा बीर हनुमान ॥ तिनके कुलमाँ रघुनन्दन भे जिनकोजानतसकलजहान १ तिनको मानत हम परमेश्वर पूर्ण ब्रह्म सुरासुरपाल ॥ चारो प्यारे नृप दशरथ के कीन्हेनिबाल रूप जो ख्याल २ सोई धारे उर गिरिजापति मनमें बालरूप के हाल ॥ काकभुशुण्डी कौवा तन को मुनि सों मांगि लीनसत्रकाल ३ कितन्यो राजा सिंहासन तजि इनके परे प्रेम के जाल ॥ सुन्यो बिभीषण की गाथा है शरणहिताकत भयो निहाल ४
२ आल्हाखण्ड । २८४ सोई ललिते जब उर आवै जावैं सबै लोक जंजाल ॥ चौथि बखानों चन्द्रावलि की सुनिये ताको पूर हवाल ५ अथ कथाप्रसङ्ग ॥ लागो सावन मनभावन जब वर्षन मेघ झमाझम लाग ॥ दुःख छूटिगा नर नारिन का उपजा हिये प्रेम अनुराग १ गड़े हिंडोला सब घर घर हैं दर दर झुंड खड़े अधिकार ॥ सावन आवन मनभावन की गावन लागीं गीत बहार २ कजली जाहिर मिर्जापुर की सिर्जा जनों वहाँ कर्त्तार ॥ गड़ैं हिंडोला कोशलपुर में अबहूँ देखें लोग बहार ३ सोई महीना जब आवत भा तब मल्हना को सुनो हवाल ॥ बेटी प्यारी चन्द्रावलि जो ताको शोच करै सब काल ४ नयनन आँसू ढरकन लागे बयनन कढ़े चित्त घबड़ाय ॥ ऐसी हालत मै मल्हना कै तबहीं गये उदयसिंहआय ५ लखिअसहालत उदयसिंह तब दोऊ हाथजोरि शिरनाय ॥ पूँछन लागे महरानी ते काहे गई उदासी छाय ६ सुनिकै बातें उदयसिंह की मल्हना बोली बचन बनाय ॥ याद आयगै लरिकाई कै सोई बात गई उरछाय ७ ताहि विसूरति मैं ऊदन थी सोई गई उदासी छाय ॥ सखी हमारी एक साथ की पायो दुःख रहै अधिकाय ८ दुःख याद हो जब काहू को कोमल चित्त जाय घबड़ाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले माता साँच देउ बतलाय ६ आजुइ तुमका अस देखा ना बहुदिन लखातुम्हें असमाय ॥ की विप देवो उदयसिंह को की दुख देवो साँच बताय १० करो बहाना चहू केते तुम मानी नहीं लहुरवा भाय ॥
चन्दावलि की चौथि। २८५ ३ इतना सुनिकै मल्हना बोली ऊदन साँच देयँ बतलाय ११ लाग महीना अब सावन को गावन लगे नारि नर गीत ॥ सुधि जब आवै चन्द्रावलि की तबहीं लेय मोह दलजीत १२ कठिन यादवा बौरीगढ़के जिनके लूटि मार का काम ॥ बेटी ब्याही तिनके घरमाँ कबहुँन लखी आपनोधाम १३ चौथि पठावैं जो बौरीगढ़ तौ फिर होय वहाँ पर मार ॥ है बहनोई इन्द्रशाह तब ताके परी बांट है रार १४ गउना रउना सबके आवैं बेटी परी मोरि ससुराल ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले माता मानो कही हमार १५ चौथी लैके बौरी जैबै बहिनी बिदा लेव करवाय ॥ अब मैं जावों महाराजा ढिग माँगों बिदा बेगिही जाय १६ इतना सुनिकै मल्हना बोली मानो कही बनाफरराय ॥ मोहिं पियारी अस बेटी ना जो तुम जाउ लहुरवा भाय १७ कछु तुम कहियो ना राजाते ना बौरी को होउ तयार ॥ प्राण पियारे तुम ऊदनहौ साँची मानो कही हमार १८ सुनिकै बातें ये मल्हना की ऊदन चले जहाँ परिमाल ॥ हाथ जोरिकै उदयसिंहने औ राजाते कहा हवाल १६ हम अब जैहैं बौरीगढ़ को बहिनी बिदा करैहैं जाय ॥ कहा न मानब हम काहूको राजन हुकुम देउ फरमाय २० बातैं सुनिकै बघऊदन की तुरतै उठा चँदेलाराय ॥ साथै लैके बघऊदन को फिरि रनिवास पहुँचाआय २१ डाटन लाग्यो तहँ मल्हनाको री कस जौहर दीन लगाय ॥ ऊदन जैहैं चलिबौरी को बेटी बिदा करैहैं जाय २२ इवैं लुटेरा बौरी वाले ओ बइलानी बात बनाय ॥