भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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पृष्ठ 278

उदयसिंहका विवाह । २७५ ३७ देवा बोला तहँ इन्दल ते बेटा कही बूत ना जाय ६० हिरिया मालिनि की जादूते पकड़े गये उदयसिंहराय ॥ जे व्यवहारी तुम्हरे दिशि के मकरँद कैद लीन करवाय ६१ घोड़ी जख्मी भै मलखे कै आल्हा पठयो तुम्हें बुलाय ॥ इतना सुनिकै इन्दल बोले सबकी कैद देउँ छुड़वाय ६२ हुकुम जो पावों महतारी को दादा चरण विलोकों जाय ॥ काह हकीकति है मालिनि कै सम्मुख लड़ै हमारे आय ६३ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटै बार बार समझाय ॥ पिता आज्ञा रघुनन्दन करि चौदह बर्ष रहे बनजाय ६४ कौन सिखाई सुत अपने को तुम ना करो पिताके बैन ॥ कही न मानैं पितु अपने की तेई गिरैं नरकके ऐन ६५ जैसे देवता पति नारी को तैसे पिता पुत्र को देव ॥ नीके जानैं धर्म शास्त्र जे ते नित करें पिता की सेव ६६ तेई सपूते नर बाजत हैं जिनके पिता बचन विशवाश ॥ कौन भरोसा नरदेही का कलियुग कौन जियनकी आश ६७ पिताहितैषी जग सब को है अपनो हुनर देय बतलाय ॥ रहै लालसा पितु उरमाहीं हमसों पुत्रहोय अधिकाय ६८ जे नहिं मानैं पितु अपने को तेई नीच जगत में भाय ॥ येई कुलीने अकुलीने के लक्षण साफपरै दिखलाय ६९ निन्दक होवैं रघुनन्दन को तासों कौन हमारो नात ॥ नेही गेही नरदेही का जगमें साँचो राम लखात ७० इतना सुनिकै इन्दलठाकुर देवी चरण शरण गा धाय ॥ विनय सुनाई भल देवी को पढ़िपढ़िवेदऋचनको भाय ७१ बरंबुहिभै तब मठिया ते इन्दल बोल्यो शीश नवाय ॥