आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ आल्हाखण्ड । २७४ ऊदन मारैं तलवारी सों बेंदुल हनै टाप के घाय ४८ यकइस हाथी असवारन को ऊदन दीन्ह्यो तुरत सुलाय ॥ ऊदन ठाकुर के मोर्चापर कउ राजपूत न रोंकै पायँ ४९ देखि वीरता बघऊदन की मकरँद दौरा गुर्ज उठाय ॥ यह गति दीख्यो मकरन्दा कै हिरियाबोली शीशनवाय ५० हमका लाये तुम काहे को जो अब दौरै गुर्ज उठाय ॥ जादू डारों बङ्गाले की इनकी कैद लेउ करवाय ५१ इतना कहिकै हिरिया मालिनि औ ऊदनपर डरा मशान ॥ मकरँद ठाकुर त्यहि समया में तुरतै बांधि लीन तहँ आन ५२ गा हरकारा तब आल्हा ढिग औ रण हाल बतावा जाय ॥ आल्हा बोले तब देवा ते तुम इन्दल का लवो बुलाय ५३ इतना सुनतै देवा ठाकुर अपने घोड़ भयो असवार ॥ माथ नवायो सो आल्हा को अपनी लई ढाल तलवार ५४ देवा चलिभा ह्याँ तम्बू ते दशहरिपुरै पहुँचा जाय ॥ जीति के डंका बाजन लागे मकरँद कूच दीन करवाय ५५ बड़ी खुशाली नरपति कीन्ह्यो हिरिये द्रव्यदियो अधिकाय ॥ देवा भेटा ह्याँ सुनवाँ का सबियाँहालगयोफिरिगाय ५६ देवा भेटा फिरि द्यावलि को दोऊ चरणन शीशनवाय ॥ कही हकीकति सब नरवर की देवलि गिरी मूर्च्छा खाय ५७ कैदी द्वैगे बघऊदन जो पकरे गये सबै सरदार ॥ मोहिं अभागिनि के बेड़ा को अवधौं कौन लगावै पार ५८ इतना देवलि के कहतै खन इन्दल तहाँ पहुँचाआय ॥ हाथ जोरिकै सो देवा के बोल्यो चरणनशीशनवाय ५६ कहौ हकीकति तुम चाचा की नरवर हाल देउ बतलाय ॥