आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाखण्ड । २७६ विजय हमारी नरवर होवै तुम सुनिलेउ शारदामाय ७२ एवमस्तु भा फिरि मठिया माँ इन्दल चलिभा शीशनवाय ॥ आयसु माँग्यो फिरि माता ते सुनवाँलीन्ह्यो हृदयलगाय ७३ यन्त्र बांधिकै भुजदण्डन में मस्तक रचना दियोलगाय ॥ पढ़ि पढ़ि रक्षाके मन्त्रन को भूली जादू दीन बताय ७४ घोड़ करिलिया आल्हावाला इन्दल तुरत लीन कसवाय ॥ विदा मांगिकै महतारी सों देवा साथ चले हरषाय ७५ देवी चलिकै मठभीतर सों नरवर गढ़ै पहुंची आय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता लीन्ह्योसेल शनीचरजाय ७६ किरपा करिकै जगदम्बा तहँ चेतन कीन फौजको जाय ॥ इन्दल पहुंचे जब तम्बू में आल्हालीन्ह्यो गोदबिठाय ७७ चूम्यो चाट्यो हृदय लगायो औ सब दीन्ह्यो कथासुनाय ॥ इन्दल बोल्यो तब आल्हा ते दादा सत्य देयँ बतलाय ७८ करो तयारी अब नरवर की सबकी कैद लेयँ छुड़वाय ॥ ठाढ़ो हाथी पचशब्दा था आल्हा तुरत लीन सजवाय ७९ बैठे हाथी आल्हाठाकुर इन्दल तुरत भये तय्यार ॥ बैठ कबूतरी पर मलखाने देवा भयो घोड़ असवार ८० मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रथ्वा चले पवनकी चाल ८१ कूचकराये आल्हा ठाकुर नरवरगढ़ै चले ततकाल ॥ कउ कउ घोड़ा हिरनचाल पर कउ कउ चलैं मोरकी चाल ८२ कउ कउ घोड़ा हंस चालपर कउ कउ सरपट रहे भगाय ॥ कदम चालपर कोऊ घोड़ा केहू टाप न परै सुनाय ८३ या विधि छैला अलबेला सब पहुँचे समरभूमि में जाय ॥