आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ आल्हखण्ड । २७० रारि बचैहौ की लड़िजैहौ तैसो जल्दी करी उपाय ३ इतना सुनिकै मकरँद बोला दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ हुकुम जो पावैं महाराजा को सबको बांधि दिखावैं आय ४ सुनिकै बातैं मकरन्दा की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥ तुरत नगड़ची को बुलवायो पुरमें डौंडी दीन पिटाय ५ हुकुम पायकै मकरन्दा का फौजैं होन लगीं तय्यार ॥ रण की मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ६ बाजे डंका अह्तंका के क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद उच्चार ७ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दुसरे बांधि लीन हथियार ॥ तिसर नगाड़ा के बाजत खन क्षत्री सबै भये तय्यार ८ मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ बैठ्यो घोड़ा पर मकरन्दा मनमें सुमिरि यशोदालाल ९ कूच करायो नरवरगढ़ ते पहुँच्यो समरभूमि मैदान ॥ गर्दा दीख्यो आसमान में बोल्यो यहां वीर मलखान १० यहु दल आवतहै नरपति का गर्दा छाय रही असमान ॥ सँभरो सँभरो ओ रजपूतौ हमरे करो बचन अब कान ११ इतना सुनिकै मोहबेवाले तुरतै बाँधि लीन हथियार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार १२ बड़िबड़ि तोपैं अष्टधातु की सो चरखिन में दीन चढ़ाय ॥ दुहूँ ओर ते गोला छूटे हाहाकार शब्द गा छाय १३ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के आधे सरग लिहे मड़राय ॥ गोला लागै ज्यहि घोड़े के धुनकततूलसरिसउड़िजाय १४ गोला लागै ज्यहि हाथी के मानो गिरा धौरहर आय ॥