आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउदयसिंहका विवाह। २६६ ३१ सवैया ॥ दीनदयाल कृपाल भुवाल तुम्हीं सब काल करो रखवारी । मारीच सुबाहु सुरासुरनाहु तुम्हीं पल एकहि में संहारी ॥ बालिवली खरदूषण रावण आप हन्यो सबको धनुधारी । काम औ क्रोध औ लोभ हटाय करो ललिते रघुनाथ सुखारी १ सुमिरन ॥ दोउ पद वन्दौं भरतलालके जिनसम धन्यजगतकोआन ॥ बड़े पियारे रघुनन्दन के इनयशबालमीकि करगान १ भायप निबह्यो जस भारत जग आरत भये रामसों जाय ॥ राज्य न लीन्ही रघुनन्दन जब आपौ कीन योग घर आय २ सब जग ध्यावै रघुनन्दन को रघुवर करैं भरतको याद ॥ रघुवर लछिमन भरत शत्रुहन चहु ज्यहि भजैं छांड़िकै बाद ३ जो ज्यहि भावै सो त्यहि ध्यावै आवै सबै आपने काज ॥ क्यहू न ध्यावै सो दुखपावै औ बड़ होवै तासु अकाज ४ हमरे सर्वोपरि एकै हैं स्वामी रामचन्द्र महराज ॥ तिन्हें बिसारैं तौ दुखपावैं यह मन सदा हमारे राज ५ छूटि सुमिरनी गै रघुवर कै सुनिये नरवर केर हवाल ॥ ब्याह बखानैं उदयसिंह का लड़िहैं बड़े बड़े नरपाल ६ अथ कथाप्रसंग ॥ नरपति राजा नरवरगढ़ का भारी लाग राजदरवार ॥ बैठे छत्री अलबेला तहँ एकते एक शूर सरदार १ नरपति बोला मकरन्दा ते तुम सुत मानो कही हमार ॥ बड़े लड़ैया मोहबेवाले बारी भली कीन तलवार २ काह तुम्हारे अब मनमाँ है हमसे साँच देउ बतलाय ।