भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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३० आल्हखण्ड । २६८ इतना सुनिकै विजयसिंहने अपनी खैंचिलई तलवार १६६ खैंचि सिरोही रूपन लीन्ह्यो द्वारे होन लगी तब मार ॥ अगल बगल में बेंदुल मारै रूपन खूब कीन तलवार १७० घायल ह्वैगे विजयसिंह जब तब सब बढ़े लड़ैया ज्वान ॥ दांतन काटै टापन मारै बेंदुल खूब कीन मैदान १७१ कोगति वरनै तहँाँ त्येनकै दोऊ हाथ करै तलवार ॥ रंग बिरंगे क्षत्री ह्वैगे मानो होली खेलैं गँवार १७२ कितन्यों क्षत्री घायल ह्वैगे कितन्यों गिरिगे खाय पछार ॥ मूंड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार १७३ बड़ी लड़ाई भै रूपन ते द्वारे बही रक्तकी धार ॥ देखि तमाशा त्यहि बारीका क्षत्री गये मनैमन हार १७४ ऐंड़ा मसक्यो फिरि बेंदुल कें फाटक पार पहुँचा जाय ॥ मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री चले पछारी धाय १७५ रूपन पहुँचा त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ॥ जितने क्षत्री नरवरगढ़के आये लौटि सबैकिसियाय १७६ जितनी गाथा रह द्वारे की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥ रूपन बारी की बातें सुनि भे मन खुशी बनाफररांय १७७ खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १७८ माथ नवायौं पितु अपने को ह्यँाँ ते करों तरँगको अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं माँगों यही भवानीकन्त १७६ इतिश्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भववुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतरूपनबिजम वर्णनौनामद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥