आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ चन्द्रावलिकी चौथि अथवा बौरीगढ़की लड़ाई ॥ सवैया ॥ शेष महेश गणेश रमेश धनेश सुरेश दिनेश मनावैं । बावन पावन धोवन को सुखकारि पुरारि धरे सुखपावैं ॥ सोई भये जमदग्नि के बंश औ पूरण अंश पुराण बतावैं । वोई भये रघुनन्दन भूप सो रूप लखे ललिते मुद पावैं १ सुमिरन ॥ धन्य बखानों मैं दिनकर को जिनते पढ़ा बीर हनुमान ॥ तिनके कुलमाँ रघुनन्दन भे जिनकोजानतसकलजहान १ तिनको मानत हम परमेश्वर पूर्ण ब्रह्म सुरासुरपाल ॥ चारो प्यारे नृप दशरथ के कीन्हेनिबाल रूप जो ख्याल २ सोई धारे उर गिरिजापति मनमें बालरूप के हाल ॥ काकभुशुण्डी कौवा तन को मुनि सों मांगि लीनसत्रकाल ३ कितन्यो राजा सिंहासन तजि इनके परे प्रेम के जाल ॥ सुन्यो बिभीषण की गाथा है शरणहिताकत भयो निहाल ४