आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें२ आल्हाखण्ड । २८४ सोई ललिते जब उर आवै जावैं सबै लोक जंजाल ॥ चौथि बखानों चन्द्रावलि की सुनिये ताको पूर हवाल ५ अथ कथाप्रसङ्ग ॥ लागो सावन मनभावन जब वर्षन मेघ झमाझम लाग ॥ दुःख छूटिगा नर नारिन का उपजा हिये प्रेम अनुराग १ गड़े हिंडोला सब घर घर हैं दर दर झुंड खड़े अधिकार ॥ सावन आवन मनभावन की गावन लागीं गीत बहार २ कजली जाहिर मिर्जापुर की सिर्जा जनों वहाँ कर्त्तार ॥ गड़ैं हिंडोला कोशलपुर में अबहूँ देखें लोग बहार ३ सोई महीना जब आवत भा तब मल्हना को सुनो हवाल ॥ बेटी प्यारी चन्द्रावलि जो ताको शोच करै सब काल ४ नयनन आँसू ढरकन लागे बयनन कढ़े चित्त घबड़ाय ॥ ऐसी हालत मै मल्हना कै तबहीं गये उदयसिंहआय ५ लखिअसहालत उदयसिंह तब दोऊ हाथजोरि शिरनाय ॥ पूँछन लागे महरानी ते काहे गई उदासी छाय ६ सुनिकै बातें उदयसिंह की मल्हना बोली बचन बनाय ॥ याद आयगै लरिकाई कै सोई बात गई उरछाय ७ ताहि विसूरति मैं ऊदन थी सोई गई उदासी छाय ॥ सखी हमारी एक साथ की पायो दुःख रहै अधिकाय ८ दुःख याद हो जब काहू को कोमल चित्त जाय घबड़ाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले माता साँच देउ बतलाय ६ आजुइ तुमका अस देखा ना बहुदिन लखातुम्हें असमाय ॥ की विप देवो उदयसिंह को की दुख देवो साँच बताय १० करो बहाना चहू केते तुम मानी नहीं लहुरवा भाय ॥