आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ आल्हखण्ड । २८२ खबरि सुनाई सब मल्हना को रूपना वारबार शिरनाय १४४ बारह रानी परिमालिक की अपने कीन सबन श्रृंगार ॥ मनियादेवन को सुमिरन करि पलकी उपरभई असवार १४५ आल्हा ऊदनके महलन में रानी गई तड़ाका आय ॥ रूप देखिकै तहँ फुलवा को रानिनखुशीभईअधिकाय १४६ विदा माँगिकै न्यवतहरी सब अपने नगर चले ततकाल ॥ बाजत डङ्का अहतङ्का के पहुँचतभयेनगरनरपाल १४७ पूर मनोरथ भे ऊदन के घर घर भयो मंगलाचार ॥ ब्याह पूरभा अब फुलवा का सोये सबै शूरसरदार १४८ खेत छूटि गा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाकरकेर ॥ तुम सों ब्रह्मा यह मागतहौं सबविधिअपनिदीनताहेर १४९ नदी औ पर्वत चहु जंगल में कतहूँ जाय लेउँ अवतार ॥ तहँ तहँ स्वामी रघुबर होवें चाहौं यही सृष्टि कर्त्तार १५० करों बन्दना पितु अपने की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायणभाय १५१ बढ़े साहिबी दिन दिन दूनी औ कविकरैं सुयशको गान ॥ ललिते ऐसे नर दुर्बल को करतो कौन और सनमान १५२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललितेके तबलों तुम यशसोंरहौ सदा भरपूर १५३ माथ नवायौं शिवशंकर को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५४ इति श्रीलखनऊनिवार्सि(सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रागनारायण जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपा- ऽनु पण्डितललिताप्रसादकृतउदनपाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः॥ ३॥ इति उदयसिंहका विवाह सम्पूर्ण ॥