आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंयोगिनिस्वयंम्बर । २३ चौकी परिगै तहँ सोने की तापर बैठ राम को ध्याय ॥ मधुर मिठाई औ मेवा कछु भोजनकीन बहुतसुखपाय १०७ खबरि सुनई सब रानी को जो चढ़िआ पिथौराराय ॥ सुनिकै बातें महराजा की रानी बोली शीश नवाय १०८ तुम ना भाग्यो समरभूमि ते बहुतन धजीधजी उड़िजाय ॥ कोउ अमरौती ना खावा है नाकउआवा पीठिमढ़ाय १०९ कालके हाथ कमान चढ़ी है ना कोउ बची बूढ़ ना ज्वान ॥ यकदिन मरना है सबही को स्वामीकरो बचन परमान ११० जो तुम भगिहौ समरभूमिते बूड़ी तीनिसाखिको नाम ॥ लड़िकै मरिहौ जो सम्मुख में जैहौ तुरत राम के धाम १११ बचिकै अइहौ जो कनउज में पैहौ सदा नृपन में मान ॥ जीवन ताही को भलजानो जाकी रहै जगतमें शान ११२ ऐसी बातें रानी कहिकै पलँगापरै गई अलसाय ॥ राजौ सोये फिरि महलन में औअतिबिकृदनींदकोपाय११३ खेत छूटिगो दिननायक सों झंडागड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे चोरनखुशीभई अधिकाय ११४ होई लड़ाई अब आगे जस तब तस देबे गाय सुनाय ॥ बैठो यारो अब दमलेवो सीताराम चरणको ध्याय ११५ इति श्रीलखनऊ निवासि (सी, आई, ई) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजी की आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत पृथुइराज की चढ़ाई वर्णनंनाम द्वितीयस्तरंगः २ ॥