आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ आल्हखण्ड । सवैया ॥ हे मममातु बिदेह कुमारि खरारि किनारि पियारि पिताकी । जेऊ गये शरणागत में सुखि तेऊभये वसुधामें पताकी ॥ अन्तसमय स्वइ ऐसे भये जिनकी शरणागत इन्द्रहुताकी । दीन पुकार करै ललिते बलितेऊहौं जाऊं बिदेह सुताकी १ सुमिरन ॥ काली ध्यावों कलकत्ते की शारद मइहर की सरनाम ॥ बिन्ध्यवासिनी के पद ध्यावों ज्वालामुखिको करों प्रणाम १ देबी चण्डिका बकसरवाली तिनके दोऊ चरण मनाय ॥ देबी कुसेहिरी औ दुर्गा को ध्यावों बार बार शिरनाय २ महाकाल शिव उज्जैनी के जिनकाबिदितजगतपरताप ॥ तिनके दर्शन के कीन्हे ते छूटत नरन केर सब ताप ३ मैं पद ध्यावों शिवशंकर के काशी विश्वनाथ महराज ॥ जिनके दर्शन के कीन्हे ते अवहूं रहत जगत में लाज ४ फेरि मनावों रामेश्वर को पशुपतिनाथ क्यारकरिध्यान ॥ बैजनाथ लोधेश्वर गावों पावों बुद्धि और बल ज्ञान ५ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाखा सुनो शूरमन केर ॥ फौजैं सजिहैं चन्देले की कनउज लेई पिथौरा घेर ६ अथ कथाप्रसंग ॥ भयो आगमन जब सुर्यन को पक्षिन कीन बहुत तब शोर ॥ मुर्गा बोले सब गाँवन में जंगल नचनलाग तब मोर १ जगानगड़ची फिर कनउजमाँ करिकै कृष्णचन्द्र को ध्यान ॥ धरा नगाड़ा फिरि सँड़ियापर बाजन लाग घोर घमसान २ शब्द नगाड़ा का सुनतैखन खत्री सबै भये हुशियार ॥