भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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संयोगिनिस्वयम्बर। २५ पहिरि सिपाही झिलमैलीन्ह्यो हाथ म लई ढाल तलवार ३ कच्छी मच्छी नकुला सब्जा हरियल मुश्की घोड़ अपार ॥ साजन लागे सब जल्दी सों जिनका तनक न लागैबार ४ डारि हयकलैं तिनके गलमा मुखमा दीन लगाम लगाय ॥ गंगा यमुनी छाँड़ि रकाबैं पूंजी पटा दीन पहिराय ५ नाल ठोकाई तिनके सुम्मन रेशम तंग दीन कसवाय ॥ को गति बरणै तिन घोड़न कै हमरे बूत कही ना जाय ६ हंथी महावत हाथी लै कै तिनका दीन तुरत बैठाय ॥ चुम्बक पत्थर का हौदा धरि जिनमें सेल बरौंवा खाय ७ साजि साँड़िया सब जल्दी सों छकरन लीन बरुद भराय ॥ बड़ी बड़ी तोपैं अष्टधातु की गोला एक मनाको खायँ ८ बैल नहाये तिन तोपन में औ डाँड़े को दीन हँकाय ॥ जागा राजा कनउज वाला मनमाँ श्रीगणेशको ध्याय ६ उठिकै महलन सों जल्दी सों औ दरबार पहूँचा आय ॥ हम्माँ जमाँ औ रायलंगरी इनका लीन्ह्यों तुरतबुलाय १० सुद्धत ठाकुर रतीभान औ दोऊ आंय गये दरबार ॥ माथ नवायो महराजा को दोऊ बड़े शूर सरदार ११ हाथ जोरिकै मंत्री बोल्यो राजन मानो बचन हमार ॥ हाथी घोड़ा सजे सिपाही छकड़ा नहे ठाढ़ तय्यार १२ धावन पठयो पृथीराज ने सो दरबार पहूँचा आय ॥ हाथ जोरिकै धावन बोल्यो ओ महराज कनौजीराय १३ मोहिं पठायो पृथुइराज ने औ यह कह्यो बात समुझाय ॥ डोला दैदें संयोगिनि का तौ हम लौटि धामको जायँ १४ नाहिंतो बचिहैं ना कनउजमाँ जो विधि आपु बचावै आय ॥