आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ आल्हखण्ड । २८६ कुशल न होइहै ऊदन जैहैं त्वहिते साँचदेयँ बतलाय २३ कहा न मनिहैं ये काहू का कलहा देशराज के लाल ॥ इतना सुनिकै मल्हनारानी सब राजा ते कहा हवाल २४ दोष हमारो कछु नाहीं है साँची सुनो बात महराज ॥ काम न अबरा कछु हमरे घर बिन चन्द्रावलि होय अकाज २५ कहा न हमरो ऊदन मानैं अपनो कहा करै सबकाल ॥ पूँछो इनसे तुम महराजा पासै देशराज के लाल २६ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची मानो कही हमार ॥ खर्चा देवो मोहिं जल्दी अब मैं बौरी का खड़ात यार २७ कहा न मानब हम काहू को यहुतो साँच दीन बतलाय ॥ जान न पावब जो बौरीका तौ मरिजाब जहरको खाय २८ सुनिकै बातैं ये ऊदन की निश्चय जानि लीन परिमाल ॥ यहु समझायेते मानीना रिसहा देशराजका लाल २९ यहै सोचिकै मन अपनेमाँ राजा सामा दीन कराय ॥ हीरा कलँगी औ दूरा तोड़ा सो ऊदन को दियो मँगाय ३० बाइस हाथी साठि पालकी रथ चौरासी घोड़ हजार ॥ यह सब सामा तहँ दीन्ह्यो तुम नाहर उदयसिंह सरदार ३१ दिल्ली ह्वैकै तुम चलिजावो औ मिलि लेउ पिथौरै जाय ॥ जौन बतावैं पिरथी राजा तौनै किह्यो लहुरवा भाय ३२ इतना कहिकै गे परिमालिक पहुँचे फेरि राजदरबार ॥ वस्त्र आभूषण औ मोतिनके मल्हना दीन आय दशहार ३३ भरि भरि मेवा औ कतारूको मल्हना मटुका लीनरँगाय ॥ नाई बारी भाट तँबोली चारो नेगी लीन बुलाय ३४ कहि समुझावा सब नेगिनको औ सब सामा दीन गहाय ॥