आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रावलि की चौथि । २६५ १३ मैं अब देखों जस ऊदन को मालिनितसतुमकरोउपाय १३१ बातें सुनिकै चन्द्रावलिकी मालिनि कहाबचनसमुझाय ॥ निशा अँधेरी है सावन की तुमको ऊदनलवैं दिखाय १३२ इतना सुनिकै मालिनि सँग में ऊदन पास पहुँची जाय ॥ बहिनी प्यारी चन्द्रावलि तहँ बोली सुनो बनाफरराय १३३ बाहर आवो तुम खन्दक के अपने घोड़ होउ असवार ॥ निर्भय जावो तुम मोहबे को भाई उदयसिंह सरदार १३४ इतना सुनिकै ऊदन बोले बहिनी साँच देयँ बतलाय ॥ चोरी चोरा जो घर जावैं तौ रजपूती धर्म नशाय १३५ खबरि जो पइहैं सिरसावाले अइहैं तुरत बीर मलखान ॥ सुखसों सोवो तुम महलन में करिहैंकुशलमोरिभगवान १३६ इतना सुनिकै बहिनी चलिभै महलन फेरि पहुँची आय ॥ लिखी हकीकति सब मलखेको खन्दक परे लहुरवाभाय १३७ लिखिकै पाती सुवना गरमें बांधिकै दीन्ह्यो तुरत उड़ाय ॥ जावो सुवना तुम मोहबे को मल्हना महल पहुँचोजाय १३८ उड़िकै सुवना तहँ ते चलिभा नरवरगढ़ै पहुँचा आय ॥ मकरँद घूमै ज्यहि बगियामें सुवना बैठ तहाँपर जाय १३६ चकित घूमै मकरन्दा तहँ परिगै दृष्टि सुवापर आय ॥ पाती दीख्यो गल सुवना के तुरतै लीन तहाँ पकराय १४० पढ़िकै पाती लै सुवना को सो नरपतिको दीन दिखाय ॥ पाछे पहुँचा फिरि महलन में रानी खबरि जनाई जाय १४१ सुनी हकीकति जब रानी ने पाती गले दीन बँधवाय ॥ सुवना चलिभा नरवरगढ़ ते पहुँचा नगर महोबेआय १४२ मल्हना ठाढ़ी रह अण्टापर सुवना बैठ तहाँपर जाय ॥