आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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१४ आल्हाखण्ड । २६६ पाती दीन्ही गल सुवना के मल्हना नाम दीन बतलाय १४३ सुन्यो जबानी जब मल्हना की सुवना बैठ हाथ पर आये ॥ छोरिकै पाती मल्हना रानी आँखि अँकुन जरिकै जाय १४४ पढ़िकै पाती रानी मल्हना रूपना बारी लीन बुलाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो महारानी ने औ सब हाल कह्यो समुझाय १४५ लै कै चिट्ठी रूपना चलिभा मलखे पास पहुँचा जाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो मलखाने को औरो हाल गयो सब गाय १४६ पढ़िकै चिट्ठी मलखाने ने तुरतै फौजन कीन तयार ॥ जितने क्षत्री रहें सिरसा में सबियाँ बाँधि लीन हथियार १४७ लै कै फौजैं मलखाने फिरि पहुँचा नगर मोहोबे आय ॥ खबरि पठाई फिरि आल्हा को राजा पास पहुँचे जाय १४८ हाथ जोरिकै मलखे बोले दोऊ चरणन शीश नवाय ॥ कीन तयारी हम बौरी को ब्रह्मै साथ देउ पठवाय १४६ सुनिकै बातें मलखाने की बोले तुरत चँदेलेराय ॥ शकुन उठावो देवा ठाकुर देषो हार जीत बतलाय १५० पाय निकै बातें महाराजा की ज्योतिष पुस्तक लीन उठाय ॥ जायक शकुन उठायो देवा ठाकुर बोल्यो हाथ जोरि शिर नाय १५१ देखि ह तुम्हारी बौरी द्वैहै राजन सत्य दीन बतलाय ॥ मन में फौजैं आल्हा ठाकुर तबल गगये तहाँ पर झाय १५२ तवलों मालिन दिननायक सों झण्डा गड़ा निशा को आय ॥ ऐसो पाहुन नत्र चमकन लागे पक्षी गये बसेरन धाय १५३ को समुझावै टिया तकि तकि घों घों कण्ठ रहा घर्षाय ॥ सुनिकै बातें ये रघुनन्दन के सन्त न धुनी दीन परचाय १५४ अपने को ह्याँ ते करौं तरँग को अन्त ॥