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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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१४ आल्हाखण्ड । २६६ पाती दीन्ही गल सुवना के मल्हना नाम दीन बतलाय १४३ सुन्यो जबानी जब मल्हना की सुवना बैठ हाथ पर आये ॥ छोरिकै पाती मल्हना रानी आँखि अँकुन जरिकै जाय १४४ पढ़िकै पाती रानी मल्हना रूपना बारी लीन बुलाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो महारानी ने औ सब हाल कह्यो समुझाय १४५ लै कै चिट्ठी रूपना चलिभा मलखे पास पहुँचा जाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो मलखाने को औरो हाल गयो सब गाय १४६ पढ़िकै चिट्ठी मलखाने ने तुरतै फौजन कीन तयार ॥ जितने क्षत्री रहें सिरसा में सबियाँ बाँधि लीन हथियार १४७ लै कै फौजैं मलखाने फिरि पहुँचा नगर मोहोबे आय ॥ खबरि पठाई फिरि आल्हा को राजा पास पहुँचे जाय १४८ हाथ जोरिकै मलखे बोले दोऊ चरणन शीश नवाय ॥ कीन तयारी हम बौरी को ब्रह्मै साथ देउ पठवाय १४६ सुनिकै बातें मलखाने की बोले तुरत चँदेलेराय ॥ शकुन उठावो देवा ठाकुर देषो हार जीत बतलाय १५० पाय निकै बातें महाराजा की ज्योतिष पुस्तक लीन उठाय ॥ जायक शकुन उठायो देवा ठाकुर बोल्यो हाथ जोरि शिर नाय १५१ देखि ह तुम्हारी बौरी द्वैहै राजन सत्य दीन बतलाय ॥ मन में फौजैं आल्हा ठाकुर तबल गगये तहाँ पर झाय १५२ तवलों मालिन दिननायक सों झण्डा गड़ा निशा को आय ॥ ऐसो पाहुन नत्र चमकन लागे पक्षी गये बसेरन धाय १५३ को समुझावै टिया तकि तकि घों घों कण्ठ रहा घर्षाय ॥ सुनिकै बातें ये रघुनन्दन के सन्त न धुनी दीन परचाय १५४ अपने को ह्याँ ते करौं तरँग को अन्त ॥

वन्दावलि की चौथि। २६७ १५ राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५५ इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुन्शी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपेंड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत ऊदनबन्धनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ सवैया ॥ ध्यावत तोहिं सरस्वति मातु करो निज सेवकपै अब दाया । शारद नारदके पद ध्याय मनावत तोहिं सदा रघुराया ॥ गावतहौं गुण गोबिंद के अरु पावतहौं नितही मनभाया । नावतहौं शिर बारहिं बार करो ललिते कर मातु सहाया १ सुमिरन ॥ दोउ पद ध्यावों जो बर पावों सो सुनिलेउ शारदा माय ॥ जस जस गावों मैं आल्हा को तसतस सुखी होउँ अधिकाय १ माता भ्राता त्राता ताता नाता तुममा दीन लगाय ॥ तारो बोरो जो अब चाहो हमतो शरण तुम्हारी माय २ बेद पुराण श्रुति असमृति में जाँचा साँचा हमअधिकाय ॥ तुम्ही भवानी शारद मइया सेबका सार परी दिखराय ३ तव पद बिछुरे उर हमरे ते मूरखचन्द कहैं सब गाय ॥ ताते बिछुरैं पद उरते ना यह बर मिलै शारदामाय ४ छूटि सुमिरनी गै शारद कै अब आगे के सुनो हवाल ॥ मलखे आल्हा बौरी जैहैं हैहैं तहां युद्ध विकराल ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदय दिवाकर भे पूरबमें किरणनकीनजगत उजियार ॥ हुकुम पायकै मलखाने को सवियाँ फौज भई तय्यार १ सजि पचशब्दा गा आल्हाका तापर होत भयो असवार ॥

१६ आल्हखण्ड । २९८ घोड़ी कबूतरी की पीठि पर बैठ्यो सिरसा का सरदार २ चढ़ा मनोहर की पीठि पर देवा मैनपुरी चौहान ॥ ब्रह्मा ठाकुर हरनागर पर बैठे सुमिरि राम भगवान ३ गर्भ गिराविनि कुँवाँ सुखाविनि लक्षिमिनि तोप भई तय्यार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ४ रणकी मौहरि बाजन लागी घूमन लागे लाल निशान ॥ छाय लालरी गै अकाश में लोपे अन्धकार सों भान ५ पहिल नगारा में जिन बन्दी दुसरे बांधिलीन हथियार ॥ तिसर नगाराके बाजत खन हाथी घोड़न भये सवार ६ चौथ नगारा बाजन लाग्यो मलखे कूच दीन करवाय ॥ हाथी चलिभे दल बादल सों घण्टा गरे रहे हहराय ७ कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउ कोउ मोरचालपरजाय ॥ सरपट जावै कोउ कोउ घोड़ा केहू टाप न परै सुनाय ८ खर खर खर खर कै रथ दौरैं रब्बा चलैं पवनकी चाल ॥ मारु मारुकै मौहरि बाजै बाजैं हाव हाव करनाल ६ बाजै डङ्का अहतङ्का के बङ्का सबै शूर सरदार ॥ शङ्का नाहीं क्यहु जियरे में चहुदिन शक्तिचलै तलवार १० लश्कर पहुँचा सब दिल्ली में क्षत्रिन कीन तहाँ विश्राम ॥ इकलो मलखे त्यहि समया में पहुँचा पृथीराज के धाम ११ बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो तहँ पर बैठ बीर मलखान ॥ सबियाँ गाथा बौरीगढ़ की मलखे कीन तहाँपर गान १२ सुनी हकीकति जब मलखे की चौंड़ा सूरज लीन बुलाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो पृथीराज नें चौंड़ै फेरि कह्यो समुझाय १३ कह्यो जबानी बीरशाह ते जल्दी विदा देयँ करवाय ॥

चन्द्रावलि की चौथ । २९९ १७ कलहा लरिका बच्छराज का नामी सबै बनाफरराय १४ लड़िकै जितिहौ तुम इनते ना मरिकै सात धरौ अवतार ॥ लैके फौजैं सूरज बेटा मलखे साथ होउ तय्यार १५ विदा माँगिकै महराजा ते सूरज सिरसा का सरदार ॥ आये फौजन में मलखाने सब दल बेगि भयो तय्यार १६ गज इकदन्ता चौंड़ा बैठ्यो सूरज सब्जा पर असवार ॥ कूच को डङ्का बाजन लाग्यो हाथिन घोर कीन चिग्घार १७ चलिभइँ फौजैं दल बादल सों बौरीगढ़ै गई नगच्याय ॥ आठकोस जब बौरी रहिगै आल्हा डेरा दीन गड़ाय १८ तम्बू गड़िगा तहँ आल्हाका बैठे सबै शूरमा आय ॥ आल्हा बोले तहँ देवा ते कहिये करिये कौन उपाय १६ इतना सुनिकै देवा बोला साँची तुम्हें देयँ बतलाय ॥ योगी बनिकै बौरी चलिये तौसबहालठीकमिलिजाय २० यह मन भाई मलखाने के गुदरी पहिरि लीनतत्काल ॥ आल्हा देवा ब्रह्मा ठाकुर इनहुनतिलक लगायोभाल २१ लीन बाँसुरी ब्रह्मा ठाकुर खँझरी मैनपुरी चौहान ॥ कर इकतारा आल्हा लीन्ह्यो डमरू लीन वीर मलखान २२ चारो चलिभे फिरि तम्बुन ते बौरीगढ़ै पहुँचे आय ॥ बजी बाँसुरी तहँ ब्रह्माकी देवा खँझरी रहा बजाय २३ टप्पा ठुमरी भजन रेखता मलखे गावैं मेघ मलार ॥ को गति बरवै इकतारा कै बाजैं खूब लोह के तार २४ रूप देखिकै तिन योगिन का मोहे सबै नारिनर बाल ॥ बात फैलिगै बौरीगढ़ में योगी आये खूब विशाल २५ भा खलभल्ला औ हल्लाअति पहुँचे वीर शाहके द्वार ॥

१८ आल्हखण्ड । ३०० तजिकै लज्जा चलीं इकल्ला बल्लन क्यार मनों त्यौहार २६ अटाके ऊपर कढा करनको नारिन पैन नैन हथियार ॥ कड़ाके ऊपर छड़ा विराजैं तिनपर पायजेब झनकार २७ कर इकत्तारा आल्हा लीन्हे नीचे करें तारसों रार ॥ बजै बाँसुरी भल ब्रह्माकै मानो लीन कृष्ण अवतार २८ उपमा नाहीं शिरीकृष्ण कै तीनों लोकन के कर्त्तार ॥ काह हकीकति है ब्रह्मा कै पै यह बँसुरी केरि बहार २६ बाजै खँझरी भल देवा कै मलखे करें तहाँ पर गान ॥ देखि तमाशा तहँ योगिनका लागे कहन परस्पर ज्वान ३० ऐसे योगी हम देखे ना दाढ़ी गई सपेदीछाय ॥ गङ्गासागर के संगमलौं देखा देश देश अधिकाय ३१ बीरशाह तब बोलन लाग्यो चारों योगिन ते मुसुकाय ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ३२ सुनिकै बातें महराजा की मलखे बोले वचन बनाय ॥ हम तो आये प्रागराज ते जावैं हरद्वार को भाय ३३ भोजन पावैं हम क्षत्रिन घर बृत्ती यहै लीन ठहराय ॥ होय जनेऊ ज्यहि घर नाहीं छत्री कौन भांति सो आय ३४ जनमत ब्राह्मण क्षत्री बनियाँ तीनों शूद्र सरिस हैं भाय ॥ होय जनेऊ जब तीनों घर तब यह वर्ण ठीक ठहराय ३५ जो मर्यादा तुम छोड़ा ना तौ घर भोजन देउ कराय ॥ कलियुग आवा महराजा है ताते साफ दीन बतलाय ३६ हम नहिं भोजन करें शूद्र घर चहु मरि जायें पेटके घाय ॥ यकडस लंघन चहु दैजावें पैनहिं सिंहघासको खाय ३७ सुनिकै बातें ये योगी की भामन खुशी यादवाराम ॥

चन्द्रावलि की चौथि। ३०१ १६ ओ यह बोला फिरि योगिनते हमहूँ साँच देयँ बतलाय ३८ तुम्हरो हमरो मत एकै है शंका आप देउ बिसराय ॥ पतित न क्षत्री कोउ बौरीगढ़ यादव बंश यहां अधिकाय ३६ पापी आयो इक मोहबे ते ताको खन्दक दीन डराय ॥ औरन पापी कोउ बौरी में तुमको सांच दीन बतलाय ४० इतना सुनिकै मलखे बोले ओ महराज यादवराय ॥ कैसो खन्दक कैसो पापी दर्शन हमें देउ करवाय ४१ कबहुँ खन्दक हम देखाना तुमते साँच दीन बतलाय ॥ बड़ी लालसा भै जियरे माँ खन्दक आप देउ दिखलाय ४२ इतना सुनिकै महराजा तब योगिन लीन्ह्यो साथ लिवाय ॥ जौने खन्दक में ऊदन थे सो महराज दिखावा जाय ४३ ऊदन दीख्यो जब योगिन को नीचे लीन्ह्यो शीश नवाय ॥ चारो योगी तहँते चलिभे पहुँचे राजभवन में आय ४४ भयो बुलौवा फिरि भोजन को मलखे बोले वचन बनाय ॥ आजु यकादशि निर्जल बर्ते राजन साँच दीन बतलाय ४५ करैं बसेरो नहिं बस्ती में जंगल बास करैं सब काल ॥ बिदा मांगिकै महराजा ते चारो चलत भये ततकाल ४६ आयकै पहुँचे फिरि फौजनमें अंगड़ खंगड़ धरे उतार ॥ सुरंग खुदायो मलखाने ने क्षत्रिन तुरत कीन तय्यार ४७ जौने खन्दक में ऊदन थे फूटो सुरंग तहाँपर जाय ॥ सुरंग के भीतर सों बघऊदन पहुँचे फौज अपनी आय ४८ जैसे पियासा पानी पावै तैसे खुशी भये सब भाय ॥ बाजे डंका अहलंका के शंका सबन दीन बिसराय ४६ मलखे बोले तहँ आल्हा ते लश्कर कूच देउ करवाय ॥

२० आल्हखण्ड । ३०२ बिदा करावैं चन्द्रावलि को तव यश जाय जगतमैछाय ५० इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर बोले करौ यहै अब भाय ॥ हुकुम पायकै यहु आल्हा को मलखे कूच दीन करवाय ५१ चलिभैं फौजें दलबदल सों बौरीगढ़ै गई नगन्य्याय ॥ प्रलय मेघ सम बजैं नगारा हाहाकार शब्द गा छाय ५२ गा हरिकारा तब बौरी में राजनै खबरि जनाई जाय ॥ फौजै आई क्यहु राजा की बौरी डांड़ दबायनि आय ५३ सुनिकै बातें हरिकाराकी राजा गयो सनाकाखाय ॥ मलखे बोले ह्यां रूपन ते कहियो बीरशाह ते जाय ५४ सुरुँग खोदिकै बघऊदन को आल्हा ठाकुर लीन निकारि ॥ बिदा कराये बिन जैहैं ना ताते करो नहीं तुमरारि ५५ बहिनी व्याही तुम्हरे घरमाँ ताते क्षमाकीन यहिवार ॥ नहिं अस ठाकुर को जन्माजग जाते मानि लीन हमहार ५६ इतना सुनिकै रूपन चलिभा बौरीगढ़ै पहुॅँचा जाय ॥ खबरि सुनाई महराजा को, जो कछु कह्यो बनाफरराय ५७ सो नहिं भाई बीरशाह मन बोल्यो तुरत बचन ललकार ॥ काह हकीकति है आल्हा कै आवैं विदा करावन द्वार ५८ हठ नहिं छोड़्यो दुर्योधन ने औ मरिगयो सहित परिवार ॥ खबरि जनावो तुम आल्हा को हमरे साथ करैं तलवार ५६ इतना सुनिकै रूपन चलिभे फौजन फेरि पहुँचे आय ॥ कही हकीकति बीरशाह की सुनि जरि उठे बनाफरराय ६० हुकुम लगायो निज फौजनमें सबियां शूर होयँ तय्यार ॥ हुकुम पायकै मलखाने को क्षत्रिन बांधिलीन हथियार ६१ गजैं चढ़ैया गजपर चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ॥

चन्द्रावलि की चौथि। ३०३ २१ झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथम लीन ढाल तलवार ६२ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कोताखानी लीन कटार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार ६३ सजा बेंदुला का चढ़वैया लाला-देशराज का लाल ॥ को गति बरणै मलखाने कै जाको डरै देखि नरपाल ६४ बड़ा लड़ैया भीषमवाला देवा मैनपुरी चौहान ॥ ब्रह्मा ठाकुर सजि ठाढ़ो भो करिकै रामचन्द्रको ध्यान ६५ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बन्दी कीन समरपद गान ॥ बाजे डंका अहलंका के घूमनलागे लाल निशान ६६ हिंया कि गाथा ऐसी गुजरी सुनिये बीरशाहको हाल ॥ सुरज जुरावर दोउ पुत्रन को तुरतै बोलि लीन नरपाल ६७ करो तयारी समरभूमिकै अपनी फौज लेउ सजवाय ॥ जान न पावैं मोहबेवाले सबकी कटा देउ करवाय ६८ हुकुम पायकै महराजा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥ सजे सिपाही बौरी वाले मनमाँ श्रीगणेशपदध्याय ६९ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ सजि इकदन्ता दुइदन्ता गे तिनपर हौदा रहे बिराज ७० कच्छी मच्छी नकुला सब्जा हरियल मुश्की घोड़ अपार ॥ ताजी तुरकी पँचकल्यानी सुरखा सुरँगा भये तयार ७१ चढ़ि अलबेला तिन घोड़नपर अपने बांधि लये हथियार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे हाथम लिये ढाल तलवार ७२ वार्जी तुरही मुरही ऐसी पुप्पूं पुप्पूं परा सुनाय ॥ बाजे डफला अलबेला सब शूरन मेला दीन लगाय ७३ मारु मारु करि मौहरि वार्जी वार्जी हाय हाय करनाल ॥

२२ आल्हाखण्ड । ३०४ खर खर खर डर कै रथ दौरे रव्वा चले पवनकी चाल ७४ सुर्खा घोड़ा चढ़ जुरावर सूरज सब्जापर असवार ॥ सुमिरि भवानी सुत गणेश को दोऊ चलन भये सरदार ७५ घोड़न वरणों की असवारन पैदर सेना तीस हजार ॥ तीन सहस हाथिन पर सोहैं बाँके यादव परम जुझार ७६ बाम्हन थोरे क्षत्री ज्यादा लीन्हे कठिन धार तलवार ॥ गर्ज्जति आवैं समरभूमि को एकते एक शूर सरदार ७७ कायर हल्ला खलभल्ला में तल्ला छोड़ि प्राण के दीन ॥ खुशी छायगै मन शूरन के मानों जीति इन्द्रपुर लीन ७८ बजे नगारा ठनकारा के दारा गर्भपात सुनिकीन ॥ गये दरारा उर कायर के सायर सत्यसत्य कहिदीन ७६ उइ धिरकारैं अपने तनका मनमाँ बार बार पछितायँ ॥ भैंसि वियानी घर हमरे मा माठा दूध केर अधिकाय ८० हाय रुपैया मोरे डारैं लीन्हे समरभूमि को जायँ ॥ दैया मैया भैया कहिकै ज्वैया हेतु बहुत पछितायँ ८१ शूर यशोमति मैया वाले भैया गैयन के चरवाह ॥ नाव खिवैया भवसागर के नागर कृष्णचन्द्र नरनाह ८२ तिनका सुमिरण मन अन्तर करि तत्पर भये स्वामि के काज ॥ करि अभिलाषा समरभूमि कै राखे मनै धर्म की लाज ८३ पढ़ि अशलोक न तजि शोकन को लोकन केर मिले जनुराज ॥ तैसे गाने मनअन्तर में बाजे तहाँ शूर शिरताज ८४ बाजे बाजे बाजे सुनिकै लाजे मनै आपने बीच ॥ तिनको कहियत हम अपनी दिशि जानो सकल नरन में नीच ८५ इम अनुमाना मन अपने है जाना नारि वित्तको कीच ॥

चन्द्रावलि की चौथ । ३०५ २१ पै हम त्यागी अनुरागीना लागी आश नारिधनबीच ८६ आपै त्यागी अनुरागीना तौ कस कहै नारिधन कीच ॥ साँच बखानैं हम अपनीदिशि सोई सकल नरनमें नीच ८७ पै यहु कलियुग बाबा आयो छायो रहै मनै संताप ॥ मन नहिं इस्थिर क्षणहू होवै कैसे होय मुनिन में थाप ८८ जपतै माला गायत्री के आला परब्रह्म के ध्यान ॥ यहु मन काला भाला मारै जो सब इन्द्रिनमें बलवान ८६ नीच न कहिये यहि कालामें जो कोउ साँच बिप्रको बाल ॥ युग यहु पाजी बदिकै बाजी राजानको किह्योबिहाल ६० ऐसे पाजी की राजी में सूरज बीरशाह का लाल ॥ जायकै पहुँच्यो समरभूमि में अब मलखेका सुनो हवाल ६१ सो जब दीख्यो आसमानको छाई खूब गर्द गुब्बार ॥ हँसिकै बोला रणशूरन ते सँभरो सबै शूर सरदार ९२ इतना कहतै फौजैं आईं तोपन होनलागि तहँ मार ॥ अररर अररर तोपैं छूटीं हाथिन घोर कीन चिग्घार ६३ को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी भयो भयङ्कर मार ॥ नावैं गोला जौनी दिशिको तौनी दिशिकोकरैं चिथार ९४ सवैया ॥ भभकार उठैं तहँ गोलन की फुफकार करैं रण में गजराजा । धुधकार नगारनकी गमकी चमकी तलवारि जुरे सबराजा ॥ अपार जुझार करैं तहँ मार न डरैं मन नेकहु एकहुसाजा । समाजऔसाजदोऊदिशिमें अबलैरैललितेसबहीजयकाजा६५ बड़ी लड़ाई भै तोपन कै लोपे अन्धकार सों भान ॥ २०

२४ आल्हखण्ड । ३०६ छाय अँधेरिया गै दशहूंदिशि कतहूँ न सूझै अपन विरान ६६ धावा ह्वैगा दोऊ दल का दोऊ भये बरोबरि आय ॥ सूरजठाकुर बौरी वाला सिरसा क्यार बनाफरराय ९७ दोऊ सोहैं भल घोड़नपर लीन्हे हाथ ढाल तलवार ॥ द्वउ ललकारन मारन लागे सम्मुख होत होत सरदार ९८ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़ा महौतनक्यार ॥ हौदा हौदा यकमिल ह्वैगा औ असवार साथ असवार ९९ कल्ला भिड़िगे असवारन के लागी होन भड़ाभड़ मार ॥ छूटे ऊना लण्डन वाले कोताखानी चलीं कटार १०० बिजुली दमकै कउँधा चमकै तैसे धमकिरही तलवार ॥ मलखे ठाकुर शूर जुरावर दोऊ लड़नलागि सरदार १०१ सूरज ऊदन की भेंटन में लेंटनलागि सिपाही ज्वान ॥ परे लपेटे भट भेटे जे लेटे समर भूमि मैदान १०२ मनो ससंटे यम भेटे में लेटे क्षत्री परम जुझार ॥ वहैं पनारा तहँ रक्तन के औ हिलकारा उठै अपार १०३ को गति बरौँ तहँ पैदल की बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ अपन परावा कछु सूझैना जूझै जूझ जूझ त्यहिबार १०४ बड़ी लड़ाई भै बौरीगढ़ मलखे सूरज के मैदान ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान १०५ बड़ा लड़ैया सिरसा वाला ज्यहिते हारि गई तलवार ॥ घोड़ी कबूतरी रणमें नाचे साँचे शूरवीर सरदार १०६ सूरज बोले तिन मलखे ते ठाकुर मानो कही हमार ॥ लौटि महोबे जल्दी जावो तबहीं कुशलरखाकरतार १०७ इतना सुनिके मलखे बोले तुमते साँच देयँ बतलाय ॥

चन्द्रावलि की चौथ । ३०७ २५ बिदा कराये बिन जैबैना बहुतनधजीधजीउड़िजाय १०८ सूरज बोले मलखाने ते यह नहिं होनहार यहिबार ॥ इतना कहिकै सूरज ठाकुर अपनी खैंचिलीनतलवार १०६ ऐंचिकै मारा मलखाने के मलखे लीन ढालपर वार ॥ आल्हा बोले मलखाने ते ठाकुर सिरसा के सरदार ११० पकरिकै बाँधो तुम सूरज को इनपर करो नहीं अब वार ॥ गरुहर नाते के लड़िकाहैं मानों सिरसाके सरदार १११ सुनिकै बातें ये आल्हा की तुरतै उतरिपरा मलखान ॥ पकरिकै बाँध्यो रणमण्डल में देखें खड़े अनेकन ज्वान ११२ सूरज बन्धन दीख जुरावर पहुँचा तुरत तहाँ पर आय ॥ औ ललकारा मलखाने को ठाढ़े होउ बनाफरराय ११३ इतना सुनिकै बघऊदन ने तुरतै पकरि जुरावर लीन ॥ उतरि कबुतरी ते मलखाने बन्धनतुरत तहाँपर कीन ११४ दूनों लरिका बीरशाह के आल्हाठाकुर लीन बँधाय ॥ भागीं फौजैं बौरीगढ़ की काहू धरा धीर ना जाय ११५ खबरि सुनाई बीरशाह को क्षत्रिन नीचे शीश नवाय ॥ बन्धन सुनिकै दउ पुत्रन को दुखिया भयो यादवाराय ११६ इन्द्रसेन औ मोहन बेटा इनको तुरत लीन बुलवाय ॥ हाल बतायो समरभूमि को आशिर्वाद दीन हर्षाय ११७ करो तयारी सब भाइन सह आल्है पकरि दिखावो आय ॥ इतना सुनिकै सबियाँ बेटा चलिभे राजै शीश नवाय ११८ आयकै पहुँचे निज सेनन में डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अहर्तंका के हाहाकार शब्द गा छाय ११९ पहिल नगारा में जिन बन्दी डंके शूर भये हुशियार ॥

२६ आल्हाखण्ड । ३०८ तिसर नगारा के बाजत खन क्षत्री समर हेतु तैयार १२० ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ॥ रण की मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार १२१ चालिमै सेना बौरीगढ़ सों हाहाकारी परै सुनाय ॥ घरी मुहूरत के अन्तर में पहुँचे समरभूमिमें आय १२२ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे देवा मैनपुरी चौहान ॥ सब रणशूरन त्यहि समया में भारी भीर दीख मैदान १२३ उड़ी कबुतरी मलखाने की हौदन उपर पहुँची जाय ॥ मलखे मारै तलवारिन सों घोड़ी देय टापके घाय १२४ मोहन ठाकुर उदयसिंह को परिगा समर बरोबरि आय ॥ भई कसामसि समरभूमि में औ तिलडरा भुईं ना जाय १२५ को गति वरणै रजपूतन कै दूनों हाथ करैं तलवार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार १२६ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिलारै गाय ॥ तैसे मारै मलखे ठाकुर कायर भागैं पीठ दिखाय १२७ है मर्दाना जिनको बाना ते नर करें तहाँ पर मार ॥ को गति वरणै इन्द्रसेन कै दूनों हाथ करैं तलवार १२८ बड़े लड़ैया बौरी वाले मानैं नहीं समर में हार ॥ ना मुँह फेरैं मोहबे वाले दोऊ कठिन मचाई रार १२६ गिरैं कगारा जस नदिया माँ तैसे गिरैं ऊंट गज धाय ॥ परीं लहासें रणशूरन की तिनपर रहे गीध मड़राय १३० गोली ओली कतहूँ बरसें कतहूँ कठिन चलै तलवार ॥ छुरी कटारी कोऊ मारैं कोऊ कड़ावीन की मार १३१ गदा के ऊपर गदा चलावैं ढालन मारैं ढाल घुमाय ॥

चन्द्रावलि की चौथ। ३०६ .२७ झर सर मारैं तलवारिन सों तीरन मन्न मन्न गा छाय १३२ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ! भम्भम् भम्भम् झीलम झलकें नीलम रंग परै दिखराय १३३ चम् चम् चम् चम् भाला चमकैं दमकैं उडुगण मनों अका़श ॥ बम् बम् बम् बम् क्षंत्री बँचकें भभकैं शूरनकेर प्रकाश १३४ सवैया ॥ आश करें नहिं प्राणन की ललिते रणशूरन रीति सदाहै। प्राण कि नाश कि कीर्त्ति प्रकाश कि आश नहीं सुख या बिपदाहै ॥ बीर कि शान कि आन कि मान कि ठानठने मलखान यदाहै। शान कि आन करे रणज्वान सो प्राणपयान कियेयीतदाहै १३५ को गति बरणै मलखाने कै रणमाँ कठिन करै तलवार ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया नाहर उदयसिंह सरदार १३६ गनि गनि मारै राजपूतन का बेटा देशराज का लाल ॥ मोहनठाकुर बौरी वाला आला बीरशाहका बाल १३७ बिकट लड़ाई की संयुग में कायर भागे लिहे परान ॥ बड़ा लड़ैया भीषमवाला आला मैनपुरी चौहान १३८ लड़ै चौंड़िया दिल्लीवाला बेटा लड़ै पिथौराकयार ॥ को गति बरणै इन्द्रसेन कै दूनों हाथ करै तलवार १३६ मलखे बोले इन्द्रसेन से , जीजा मानों कही हमार ॥ बहिनी बेही तुम्हरे घरमाँ तुमते सदा हमारीहार १४० अबै मसाला कछु बिगराना अनभल नहीं कीन कर्त्तार ॥ बिदा कराये बिन जैबे ना मानो सत्यवचन सरदार १४१ फौजैं प्यारो समरभूमि ते बौरी जाउ आप ततकाल ॥

३८ आल्हखण्ड । ३१० तुम समुझावो महराजा को काहे रारि करें नरपाल १४२ इतना सुनिकै इन्द्रसेन ने गरुई हाँक कीन ललकार ॥ काह हकीकति तुम राखतिहौ जावो विदाकरावत द्वार १४३ इतना कहिकै इन्द्रसेन ने अपनी खैंचि लई तलवार ॥ दौरिकै पकरयो उदयसिंह ने मलखे बाँध लीन त्यहिबार १४४ देखिकै बन्धन इन्द्रसेन को मोहन आयगयो त्यहिकाल ॥ मारन लाग्यो रजपूतन को मोहन वीरशाहका लाल १४५ औरो भाई जे मोहन के तेऊ करनलागि तलवार ॥ झुके सिपाही बौरीवाले लागे करन भड़ाभड़मार १४६ पैदल पैदल कै बरणी भै औ असवार साथ असवार ॥ बड़ी लड़ाई हाथिन कीन्ह्यो घोड़न कीन टापकीमार १४७ लीन्हे साँकरि दल बादलसों हाथी करत फिरैं चिग्घार ॥ भाला छूटैं असवारन के पैदल खूब चलै तलवार १४८ झुके सिपाही मोहबेवाले इनहुन कीन घोर घमसान ॥ चौंड़ा बाम्हन के मोर्चा में कोऊ शूर नहीं समुहान १४६ सोहै चौंड़िया इकदान्ता पर हाथम लिये ढाल तलवार ॥ मोहन ठाकुर बौरी वाला सब्ज़ा घोड़ापर असवार १५० हनि हनि मारै रजपूतन का गरुई हाँक देय ललकार ॥ अभिरे क्षत्री अरुझ्वारा सों आमाझ्वारचलै तलवार १५१ जौनै हौदा ऊदन ताकैं बेंबुल तहाँ पहुँचै जाय ॥ ऊदन मारैं तलवारिन सों बेंबुल टापन देइँ गिराय १५२ भाला चमकै तहँ देवा का मोहन केरि चलै तलवार ॥ घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया मलखे सिरसाका सरदार १५३ मारि गिराये रजपूतन का कायर भागे लिहे परान ॥

चन्द्रावलि की चौथ । ३११ २६ को गति बरर्णै रणशूरन कै सम्मुख करें समर मैदान १५४ मान न रहिगे क्यहु क्षत्रिनके सब के छूटि गये अरमान ॥ बहुतक करहैं समरभूमि में अधजलपरे अनेकन जवान १५५ बहुतक सुमिरैं घर अपने को औ मन परे परे पछितायँ ॥ बहुतक क्षत्री गिरैं समर में काटे वृक्ष सरिस भहराय १५६ नदी भयङ्कर बही रकत की त्यहिमाँ गिरे ऊंट गज धाय ॥ छुरी कटारी मछली ऐसी ढालैं कछुवा परैं दिखाय १५७ परीं लहासैं तहँ मनइन की छोटी डोंगिया सम उतरायँ ॥ बहैं सिवारा जस नदिया माँ तैसे बहे बाल तहँ जायँ १५८ भूत पिशाच योगिनी नाचैं गावैं गीत बीर बैताल ॥ श्वान शृगालन की बनिआई गीधन गरे परे जयमाल १५६ चिघरैं हाथी रणमण्डल में डगरैं बड़े बड़े सरदार ॥ भगरैं मत्तखे रणशूरन ते डगरैं डारि डारि हथियार १६० रहि अभिलाषा नहिं केहू के जो फिरि करै वहाँपर मार ॥ जितने लड़का वीरशाह के बाँधे सिरसा के सरदार १६१ रहें सिपाही जे बौरी के भागे डारि ढाल तलवार ॥ भागे क्षत्रिन का मारैं ना नाहर मोहबे के सरदार १६२ रीति पुरानी इन छोड़ी ना कतहूँ समर भूमि में ज्वान ॥ पूरो क्षत्रीपन करतीं ना मरतीं नहीं समर मैदान १६३ तौ यह गावत को गाथा फिरि तजिकै सकल आपनो काम ॥ यह सब जानत है अपने मन रहिहै एक रामको नाम १६४ तबहूँ मानत है जीवन बहु तजिकै कर्म्म धर्म्म इतमाम ॥ यह नहिं जानत है अपने मन साँचो धर्मकर्म सुखधाम १६५ गये सिपाही नृप द्वारे पर औ सब हाल बताये जाय ॥

२* आल्हखण्ड । ३१२ बन्धनसुनिकै सब लड़िकनको राजा गये सनाकाखाय १६६ खबरि पहुँचिगै रनिवासे में राजा रानी लीन बुलाय ॥ बौहर आई चन्द्रावलि तहँ सोऊगई कथा सब गाय १६७ 'हमरे घरके माहिल बैरी उनके चुगुलिनका वयपार ॥ कहा मानिकै तुम माहिल का दादा किह्योयहांलग रार १६८ ना सुनिपावा मैं पहिले ते माहिलदीन्ह्यो रारि लगाय ॥ तौ अस हालत कसहोतै अब तबहीं देति सबै समुझाय १६६ योगी बनिकै ब्रह्मा आये सूरति दीख दूरि ते माय ॥ होति खटपटी जो ऊदन ते ब्रह्माभाय न अउतोधाय १७० टेक कठिन है बघऊदन कै हम खूब जानैं ठीक स्वभाव ॥ मिलिये दादा अब आल्हा ते याही जानो नीक उपाव १७१ सुनि सुनि बातें सब बौहर की रानी नृपति दीन समुझाय ॥ सुनिकै बातें महरानी की राजा ठीक लीन ठहराय १७२ आगि लगाई माहिल ठाकुर नातेदारी दीन तुराय ॥ राजा सोचत यह अपने मन पहुँचातुरतसिंहासनआय १७३ कलम दवाइति कागज लैकै । चिट्ठी लिखनलाग ततकाल ॥ जितनी बातें माहिल कहिगा लिखिगेयथातथ्यनरपाल १७४ फिरि कछु बातें चन्द्रावलिकी लम्बो पत्तो लिखा बनाय ॥ बन्धन छोरो सब पुत्रन को तुरतै विदा लेउ करवाय १७५ कीनि घटिहई माहिल ठाकुर नाहक रैसा दीन लगाय ॥ कहा मानिकै हम माहिल का साँचोसाँच गयन बौराय १७६ लिखी विधाता कै मेटै को साँचो कहैं गीत सब गाय ॥ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को राजा बैठिगये शिरनाय १७७ लैकै चिट्ठी धावन चलिभा पहुँचा जहाँ बनाफरराय ॥

चन्द्रावलि की चौथ । ३१३ ११ चिट्ठी दीन्ह्यो सो आल्हा को ठाढ़ो भयो शीशकोनाय १७८ लागि कचहरी तहँ आल्हा कै रुमि झुमि रहीं पतुरियानाच ॥ आल्हा बाँचन चिट्ठी लागे हैगा रंग भंग तहँ साँच १७६ पढ़िकै चिट्ठी आल्हा ठाकुर सबको दीन्ह्यो हाल बताय ॥ माहिल ठाकुर की किरपा ते इतना परा परिश्रमआय १८० फिकिरिम माहिल हैं ऊदनकी निश्चय समुझि परै यहिबार ॥ जाको रक्षक रघुनन्दन है ताको जाय न बाँकोबार १८१ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर बन्धन तुरत दीन छुड़वाय ॥ कहि समुझायो सबलरिकन ते राजै खबरि जनावो जाय १८२ ब्रह्मा आवत इन्द्रसेन सँग इनका बिदा देयँ करवाय ॥ माहिल मामा हमरे लागैं तातेकिहिनिदिल्लगीआय १८३ त्यहिमा सज्जन तुम महराजा सोऊ दया दीन बिसराय ॥ क्षम्यो ढिठाई अब हमरी तुम तुम्हरीशरणगये हमआय १८४ नातेदारी में उत्तमहौ आहिउ कृष्णबंश महराज ॥ गुरू श्वशुर सों संगर ठानैं क्षत्री जन्म युद्धके काज १८५ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर सबको बिदा कीन ततकाल ॥ ब्रह्मा पहुँचे बीरशाह घर औसबकह्यो बनाफरहाल १८६ सुनिकै बातें सब आल्हा की राजा बिदा दीन करवाय ॥ बैठि पालकी में चन्द्रावलि गौरा पारवती को ध्याय १८७ बहुधन दीन्हो ब्रह्मा ठाकुर महरन पलकी लीन उठाय ॥ दशहूँ लरिकिन सों महराजा आये जहाँ बनाफरराय १८८ आवत दीख्यो बीरशाह को आल्हा मिले अगारी आय ॥ मिला भेंटकरि सबसों राजा अपने धाम गये हर्षाय १८६ बाजे डंका भहतंका के आल्हा कूच दीन करवाय ॥

३१ आल्हखण्ड । ३१४ चौंड़ा सूरज दिल्ली पहुँचे आल्हा गये मोहोबे आय १६० बेटी पहुँची जब महलन में मल्हना मिली अगाड़ी धाय ॥ बारह रानी परिमालिक की बेटी देखि गई हरषाय १६१ सावन भावन गावन लागीं आवन लागि विदेशी ज्वान ॥ मल्लन कल्लन फरकन लागे थिरकनलागिमेघअसमान १६२ दादुर बोलन जलमें लागे विरहिन उठी करेजे पीर ॥ बिना पियारे घर पीतम के कैसे धरै नारि मनधीर १६३ सवैया ॥ कैसे धरै मनधीर तिया परदेश पिया ज्यहि सावन छाये । राग औरङ्ग अनंग कि जंग उमंग भरै पियकी सुधिआये ॥ गात सबै तियके सकुचात बिदेश परे पिय पेट खलाये । कहाकहूँ ललिते विधिप्रीति अनीति किरीति सदादरशाये १६४ गवैं सुहागिल सब सावन में बारामासी मेघ मलार ॥ गड़े हिंडोला हैं घर घर में दर दर सावन केरि बहार १६५ काग उड़ावन उनघर लागीं जिन घर परे पिया परदेश ॥ सावन रावन उनके लागै जिनके चिट्ठीके अन्देश १६६ नहीं तो सावन अतिपावन है गावन गीत क्यार त्यवहार ॥ हमें सुहावन मनभावन है सावनक्यारसकलव्यवहार १६७ चौथि पूरिभै चन्द्रावलि कै ह्योति होय तरंग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १६८ सेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे सावन मेघ रहे घहराय १६६ कहुँ कहुँ तारा कहुँ कहुँ वादल नभहू भयो कलियुगी आय ॥

चन्द्रावलि की चौथि। ३१५ ५३ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवौ प्रागनारायणभाय २०० रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चंद औ सूर ॥ मालिक ललिते के तवलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २०१ माथ नवावों पितु अपने को मन में रामचन्द्र को ध्याय ॥ तुम्ही खेवैया हौ नैयाके ओ रघुरैया होउ सहाय २०२ माघ कृष्ण तिथि श्रीगणेशकी ताते वार वार पदध्याय ॥ सम्बत वनइस सै पचपन में पूरों भयो आज अध्याय २०३ इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलानिवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत चन्द्रावलिचौथिपूर्णवर्णनंनाम द्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥ चन्द्रावलि की चौथि सम्पूर्ण ॥ ॥ इति ॥