आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रावलि की चौथ । ३०५ २१ पै हम त्यागी अनुरागीना लागी आश नारिधनबीच ८६ आपै त्यागी अनुरागीना तौ कस कहै नारिधन कीच ॥ साँच बखानैं हम अपनीदिशि सोई सकल नरनमें नीच ८७ पै यहु कलियुग बाबा आयो छायो रहै मनै संताप ॥ मन नहिं इस्थिर क्षणहू होवै कैसे होय मुनिन में थाप ८८ जपतै माला गायत्री के आला परब्रह्म के ध्यान ॥ यहु मन काला भाला मारै जो सब इन्द्रिनमें बलवान ८६ नीच न कहिये यहि कालामें जो कोउ साँच बिप्रको बाल ॥ युग यहु पाजी बदिकै बाजी राजानको किह्योबिहाल ६० ऐसे पाजी की राजी में सूरज बीरशाह का लाल ॥ जायकै पहुँच्यो समरभूमि में अब मलखेका सुनो हवाल ६१ सो जब दीख्यो आसमानको छाई खूब गर्द गुब्बार ॥ हँसिकै बोला रणशूरन ते सँभरो सबै शूर सरदार ९२ इतना कहतै फौजैं आईं तोपन होनलागि तहँ मार ॥ अररर अररर तोपैं छूटीं हाथिन घोर कीन चिग्घार ६३ को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी भयो भयङ्कर मार ॥ नावैं गोला जौनी दिशिको तौनी दिशिकोकरैं चिथार ९४ सवैया ॥ भभकार उठैं तहँ गोलन की फुफकार करैं रण में गजराजा । धुधकार नगारनकी गमकी चमकी तलवारि जुरे सबराजा ॥ अपार जुझार करैं तहँ मार न डरैं मन नेकहु एकहुसाजा । समाजऔसाजदोऊदिशिमें अबलैरैललितेसबहीजयकाजा६५ बड़ी लड़ाई भै तोपन कै लोपे अन्धकार सों भान ॥ २०