आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ आल्हखण्ड । ३०६ छाय अँधेरिया गै दशहूंदिशि कतहूँ न सूझै अपन विरान ६६ धावा ह्वैगा दोऊ दल का दोऊ भये बरोबरि आय ॥ सूरजठाकुर बौरी वाला सिरसा क्यार बनाफरराय ९७ दोऊ सोहैं भल घोड़नपर लीन्हे हाथ ढाल तलवार ॥ द्वउ ललकारन मारन लागे सम्मुख होत होत सरदार ९८ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़ा महौतनक्यार ॥ हौदा हौदा यकमिल ह्वैगा औ असवार साथ असवार ९९ कल्ला भिड़िगे असवारन के लागी होन भड़ाभड़ मार ॥ छूटे ऊना लण्डन वाले कोताखानी चलीं कटार १०० बिजुली दमकै कउँधा चमकै तैसे धमकिरही तलवार ॥ मलखे ठाकुर शूर जुरावर दोऊ लड़नलागि सरदार १०१ सूरज ऊदन की भेंटन में लेंटनलागि सिपाही ज्वान ॥ परे लपेटे भट भेटे जे लेटे समर भूमि मैदान १०२ मनो ससंटे यम भेटे में लेटे क्षत्री परम जुझार ॥ वहैं पनारा तहँ रक्तन के औ हिलकारा उठै अपार १०३ को गति बरौँ तहँ पैदल की बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ अपन परावा कछु सूझैना जूझै जूझ जूझ त्यहिबार १०४ बड़ी लड़ाई भै बौरीगढ़ मलखे सूरज के मैदान ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान १०५ बड़ा लड़ैया सिरसा वाला ज्यहिते हारि गई तलवार ॥ घोड़ी कबूतरी रणमें नाचे साँचे शूरवीर सरदार १०६ सूरज बोले तिन मलखे ते ठाकुर मानो कही हमार ॥ लौटि महोबे जल्दी जावो तबहीं कुशलरखाकरतार १०७ इतना सुनिके मलखे बोले तुमते साँच देयँ बतलाय ॥