भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 306

चन्द्रावलि की चौथि। ३०३ २१ झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथम लीन ढाल तलवार ६२ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कोताखानी लीन कटार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार ६३ सजा बेंदुला का चढ़वैया लाला-देशराज का लाल ॥ को गति बरणै मलखाने कै जाको डरै देखि नरपाल ६४ बड़ा लड़ैया भीषमवाला देवा मैनपुरी चौहान ॥ ब्रह्मा ठाकुर सजि ठाढ़ो भो करिकै रामचन्द्रको ध्यान ६५ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बन्दी कीन समरपद गान ॥ बाजे डंका अहलंका के घूमनलागे लाल निशान ६६ हिंया कि गाथा ऐसी गुजरी सुनिये बीरशाहको हाल ॥ सुरज जुरावर दोउ पुत्रन को तुरतै बोलि लीन नरपाल ६७ करो तयारी समरभूमिकै अपनी फौज लेउ सजवाय ॥ जान न पावैं मोहबेवाले सबकी कटा देउ करवाय ६८ हुकुम पायकै महराजा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥ सजे सिपाही बौरी वाले मनमाँ श्रीगणेशपदध्याय ६९ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ सजि इकदन्ता दुइदन्ता गे तिनपर हौदा रहे बिराज ७० कच्छी मच्छी नकुला सब्जा हरियल मुश्की घोड़ अपार ॥ ताजी तुरकी पँचकल्यानी सुरखा सुरँगा भये तयार ७१ चढ़ि अलबेला तिन घोड़नपर अपने बांधि लये हथियार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे हाथम लिये ढाल तलवार ७२ वार्जी तुरही मुरही ऐसी पुप्पूं पुप्पूं परा सुनाय ॥ बाजे डफला अलबेला सब शूरन मेला दीन लगाय ७३ मारु मारु करि मौहरि वार्जी वार्जी हाय हाय करनाल ॥