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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

चन्द्रावलि की चौथि। ३०३ २१ झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथम लीन ढाल तलवार ६२ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कोताखानी लीन कटार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार ६३ सजा बेंदुला का चढ़वैया लाला-देशराज का लाल ॥ को गति बरणै मलखाने कै जाको डरै देखि नरपाल ६४ बड़ा लड़ैया भीषमवाला देवा मैनपुरी चौहान ॥ ब्रह्मा ठाकुर सजि ठाढ़ो भो करिकै रामचन्द्रको ध्यान ६५ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बन्दी कीन समरपद गान ॥ बाजे डंका अहलंका के घूमनलागे लाल निशान ६६ हिंया कि गाथा ऐसी गुजरी सुनिये बीरशाहको हाल ॥ सुरज जुरावर दोउ पुत्रन को तुरतै बोलि लीन नरपाल ६७ करो तयारी समरभूमिकै अपनी फौज लेउ सजवाय ॥ जान न पावैं मोहबेवाले सबकी कटा देउ करवाय ६८ हुकुम पायकै महराजा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥ सजे सिपाही बौरी वाले मनमाँ श्रीगणेशपदध्याय ६९ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ सजि इकदन्ता दुइदन्ता गे तिनपर हौदा रहे बिराज ७० कच्छी मच्छी नकुला सब्जा हरियल मुश्की घोड़ अपार ॥ ताजी तुरकी पँचकल्यानी सुरखा सुरँगा भये तयार ७१ चढ़ि अलबेला तिन घोड़नपर अपने बांधि लये हथियार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे हाथम लिये ढाल तलवार ७२ वार्जी तुरही मुरही ऐसी पुप्पूं पुप्पूं परा सुनाय ॥ बाजे डफला अलबेला सब शूरन मेला दीन लगाय ७३ मारु मारु करि मौहरि वार्जी वार्जी हाय हाय करनाल ॥

२२ आल्हाखण्ड । ३०४ खर खर खर डर कै रथ दौरे रव्वा चले पवनकी चाल ७४ सुर्खा घोड़ा चढ़ जुरावर सूरज सब्जापर असवार ॥ सुमिरि भवानी सुत गणेश को दोऊ चलन भये सरदार ७५ घोड़न वरणों की असवारन पैदर सेना तीस हजार ॥ तीन सहस हाथिन पर सोहैं बाँके यादव परम जुझार ७६ बाम्हन थोरे क्षत्री ज्यादा लीन्हे कठिन धार तलवार ॥ गर्ज्जति आवैं समरभूमि को एकते एक शूर सरदार ७७ कायर हल्ला खलभल्ला में तल्ला छोड़ि प्राण के दीन ॥ खुशी छायगै मन शूरन के मानों जीति इन्द्रपुर लीन ७८ बजे नगारा ठनकारा के दारा गर्भपात सुनिकीन ॥ गये दरारा उर कायर के सायर सत्यसत्य कहिदीन ७६ उइ धिरकारैं अपने तनका मनमाँ बार बार पछितायँ ॥ भैंसि वियानी घर हमरे मा माठा दूध केर अधिकाय ८० हाय रुपैया मोरे डारैं लीन्हे समरभूमि को जायँ ॥ दैया मैया भैया कहिकै ज्वैया हेतु बहुत पछितायँ ८१ शूर यशोमति मैया वाले भैया गैयन के चरवाह ॥ नाव खिवैया भवसागर के नागर कृष्णचन्द्र नरनाह ८२ तिनका सुमिरण मन अन्तर करि तत्पर भये स्वामि के काज ॥ करि अभिलाषा समरभूमि कै राखे मनै धर्म की लाज ८३ पढ़ि अशलोक न तजि शोकन को लोकन केर मिले जनुराज ॥ तैसे गाने मनअन्तर में बाजे तहाँ शूर शिरताज ८४ बाजे बाजे बाजे सुनिकै लाजे मनै आपने बीच ॥ तिनको कहियत हम अपनी दिशि जानो सकल नरन में नीच ८५ इम अनुमाना मन अपने है जाना नारि वित्तको कीच ॥

चन्द्रावलि की चौथ । ३०५ २१ पै हम त्यागी अनुरागीना लागी आश नारिधनबीच ८६ आपै त्यागी अनुरागीना तौ कस कहै नारिधन कीच ॥ साँच बखानैं हम अपनीदिशि सोई सकल नरनमें नीच ८७ पै यहु कलियुग बाबा आयो छायो रहै मनै संताप ॥ मन नहिं इस्थिर क्षणहू होवै कैसे होय मुनिन में थाप ८८ जपतै माला गायत्री के आला परब्रह्म के ध्यान ॥ यहु मन काला भाला मारै जो सब इन्द्रिनमें बलवान ८६ नीच न कहिये यहि कालामें जो कोउ साँच बिप्रको बाल ॥ युग यहु पाजी बदिकै बाजी राजानको किह्योबिहाल ६० ऐसे पाजी की राजी में सूरज बीरशाह का लाल ॥ जायकै पहुँच्यो समरभूमि में अब मलखेका सुनो हवाल ६१ सो जब दीख्यो आसमानको छाई खूब गर्द गुब्बार ॥ हँसिकै बोला रणशूरन ते सँभरो सबै शूर सरदार ९२ इतना कहतै फौजैं आईं तोपन होनलागि तहँ मार ॥ अररर अररर तोपैं छूटीं हाथिन घोर कीन चिग्घार ६३ को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी भयो भयङ्कर मार ॥ नावैं गोला जौनी दिशिको तौनी दिशिकोकरैं चिथार ९४ सवैया ॥ भभकार उठैं तहँ गोलन की फुफकार करैं रण में गजराजा । धुधकार नगारनकी गमकी चमकी तलवारि जुरे सबराजा ॥ अपार जुझार करैं तहँ मार न डरैं मन नेकहु एकहुसाजा । समाजऔसाजदोऊदिशिमें अबलैरैललितेसबहीजयकाजा६५ बड़ी लड़ाई भै तोपन कै लोपे अन्धकार सों भान ॥ २०

२४ आल्हखण्ड । ३०६ छाय अँधेरिया गै दशहूंदिशि कतहूँ न सूझै अपन विरान ६६ धावा ह्वैगा दोऊ दल का दोऊ भये बरोबरि आय ॥ सूरजठाकुर बौरी वाला सिरसा क्यार बनाफरराय ९७ दोऊ सोहैं भल घोड़नपर लीन्हे हाथ ढाल तलवार ॥ द्वउ ललकारन मारन लागे सम्मुख होत होत सरदार ९८ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़ा महौतनक्यार ॥ हौदा हौदा यकमिल ह्वैगा औ असवार साथ असवार ९९ कल्ला भिड़िगे असवारन के लागी होन भड़ाभड़ मार ॥ छूटे ऊना लण्डन वाले कोताखानी चलीं कटार १०० बिजुली दमकै कउँधा चमकै तैसे धमकिरही तलवार ॥ मलखे ठाकुर शूर जुरावर दोऊ लड़नलागि सरदार १०१ सूरज ऊदन की भेंटन में लेंटनलागि सिपाही ज्वान ॥ परे लपेटे भट भेटे जे लेटे समर भूमि मैदान १०२ मनो ससंटे यम भेटे में लेटे क्षत्री परम जुझार ॥ वहैं पनारा तहँ रक्तन के औ हिलकारा उठै अपार १०३ को गति बरौँ तहँ पैदल की बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ अपन परावा कछु सूझैना जूझै जूझ जूझ त्यहिबार १०४ बड़ी लड़ाई भै बौरीगढ़ मलखे सूरज के मैदान ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान १०५ बड़ा लड़ैया सिरसा वाला ज्यहिते हारि गई तलवार ॥ घोड़ी कबूतरी रणमें नाचे साँचे शूरवीर सरदार १०६ सूरज बोले तिन मलखे ते ठाकुर मानो कही हमार ॥ लौटि महोबे जल्दी जावो तबहीं कुशलरखाकरतार १०७ इतना सुनिके मलखे बोले तुमते साँच देयँ बतलाय ॥

चन्द्रावलि की चौथ । ३०७ २५ बिदा कराये बिन जैबैना बहुतनधजीधजीउड़िजाय १०८ सूरज बोले मलखाने ते यह नहिं होनहार यहिबार ॥ इतना कहिकै सूरज ठाकुर अपनी खैंचिलीनतलवार १०६ ऐंचिकै मारा मलखाने के मलखे लीन ढालपर वार ॥ आल्हा बोले मलखाने ते ठाकुर सिरसा के सरदार ११० पकरिकै बाँधो तुम सूरज को इनपर करो नहीं अब वार ॥ गरुहर नाते के लड़िकाहैं मानों सिरसाके सरदार १११ सुनिकै बातें ये आल्हा की तुरतै उतरिपरा मलखान ॥ पकरिकै बाँध्यो रणमण्डल में देखें खड़े अनेकन ज्वान ११२ सूरज बन्धन दीख जुरावर पहुँचा तुरत तहाँ पर आय ॥ औ ललकारा मलखाने को ठाढ़े होउ बनाफरराय ११३ इतना सुनिकै बघऊदन ने तुरतै पकरि जुरावर लीन ॥ उतरि कबुतरी ते मलखाने बन्धनतुरत तहाँपर कीन ११४ दूनों लरिका बीरशाह के आल्हाठाकुर लीन बँधाय ॥ भागीं फौजैं बौरीगढ़ की काहू धरा धीर ना जाय ११५ खबरि सुनाई बीरशाह को क्षत्रिन नीचे शीश नवाय ॥ बन्धन सुनिकै दउ पुत्रन को दुखिया भयो यादवाराय ११६ इन्द्रसेन औ मोहन बेटा इनको तुरत लीन बुलवाय ॥ हाल बतायो समरभूमि को आशिर्वाद दीन हर्षाय ११७ करो तयारी सब भाइन सह आल्है पकरि दिखावो आय ॥ इतना सुनिकै सबियाँ बेटा चलिभे राजै शीश नवाय ११८ आयकै पहुँचे निज सेनन में डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अहर्तंका के हाहाकार शब्द गा छाय ११९ पहिल नगारा में जिन बन्दी डंके शूर भये हुशियार ॥

२६ आल्हाखण्ड । ३०८ तिसर नगारा के बाजत खन क्षत्री समर हेतु तैयार १२० ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ॥ रण की मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार १२१ चालिमै सेना बौरीगढ़ सों हाहाकारी परै सुनाय ॥ घरी मुहूरत के अन्तर में पहुँचे समरभूमिमें आय १२२ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे देवा मैनपुरी चौहान ॥ सब रणशूरन त्यहि समया में भारी भीर दीख मैदान १२३ उड़ी कबुतरी मलखाने की हौदन उपर पहुँची जाय ॥ मलखे मारै तलवारिन सों घोड़ी देय टापके घाय १२४ मोहन ठाकुर उदयसिंह को परिगा समर बरोबरि आय ॥ भई कसामसि समरभूमि में औ तिलडरा भुईं ना जाय १२५ को गति वरणै रजपूतन कै दूनों हाथ करैं तलवार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार १२६ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिलारै गाय ॥ तैसे मारै मलखे ठाकुर कायर भागैं पीठ दिखाय १२७ है मर्दाना जिनको बाना ते नर करें तहाँ पर मार ॥ को गति वरणै इन्द्रसेन कै दूनों हाथ करैं तलवार १२८ बड़े लड़ैया बौरी वाले मानैं नहीं समर में हार ॥ ना मुँह फेरैं मोहबे वाले दोऊ कठिन मचाई रार १२६ गिरैं कगारा जस नदिया माँ तैसे गिरैं ऊंट गज धाय ॥ परीं लहासें रणशूरन की तिनपर रहे गीध मड़राय १३० गोली ओली कतहूँ बरसें कतहूँ कठिन चलै तलवार ॥ छुरी कटारी कोऊ मारैं कोऊ कड़ावीन की मार १३१ गदा के ऊपर गदा चलावैं ढालन मारैं ढाल घुमाय ॥

चन्द्रावलि की चौथ। ३०६ .२७ झर सर मारैं तलवारिन सों तीरन मन्न मन्न गा छाय १३२ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ! भम्भम् भम्भम् झीलम झलकें नीलम रंग परै दिखराय १३३ चम् चम् चम् चम् भाला चमकैं दमकैं उडुगण मनों अका़श ॥ बम् बम् बम् बम् क्षंत्री बँचकें भभकैं शूरनकेर प्रकाश १३४ सवैया ॥ आश करें नहिं प्राणन की ललिते रणशूरन रीति सदाहै। प्राण कि नाश कि कीर्त्ति प्रकाश कि आश नहीं सुख या बिपदाहै ॥ बीर कि शान कि आन कि मान कि ठानठने मलखान यदाहै। शान कि आन करे रणज्वान सो प्राणपयान कियेयीतदाहै १३५ को गति बरणै मलखाने कै रणमाँ कठिन करै तलवार ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया नाहर उदयसिंह सरदार १३६ गनि गनि मारै राजपूतन का बेटा देशराज का लाल ॥ मोहनठाकुर बौरी वाला आला बीरशाहका बाल १३७ बिकट लड़ाई की संयुग में कायर भागे लिहे परान ॥ बड़ा लड़ैया भीषमवाला आला मैनपुरी चौहान १३८ लड़ै चौंड़िया दिल्लीवाला बेटा लड़ै पिथौराकयार ॥ को गति बरणै इन्द्रसेन कै दूनों हाथ करै तलवार १३६ मलखे बोले इन्द्रसेन से , जीजा मानों कही हमार ॥ बहिनी बेही तुम्हरे घरमाँ तुमते सदा हमारीहार १४० अबै मसाला कछु बिगराना अनभल नहीं कीन कर्त्तार ॥ बिदा कराये बिन जैबे ना मानो सत्यवचन सरदार १४१ फौजैं प्यारो समरभूमि ते बौरी जाउ आप ततकाल ॥

३८ आल्हखण्ड । ३१० तुम समुझावो महराजा को काहे रारि करें नरपाल १४२ इतना सुनिकै इन्द्रसेन ने गरुई हाँक कीन ललकार ॥ काह हकीकति तुम राखतिहौ जावो विदाकरावत द्वार १४३ इतना कहिकै इन्द्रसेन ने अपनी खैंचि लई तलवार ॥ दौरिकै पकरयो उदयसिंह ने मलखे बाँध लीन त्यहिबार १४४ देखिकै बन्धन इन्द्रसेन को मोहन आयगयो त्यहिकाल ॥ मारन लाग्यो रजपूतन को मोहन वीरशाहका लाल १४५ औरो भाई जे मोहन के तेऊ करनलागि तलवार ॥ झुके सिपाही बौरीवाले लागे करन भड़ाभड़मार १४६ पैदल पैदल कै बरणी भै औ असवार साथ असवार ॥ बड़ी लड़ाई हाथिन कीन्ह्यो घोड़न कीन टापकीमार १४७ लीन्हे साँकरि दल बादलसों हाथी करत फिरैं चिग्घार ॥ भाला छूटैं असवारन के पैदल खूब चलै तलवार १४८ झुके सिपाही मोहबेवाले इनहुन कीन घोर घमसान ॥ चौंड़ा बाम्हन के मोर्चा में कोऊ शूर नहीं समुहान १४६ सोहै चौंड़िया इकदान्ता पर हाथम लिये ढाल तलवार ॥ मोहन ठाकुर बौरी वाला सब्ज़ा घोड़ापर असवार १५० हनि हनि मारै रजपूतन का गरुई हाँक देय ललकार ॥ अभिरे क्षत्री अरुझ्वारा सों आमाझ्वारचलै तलवार १५१ जौनै हौदा ऊदन ताकैं बेंबुल तहाँ पहुँचै जाय ॥ ऊदन मारैं तलवारिन सों बेंबुल टापन देइँ गिराय १५२ भाला चमकै तहँ देवा का मोहन केरि चलै तलवार ॥ घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया मलखे सिरसाका सरदार १५३ मारि गिराये रजपूतन का कायर भागे लिहे परान ॥

चन्द्रावलि की चौथ । ३११ २६ को गति बरर्णै रणशूरन कै सम्मुख करें समर मैदान १५४ मान न रहिगे क्यहु क्षत्रिनके सब के छूटि गये अरमान ॥ बहुतक करहैं समरभूमि में अधजलपरे अनेकन जवान १५५ बहुतक सुमिरैं घर अपने को औ मन परे परे पछितायँ ॥ बहुतक क्षत्री गिरैं समर में काटे वृक्ष सरिस भहराय १५६ नदी भयङ्कर बही रकत की त्यहिमाँ गिरे ऊंट गज धाय ॥ छुरी कटारी मछली ऐसी ढालैं कछुवा परैं दिखाय १५७ परीं लहासैं तहँ मनइन की छोटी डोंगिया सम उतरायँ ॥ बहैं सिवारा जस नदिया माँ तैसे बहे बाल तहँ जायँ १५८ भूत पिशाच योगिनी नाचैं गावैं गीत बीर बैताल ॥ श्वान शृगालन की बनिआई गीधन गरे परे जयमाल १५६ चिघरैं हाथी रणमण्डल में डगरैं बड़े बड़े सरदार ॥ भगरैं मत्तखे रणशूरन ते डगरैं डारि डारि हथियार १६० रहि अभिलाषा नहिं केहू के जो फिरि करै वहाँपर मार ॥ जितने लड़का वीरशाह के बाँधे सिरसा के सरदार १६१ रहें सिपाही जे बौरी के भागे डारि ढाल तलवार ॥ भागे क्षत्रिन का मारैं ना नाहर मोहबे के सरदार १६२ रीति पुरानी इन छोड़ी ना कतहूँ समर भूमि में ज्वान ॥ पूरो क्षत्रीपन करतीं ना मरतीं नहीं समर मैदान १६३ तौ यह गावत को गाथा फिरि तजिकै सकल आपनो काम ॥ यह सब जानत है अपने मन रहिहै एक रामको नाम १६४ तबहूँ मानत है जीवन बहु तजिकै कर्म्म धर्म्म इतमाम ॥ यह नहिं जानत है अपने मन साँचो धर्मकर्म सुखधाम १६५ गये सिपाही नृप द्वारे पर औ सब हाल बताये जाय ॥

२* आल्हखण्ड । ३१२ बन्धनसुनिकै सब लड़िकनको राजा गये सनाकाखाय १६६ खबरि पहुँचिगै रनिवासे में राजा रानी लीन बुलाय ॥ बौहर आई चन्द्रावलि तहँ सोऊगई कथा सब गाय १६७ 'हमरे घरके माहिल बैरी उनके चुगुलिनका वयपार ॥ कहा मानिकै तुम माहिल का दादा किह्योयहांलग रार १६८ ना सुनिपावा मैं पहिले ते माहिलदीन्ह्यो रारि लगाय ॥ तौ अस हालत कसहोतै अब तबहीं देति सबै समुझाय १६६ योगी बनिकै ब्रह्मा आये सूरति दीख दूरि ते माय ॥ होति खटपटी जो ऊदन ते ब्रह्माभाय न अउतोधाय १७० टेक कठिन है बघऊदन कै हम खूब जानैं ठीक स्वभाव ॥ मिलिये दादा अब आल्हा ते याही जानो नीक उपाव १७१ सुनि सुनि बातें सब बौहर की रानी नृपति दीन समुझाय ॥ सुनिकै बातें महरानी की राजा ठीक लीन ठहराय १७२ आगि लगाई माहिल ठाकुर नातेदारी दीन तुराय ॥ राजा सोचत यह अपने मन पहुँचातुरतसिंहासनआय १७३ कलम दवाइति कागज लैकै । चिट्ठी लिखनलाग ततकाल ॥ जितनी बातें माहिल कहिगा लिखिगेयथातथ्यनरपाल १७४ फिरि कछु बातें चन्द्रावलिकी लम्बो पत्तो लिखा बनाय ॥ बन्धन छोरो सब पुत्रन को तुरतै विदा लेउ करवाय १७५ कीनि घटिहई माहिल ठाकुर नाहक रैसा दीन लगाय ॥ कहा मानिकै हम माहिल का साँचोसाँच गयन बौराय १७६ लिखी विधाता कै मेटै को साँचो कहैं गीत सब गाय ॥ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को राजा बैठिगये शिरनाय १७७ लैकै चिट्ठी धावन चलिभा पहुँचा जहाँ बनाफरराय ॥

चन्द्रावलि की चौथ । ३१३ ११ चिट्ठी दीन्ह्यो सो आल्हा को ठाढ़ो भयो शीशकोनाय १७८ लागि कचहरी तहँ आल्हा कै रुमि झुमि रहीं पतुरियानाच ॥ आल्हा बाँचन चिट्ठी लागे हैगा रंग भंग तहँ साँच १७६ पढ़िकै चिट्ठी आल्हा ठाकुर सबको दीन्ह्यो हाल बताय ॥ माहिल ठाकुर की किरपा ते इतना परा परिश्रमआय १८० फिकिरिम माहिल हैं ऊदनकी निश्चय समुझि परै यहिबार ॥ जाको रक्षक रघुनन्दन है ताको जाय न बाँकोबार १८१ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर बन्धन तुरत दीन छुड़वाय ॥ कहि समुझायो सबलरिकन ते राजै खबरि जनावो जाय १८२ ब्रह्मा आवत इन्द्रसेन सँग इनका बिदा देयँ करवाय ॥ माहिल मामा हमरे लागैं तातेकिहिनिदिल्लगीआय १८३ त्यहिमा सज्जन तुम महराजा सोऊ दया दीन बिसराय ॥ क्षम्यो ढिठाई अब हमरी तुम तुम्हरीशरणगये हमआय १८४ नातेदारी में उत्तमहौ आहिउ कृष्णबंश महराज ॥ गुरू श्वशुर सों संगर ठानैं क्षत्री जन्म युद्धके काज १८५ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर सबको बिदा कीन ततकाल ॥ ब्रह्मा पहुँचे बीरशाह घर औसबकह्यो बनाफरहाल १८६ सुनिकै बातें सब आल्हा की राजा बिदा दीन करवाय ॥ बैठि पालकी में चन्द्रावलि गौरा पारवती को ध्याय १८७ बहुधन दीन्हो ब्रह्मा ठाकुर महरन पलकी लीन उठाय ॥ दशहूँ लरिकिन सों महराजा आये जहाँ बनाफरराय १८८ आवत दीख्यो बीरशाह को आल्हा मिले अगारी आय ॥ मिला भेंटकरि सबसों राजा अपने धाम गये हर्षाय १८६ बाजे डंका भहतंका के आल्हा कूच दीन करवाय ॥

३१ आल्हखण्ड । ३१४ चौंड़ा सूरज दिल्ली पहुँचे आल्हा गये मोहोबे आय १६० बेटी पहुँची जब महलन में मल्हना मिली अगाड़ी धाय ॥ बारह रानी परिमालिक की बेटी देखि गई हरषाय १६१ सावन भावन गावन लागीं आवन लागि विदेशी ज्वान ॥ मल्लन कल्लन फरकन लागे थिरकनलागिमेघअसमान १६२ दादुर बोलन जलमें लागे विरहिन उठी करेजे पीर ॥ बिना पियारे घर पीतम के कैसे धरै नारि मनधीर १६३ सवैया ॥ कैसे धरै मनधीर तिया परदेश पिया ज्यहि सावन छाये । राग औरङ्ग अनंग कि जंग उमंग भरै पियकी सुधिआये ॥ गात सबै तियके सकुचात बिदेश परे पिय पेट खलाये । कहाकहूँ ललिते विधिप्रीति अनीति किरीति सदादरशाये १६४ गवैं सुहागिल सब सावन में बारामासी मेघ मलार ॥ गड़े हिंडोला हैं घर घर में दर दर सावन केरि बहार १६५ काग उड़ावन उनघर लागीं जिन घर परे पिया परदेश ॥ सावन रावन उनके लागै जिनके चिट्ठीके अन्देश १६६ नहीं तो सावन अतिपावन है गावन गीत क्यार त्यवहार ॥ हमें सुहावन मनभावन है सावनक्यारसकलव्यवहार १६७ चौथि पूरिभै चन्द्रावलि कै ह्योति होय तरंग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १६८ सेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे सावन मेघ रहे घहराय १६६ कहुँ कहुँ तारा कहुँ कहुँ वादल नभहू भयो कलियुगी आय ॥

चन्द्रावलि की चौथि। ३१५ ५३ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवौ प्रागनारायणभाय २०० रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चंद औ सूर ॥ मालिक ललिते के तवलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २०१ माथ नवावों पितु अपने को मन में रामचन्द्र को ध्याय ॥ तुम्ही खेवैया हौ नैयाके ओ रघुरैया होउ सहाय २०२ माघ कृष्ण तिथि श्रीगणेशकी ताते वार वार पदध्याय ॥ सम्बत वनइस सै पचपन में पूरों भयो आज अध्याय २०३ इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलानिवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत चन्द्रावलिचौथिपूर्णवर्णनंनाम द्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥ चन्द्रावलि की चौथि सम्पूर्ण ॥ ॥ इति ॥

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अथ आल्हखण्ड ॥ बलखबुखारे की लड़ाई अथवा इन्दल हरण व विवाह वर्णन ॥ सवैया ॥ बाजत झांझ मृदंग तहाँ औ सबै मुरचंगनसों स्वर गावैं । बाजत तार सितारनके यकत इनकी गति कौन बतावैं ॥ राजत बीण तहाँ तबला अवर जहँ झुंडन झुंडन आवैं । गाजत कृष्ण तहाँ ललिते अब जहाँ शिव गोपीरूप बनावैं १ सुमिरन ॥ मैया भैया और बपैया सब दिशि देखा खूब निहार ॥ बिना चरैया गैयावाला दैया कौन होय रखवार १ बूड़ै नैया भवसागर में कोउ न मिलै खिवैया हाल ॥ मैया यशुमति केर कन्हैया भैया साँच कहैं सुरपाल २ पारलगैया म्वरि नैया के गैयापाल कृष्ण महराज ॥ और खेवैया को नैया का जाकीशरण लेयँ हम आज ३

२ आल्हखण्ड । ३१८ तुम्ही गुसैयाँ दीनबन्धु हौ ओ ब्रह्मण्यदेव ब्रजराज ॥ लाज रखैया बाम्हन तनकी साँचे एक कृष्ण महराज ४ शरणहि ताकत विप्र सुदामा पायो सकल सम्पदा राज ॥ छूटि सुमिरनी गई कृष्ण की इन्दल ब्याह बखानों आज ५ अथ कथाप्रसंग ॥ परब दशहरा की जग जाहिर बुड़की हेतु जाय संसार ॥ भारी मेला श्रीगंगा को हिंडनक्यार पूर त्यवहार १ बहुतक छैला अलबेला तहँ घोड़न उपर भये असवार ॥ करी तयारी श्रीगंगा की चक्कस लिये बुलबुलनक्यार २ जेठदुपहरी भारी ह्वैकै ब्यारी करैं वृक्षतर आय ॥ देखि गँवाँरी तहँ नारी नर बोला तुरत बनाफरराय ३ कहाँ तयारी नर नारी करि ब्यारी किह्यो यहाँपर आय ॥ देखि बनाफर को नर नारी बोले साँच देयँ बतलाय ४ कीन तयारी हम विठूर की भारी पर्ब दशहरा केरि ॥ चकित ह्वैकै ऊदन दीख्य चारिउ दिशातर्फ फिरिहेरि ५ भारी मेला अलबेला तहँ रेला चला जाय सबराह ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया आयो जहाँ बैठ नरनाह ६ हाथ जोरिकै तहँ आल्हा के ऊदन बोले शीश नवाय ॥ करें तयारी हम गंगा की दादा हुकुमदेउ फरमाय ७ इतना सुनिकै आल्हा बोले साँची सुनो लहुरवा भाय ॥ देश देशके राजा अइहैं होई भीर भार अधिकाय ८ रारि मचैहौ तुम मेला में हमपर ऐरी आपदा आय ॥ ताते जावो नहिं मेला को मानो कही लहुरवा भाय ९ इतना सुनिकै माहिल बोले तुम सुनिलेउ बनाफरराय ॥

इन्दलहरण । २१६ ३. लड़िका ऊदन अब नाहीं हैं जो तहँ रारि मचैहैं जाय १० बातें सुनिकै ये माहिल की आल्हा बोले बचन बनाय ॥ तुम चलिजावो माहिल मामा तौ हम ऊदन देयँ पठाय ११ इतना सुनिकै माहिल बोले हम तो करब जाय असनान ॥ करो तयारी ऊदनठाकुर आल्हाबचन मानिपरमान १२ आल्हा बोले फिरि देबाते तुमहूं जाउ साथ यहिकाल ॥ पै तुम बच्यो बघऊदन को जहँपर होय रारिको हाल १३ इतना कहिकै आल्हाठाकुर महलन फेरिगयो अलसाय ॥ करै तयारी ऊदन लागे बाँके घोड़ लीन कसवाय १४ कच्छी मच्छी हरियल मुश्की सुर्खा सुरंगा रङ्ग बिरंग ॥ तुर्का गर्रा पँचकल्यानी सब्ज़ा स्याह एकही रंग १५ चुने सिपाही लिये संग में जिनते हारिगई तलवार ॥ संजा रिसाला घोड़नवाला लग भग जानो एक हजार १६ सजे सिपाही पंद्रासौ लग एकते एक लड़ैया ज्वान ॥ बाजे डंका अहर्तंका के घूमन लागे लाल निशान १७ इन्दल आये त्यहि समया में ऊदन पास पहुंचे आय ॥ हमहूं चलिबे श्री गंगा को चाचा लेवो साथ लिवाय १८ इतना सुनिकै ऊदन बोले बेटा मानो कही हमार ॥ दादा भौजी जो रोकैं ना हमरे साथ होउ तय्यार १६ इन्दल चलिभे तब महलन को माता पास पहुंचे जाय ॥ हाथ जोरिकै इन्दल बोले मातैं बार बार शिरनाय २० हुकुम कराय देउ दडुवा सों आवों चाचा साथ नहाय ॥ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटै बारबार समुझाय २१ पर्व दशहरा की टरिजावै फिरि तुम आयो गङ्ग नहाय ॥

४ आल्हखण्ड । ५२० भारी मेला है बिठूर का जो तुम जेहो पूत हिराय २२ हौ इकलौता म्वरी कोखि में ताते मोर प्राण घबड़ाय ॥ इतना सुनिकै इन्दल बोले माता साँच देयँ बतलाय २३ जान न पावैं जो गंगा को तौ मरिजयँ जहरको खाय ॥ हुकुम देवावै की दइवाते की अब घेरै बैठि पछिताय २४ सुनिकै बातें ये इन्दल की सुनवाँ गई सनाका खाय ॥ गई तड़ाका ढिग आल्हा के इन्दल हाल बतावा जाय २५ बातें सुनिकै सब सुनवाँ की आल्हा बोले वचन सुनाय ॥ लिखी विधाता की मेटै को अब तुम देवो पूत पठाय २६ जहर खायकै जो मरिजाई तौहू शोच होय अधिकाय ॥ पार लगैहैं श्रीगंगाजी यहमत ठीक लीन ठहराय २७ इतना सुनिकै सुनवाँ चलिभै इन्दल पास पहुँची आय ॥ औ बुलवायो बघऊदन को सबियाँ हाल कह्यो समुझाय २८ इन्दल बिगरे हैं महलन में गंगा इन्हें देउ अन्हवाय ॥ पै हम सौंपति त्वहिं इन्दलको देवर बार बार शिरनाय २९ किह्यो बखेड़ा नहिं मेला मैं रेला होय तहाँ अधिकाय ॥ वहाँ न जायो इन्दल लैकेँ मान्यो कही वनाफरराय ३० इतना सुनिकै ऊदन इन्दल दोऊ चलिभे शीश नवाय ॥ जायकै पहुँचे फिरि फौजन में लश्कर कूच दीन करवाय ३१ बायें घोड़ा है देवा का दहिने बेंदुल का असवार ॥ बीच म जावै इन्दल ठाकुर कम्मर परी एक तलवार ३२ पांच दिनौना मारग लागे छठयें दिवस पहुंचे जाय ॥ भारी मेला भा बिठूर मौ आवा तहां कनौजीराय ३३ बाजै डंका तहँ ऊदन का लाखनि धावन लीन बुलाय ॥

[Page Header] इन्दलहरण । ३२१ ५

कहि समुझावा त्यहि धावनको डंका बन्द देउ करवाय ३४ हुकुम कनौजी का नाहीं है डंका कोऊ बजावै आय ॥ इतना सुनिकै धावन चलिकै डंका बजत दीन रुकवाय ३५ कहा न मान्यो जब बघऊदन देवा ठाकुर उठा रिसाय ॥ तुम्हें मुनासिव यह चहिये ना सबसों बैर बढ़ावो भाय ३६ चलिकै मिलिये अब लाखनिसों उनसों हुकुम लेउ करवाय ॥ हीनी तुम्हरी कछु हैहै ना मानो कही बनाफरराय ३७ सुनिकै बातें ये देवा की ऊदन मानिगयो त्यहिकाल ॥ पाँच दुमाला दुइ हीरा लै चलिभा देशराजका लाल ३८ नचै पतुरिया त्यहि तम्बूमें ज्यहिमें रहें कनौजीराय ॥ ऊदन ठाकुर तहँ पहुँचतभा राखी भेंट अगाड़ी जाय ३६ हाथ पकरिकै लाखनिराना अपने पास लीन बैठाय ॥ कही हकीकति बघऊदन ने लाखनिहुकुमदीनफरमाय ४० बाजै डंका इक ऊदन का औरन बन्द देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे तम्बुन फेरि पहुंचे आय ४१ सुनो हकीकति अभिनन्दनकी हंसा ताको राजकुमार ॥ त्यहिकी बेटी चित्तरेखा मेला हेतु भई तय्यार ४२ नटिनी सँगमें त्यहि बेटी के जादू क्यार जिन्हें व्यपार ॥ बलखबुखारे को राजा जो त्यहिअभिनन्दननामउदार ४३ त्यहि का बेटा हंसाठाकुर चलिभा बहिनी साथलिवाय ॥ सवालाख लश्कर को लैके ब्रह्मावर्त्त पहुँचा आय ४४ तम्बू गड़िगे त्यहि रेती माँ भारी ध्वजारही फहराय ॥ संग सहेली त्यहि बहिनी की बोली बेटी बचन सुनाय ४५ चलिये हनवन जल्दी करिये अब दिनगयो यामभरआय ॥ २१

६ आल्हखण्ड । ३२२ सुनिकै बातें ये सखियन की बेटी चली तड़ाकाधाय ४६ भा भटभेरा तहँ इन्दल का देखत रूपगई ललचाय ॥ मन अरु नैना यकमिल ह्वैंगे सखियनदेखिगई सकुचाय ४७ फिरिफिरिचितवैदिशिइन्दलके हनवन करै गंगको वारि ॥ बिधिउ न जानै गति नारी की दशरथ मरे नारिसों हारि ४८ सोई नारी फिरि फिरि चितवै कैसी करै आजु त्रिपुरारि ॥ इन्दल निकले जलके बाहर सोऊनिकलिपरीसुकुमारि ४६ दिह्यो दक्षिणा द्विज देवन को दोऊ मोहबे के सरदार ॥ तहँते चलिभे फिरि तम्बू को देखत मेला केरि बहार ५० चचा भतीजे दोऊ ठाकुर तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ बेटी प्यारी अभिनन्दन की सोऊ चली तहाँ ते धाय ५१ आयकै पहुँची सो तम्बुन में औ सखियनसों लगीबतान ॥ ऐस रँगीला और सजीला मेला नहीं दूसरो ज्यान ५२ करिकै जादू याको हरिये करिये सखी सबई अबसाज ॥ मन नहिं हटको हमरो मानै ना अब करै तुम्हारी लाज ५३ सवैया ॥ होत अकाज न लाजरहै यह राज समाज लखे दुख छावै । जो कुलकानि न आनिकरौं कुलटा उलटा म्वहिंलोगबतावै॥ भावै यहै हमको सजनी रजनी बिन पीतम आनि मिलावै । पावै जबै ज्यहि नेहलग्गो ललिते मनमें तबहीं सुखआवै ५४ सुनिकै बातें चितरेखा की सखियनकहा बहुतसमुझाय ॥ धीरज राखो अपने मन माँ पीतम मिली तुम्हारो आय ५५ इतना कहिकै संग सहेली हेली तुरंत भई तय्यार ॥