आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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कहि समुझावा त्यहि धावनको डंका बन्द देउ करवाय ३४ हुकुम कनौजी का नाहीं है डंका कोऊ बजावै आय ॥ इतना सुनिकै धावन चलिकै डंका बजत दीन रुकवाय ३५ कहा न मान्यो जब बघऊदन देवा ठाकुर उठा रिसाय ॥ तुम्हें मुनासिव यह चहिये ना सबसों बैर बढ़ावो भाय ३६ चलिकै मिलिये अब लाखनिसों उनसों हुकुम लेउ करवाय ॥ हीनी तुम्हरी कछु हैहै ना मानो कही बनाफरराय ३७ सुनिकै बातें ये देवा की ऊदन मानिगयो त्यहिकाल ॥ पाँच दुमाला दुइ हीरा लै चलिभा देशराजका लाल ३८ नचै पतुरिया त्यहि तम्बूमें ज्यहिमें रहें कनौजीराय ॥ ऊदन ठाकुर तहँ पहुँचतभा राखी भेंट अगाड़ी जाय ३६ हाथ पकरिकै लाखनिराना अपने पास लीन बैठाय ॥ कही हकीकति बघऊदन ने लाखनिहुकुमदीनफरमाय ४० बाजै डंका इक ऊदन का औरन बन्द देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे तम्बुन फेरि पहुंचे आय ४१ सुनो हकीकति अभिनन्दनकी हंसा ताको राजकुमार ॥ त्यहिकी बेटी चित्तरेखा मेला हेतु भई तय्यार ४२ नटिनी सँगमें त्यहि बेटी के जादू क्यार जिन्हें व्यपार ॥ बलखबुखारे को राजा जो त्यहिअभिनन्दननामउदार ४३ त्यहि का बेटा हंसाठाकुर चलिभा बहिनी साथलिवाय ॥ सवालाख लश्कर को लैके ब्रह्मावर्त्त पहुँचा आय ४४ तम्बू गड़िगे त्यहि रेती माँ भारी ध्वजारही फहराय ॥ संग सहेली त्यहि बहिनी की बोली बेटी बचन सुनाय ४५ चलिये हनवन जल्दी करिये अब दिनगयो यामभरआय ॥ २१