भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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६ आल्हखण्ड । ३२२ सुनिकै बातें ये सखियन की बेटी चली तड़ाकाधाय ४६ भा भटभेरा तहँ इन्दल का देखत रूपगई ललचाय ॥ मन अरु नैना यकमिल ह्वैंगे सखियनदेखिगई सकुचाय ४७ फिरिफिरिचितवैदिशिइन्दलके हनवन करै गंगको वारि ॥ बिधिउ न जानै गति नारी की दशरथ मरे नारिसों हारि ४८ सोई नारी फिरि फिरि चितवै कैसी करै आजु त्रिपुरारि ॥ इन्दल निकले जलके बाहर सोऊनिकलिपरीसुकुमारि ४६ दिह्यो दक्षिणा द्विज देवन को दोऊ मोहबे के सरदार ॥ तहँते चलिभे फिरि तम्बू को देखत मेला केरि बहार ५० चचा भतीजे दोऊ ठाकुर तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ बेटी प्यारी अभिनन्दन की सोऊ चली तहाँ ते धाय ५१ आयकै पहुँची सो तम्बुन में औ सखियनसों लगीबतान ॥ ऐस रँगीला और सजीला मेला नहीं दूसरो ज्यान ५२ करिकै जादू याको हरिये करिये सखी सबई अबसाज ॥ मन नहिं हटको हमरो मानै ना अब करै तुम्हारी लाज ५३ सवैया ॥ होत अकाज न लाजरहै यह राज समाज लखे दुख छावै । जो कुलकानि न आनिकरौं कुलटा उलटा म्वहिंलोगबतावै॥ भावै यहै हमको सजनी रजनी बिन पीतम आनि मिलावै । पावै जबै ज्यहि नेहलग्गो ललिते मनमें तबहीं सुखआवै ५४ सुनिकै बातें चितरेखा की सखियनकहा बहुतसमुझाय ॥ धीरज राखो अपने मन माँ पीतम मिली तुम्हारो आय ५५ इतना कहिकै संग सहेली हेली तुरंत भई तय्यार ॥