भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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चन्द्रावलि की चौथ । ३११ २६ को गति बरर्णै रणशूरन कै सम्मुख करें समर मैदान १५४ मान न रहिगे क्यहु क्षत्रिनके सब के छूटि गये अरमान ॥ बहुतक करहैं समरभूमि में अधजलपरे अनेकन जवान १५५ बहुतक सुमिरैं घर अपने को औ मन परे परे पछितायँ ॥ बहुतक क्षत्री गिरैं समर में काटे वृक्ष सरिस भहराय १५६ नदी भयङ्कर बही रकत की त्यहिमाँ गिरे ऊंट गज धाय ॥ छुरी कटारी मछली ऐसी ढालैं कछुवा परैं दिखाय १५७ परीं लहासैं तहँ मनइन की छोटी डोंगिया सम उतरायँ ॥ बहैं सिवारा जस नदिया माँ तैसे बहे बाल तहँ जायँ १५८ भूत पिशाच योगिनी नाचैं गावैं गीत बीर बैताल ॥ श्वान शृगालन की बनिआई गीधन गरे परे जयमाल १५६ चिघरैं हाथी रणमण्डल में डगरैं बड़े बड़े सरदार ॥ भगरैं मत्तखे रणशूरन ते डगरैं डारि डारि हथियार १६० रहि अभिलाषा नहिं केहू के जो फिरि करै वहाँपर मार ॥ जितने लड़का वीरशाह के बाँधे सिरसा के सरदार १६१ रहें सिपाही जे बौरी के भागे डारि ढाल तलवार ॥ भागे क्षत्रिन का मारैं ना नाहर मोहबे के सरदार १६२ रीति पुरानी इन छोड़ी ना कतहूँ समर भूमि में ज्वान ॥ पूरो क्षत्रीपन करतीं ना मरतीं नहीं समर मैदान १६३ तौ यह गावत को गाथा फिरि तजिकै सकल आपनो काम ॥ यह सब जानत है अपने मन रहिहै एक रामको नाम १६४ तबहूँ मानत है जीवन बहु तजिकै कर्म्म धर्म्म इतमाम ॥ यह नहिं जानत है अपने मन साँचो धर्मकर्म सुखधाम १६५ गये सिपाही नृप द्वारे पर औ सब हाल बताये जाय ॥