भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 618 में से

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पृष्ठ 313

३८ आल्हखण्ड । ३१० तुम समुझावो महराजा को काहे रारि करें नरपाल १४२ इतना सुनिकै इन्द्रसेन ने गरुई हाँक कीन ललकार ॥ काह हकीकति तुम राखतिहौ जावो विदाकरावत द्वार १४३ इतना कहिकै इन्द्रसेन ने अपनी खैंचि लई तलवार ॥ दौरिकै पकरयो उदयसिंह ने मलखे बाँध लीन त्यहिबार १४४ देखिकै बन्धन इन्द्रसेन को मोहन आयगयो त्यहिकाल ॥ मारन लाग्यो रजपूतन को मोहन वीरशाहका लाल १४५ औरो भाई जे मोहन के तेऊ करनलागि तलवार ॥ झुके सिपाही बौरीवाले लागे करन भड़ाभड़मार १४६ पैदल पैदल कै बरणी भै औ असवार साथ असवार ॥ बड़ी लड़ाई हाथिन कीन्ह्यो घोड़न कीन टापकीमार १४७ लीन्हे साँकरि दल बादलसों हाथी करत फिरैं चिग्घार ॥ भाला छूटैं असवारन के पैदल खूब चलै तलवार १४८ झुके सिपाही मोहबेवाले इनहुन कीन घोर घमसान ॥ चौंड़ा बाम्हन के मोर्चा में कोऊ शूर नहीं समुहान १४६ सोहै चौंड़िया इकदान्ता पर हाथम लिये ढाल तलवार ॥ मोहन ठाकुर बौरी वाला सब्ज़ा घोड़ापर असवार १५० हनि हनि मारै रजपूतन का गरुई हाँक देय ललकार ॥ अभिरे क्षत्री अरुझ्वारा सों आमाझ्वारचलै तलवार १५१ जौनै हौदा ऊदन ताकैं बेंबुल तहाँ पहुँचै जाय ॥ ऊदन मारैं तलवारिन सों बेंबुल टापन देइँ गिराय १५२ भाला चमकै तहँ देवा का मोहन केरि चलै तलवार ॥ घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया मलखे सिरसाका सरदार १५३ मारि गिराये रजपूतन का कायर भागे लिहे परान ॥

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