आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 321, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें२ आल्हखण्ड । ३१८ तुम्ही गुसैयाँ दीनबन्धु हौ ओ ब्रह्मण्यदेव ब्रजराज ॥ लाज रखैया बाम्हन तनकी साँचे एक कृष्ण महराज ४ शरणहि ताकत विप्र सुदामा पायो सकल सम्पदा राज ॥ छूटि सुमिरनी गई कृष्ण की इन्दल ब्याह बखानों आज ५ अथ कथाप्रसंग ॥ परब दशहरा की जग जाहिर बुड़की हेतु जाय संसार ॥ भारी मेला श्रीगंगा को हिंडनक्यार पूर त्यवहार १ बहुतक छैला अलबेला तहँ घोड़न उपर भये असवार ॥ करी तयारी श्रीगंगा की चक्कस लिये बुलबुलनक्यार २ जेठदुपहरी भारी ह्वैकै ब्यारी करैं वृक्षतर आय ॥ देखि गँवाँरी तहँ नारी नर बोला तुरत बनाफरराय ३ कहाँ तयारी नर नारी करि ब्यारी किह्यो यहाँपर आय ॥ देखि बनाफर को नर नारी बोले साँच देयँ बतलाय ४ कीन तयारी हम विठूर की भारी पर्ब दशहरा केरि ॥ चकित ह्वैकै ऊदन दीख्य चारिउ दिशातर्फ फिरिहेरि ५ भारी मेला अलबेला तहँ रेला चला जाय सबराह ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया आयो जहाँ बैठ नरनाह ६ हाथ जोरिकै तहँ आल्हा के ऊदन बोले शीश नवाय ॥ करें तयारी हम गंगा की दादा हुकुमदेउ फरमाय ७ इतना सुनिकै आल्हा बोले साँची सुनो लहुरवा भाय ॥ देश देशके राजा अइहैं होई भीर भार अधिकाय ८ रारि मचैहौ तुम मेला में हमपर ऐरी आपदा आय ॥ ताते जावो नहिं मेला को मानो कही लहुरवा भाय ९ इतना सुनिकै माहिल बोले तुम सुनिलेउ बनाफरराय ॥