आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रावलि की चौथ । ३१३ ११ चिट्ठी दीन्ह्यो सो आल्हा को ठाढ़ो भयो शीशकोनाय १७८ लागि कचहरी तहँ आल्हा कै रुमि झुमि रहीं पतुरियानाच ॥ आल्हा बाँचन चिट्ठी लागे हैगा रंग भंग तहँ साँच १७६ पढ़िकै चिट्ठी आल्हा ठाकुर सबको दीन्ह्यो हाल बताय ॥ माहिल ठाकुर की किरपा ते इतना परा परिश्रमआय १८० फिकिरिम माहिल हैं ऊदनकी निश्चय समुझि परै यहिबार ॥ जाको रक्षक रघुनन्दन है ताको जाय न बाँकोबार १८१ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर बन्धन तुरत दीन छुड़वाय ॥ कहि समुझायो सबलरिकन ते राजै खबरि जनावो जाय १८२ ब्रह्मा आवत इन्द्रसेन सँग इनका बिदा देयँ करवाय ॥ माहिल मामा हमरे लागैं तातेकिहिनिदिल्लगीआय १८३ त्यहिमा सज्जन तुम महराजा सोऊ दया दीन बिसराय ॥ क्षम्यो ढिठाई अब हमरी तुम तुम्हरीशरणगये हमआय १८४ नातेदारी में उत्तमहौ आहिउ कृष्णबंश महराज ॥ गुरू श्वशुर सों संगर ठानैं क्षत्री जन्म युद्धके काज १८५ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर सबको बिदा कीन ततकाल ॥ ब्रह्मा पहुँचे बीरशाह घर औसबकह्यो बनाफरहाल १८६ सुनिकै बातें सब आल्हा की राजा बिदा दीन करवाय ॥ बैठि पालकी में चन्द्रावलि गौरा पारवती को ध्याय १८७ बहुधन दीन्हो ब्रह्मा ठाकुर महरन पलकी लीन उठाय ॥ दशहूँ लरिकिन सों महराजा आये जहाँ बनाफरराय १८८ आवत दीख्यो बीरशाह को आल्हा मिले अगारी आय ॥ मिला भेंटकरि सबसों राजा अपने धाम गये हर्षाय १८६ बाजे डंका भहतंका के आल्हा कूच दीन करवाय ॥