भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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२६ आल्हाखण्ड । ३०८ तिसर नगारा के बाजत खन क्षत्री समर हेतु तैयार १२० ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ॥ रण की मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार १२१ चालिमै सेना बौरीगढ़ सों हाहाकारी परै सुनाय ॥ घरी मुहूरत के अन्तर में पहुँचे समरभूमिमें आय १२२ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे देवा मैनपुरी चौहान ॥ सब रणशूरन त्यहि समया में भारी भीर दीख मैदान १२३ उड़ी कबुतरी मलखाने की हौदन उपर पहुँची जाय ॥ मलखे मारै तलवारिन सों घोड़ी देय टापके घाय १२४ मोहन ठाकुर उदयसिंह को परिगा समर बरोबरि आय ॥ भई कसामसि समरभूमि में औ तिलडरा भुईं ना जाय १२५ को गति वरणै रजपूतन कै दूनों हाथ करैं तलवार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार १२६ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिलारै गाय ॥ तैसे मारै मलखे ठाकुर कायर भागैं पीठ दिखाय १२७ है मर्दाना जिनको बाना ते नर करें तहाँ पर मार ॥ को गति वरणै इन्द्रसेन कै दूनों हाथ करैं तलवार १२८ बड़े लड़ैया बौरी वाले मानैं नहीं समर में हार ॥ ना मुँह फेरैं मोहबे वाले दोऊ कठिन मचाई रार १२६ गिरैं कगारा जस नदिया माँ तैसे गिरैं ऊंट गज धाय ॥ परीं लहासें रणशूरन की तिनपर रहे गीध मड़राय १३० गोली ओली कतहूँ बरसें कतहूँ कठिन चलै तलवार ॥ छुरी कटारी कोऊ मारैं कोऊ कड़ावीन की मार १३१ गदा के ऊपर गदा चलावैं ढालन मारैं ढाल घुमाय ॥