भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

चन्द्रावलि की चौथि। ३०१ १६ ओ यह बोला फिरि योगिनते हमहूँ साँच देयँ बतलाय ३८ तुम्हरो हमरो मत एकै है शंका आप देउ बिसराय ॥ पतित न क्षत्री कोउ बौरीगढ़ यादव बंश यहां अधिकाय ३६ पापी आयो इक मोहबे ते ताको खन्दक दीन डराय ॥ औरन पापी कोउ बौरी में तुमको सांच दीन बतलाय ४० इतना सुनिकै मलखे बोले ओ महराज यादवराय ॥ कैसो खन्दक कैसो पापी दर्शन हमें देउ करवाय ४१ कबहुँ खन्दक हम देखाना तुमते साँच दीन बतलाय ॥ बड़ी लालसा भै जियरे माँ खन्दक आप देउ दिखलाय ४२ इतना सुनिकै महराजा तब योगिन लीन्ह्यो साथ लिवाय ॥ जौने खन्दक में ऊदन थे सो महराज दिखावा जाय ४३ ऊदन दीख्यो जब योगिन को नीचे लीन्ह्यो शीश नवाय ॥ चारो योगी तहँते चलिभे पहुँचे राजभवन में आय ४४ भयो बुलौवा फिरि भोजन को मलखे बोले वचन बनाय ॥ आजु यकादशि निर्जल बर्ते राजन साँच दीन बतलाय ४५ करैं बसेरो नहिं बस्ती में जंगल बास करैं सब काल ॥ बिदा मांगिकै महराजा ते चारो चलत भये ततकाल ४६ आयकै पहुँचे फिरि फौजनमें अंगड़ खंगड़ धरे उतार ॥ सुरंग खुदायो मलखाने ने क्षत्रिन तुरत कीन तय्यार ४७ जौने खन्दक में ऊदन थे फूटो सुरंग तहाँपर जाय ॥ सुरंग के भीतर सों बघऊदन पहुँचे फौज अपनी आय ४८ जैसे पियासा पानी पावै तैसे खुशी भये सब भाय ॥ बाजे डंका अहलंका के शंका सबन दीन बिसराय ४६ मलखे बोले तहँ आल्हा ते लश्कर कूच देउ करवाय ॥