भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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वन्दावलि की चौथि। २६७ १५ राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५५ इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुन्शी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपेंड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत ऊदनबन्धनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ सवैया ॥ ध्यावत तोहिं सरस्वति मातु करो निज सेवकपै अब दाया । शारद नारदके पद ध्याय मनावत तोहिं सदा रघुराया ॥ गावतहौं गुण गोबिंद के अरु पावतहौं नितही मनभाया । नावतहौं शिर बारहिं बार करो ललिते कर मातु सहाया १ सुमिरन ॥ दोउ पद ध्यावों जो बर पावों सो सुनिलेउ शारदा माय ॥ जस जस गावों मैं आल्हा को तसतस सुखी होउँ अधिकाय १ माता भ्राता त्राता ताता नाता तुममा दीन लगाय ॥ तारो बोरो जो अब चाहो हमतो शरण तुम्हारी माय २ बेद पुराण श्रुति असमृति में जाँचा साँचा हमअधिकाय ॥ तुम्ही भवानी शारद मइया सेबका सार परी दिखराय ३ तव पद बिछुरे उर हमरे ते मूरखचन्द कहैं सब गाय ॥ ताते बिछुरैं पद उरते ना यह बर मिलै शारदामाय ४ छूटि सुमिरनी गै शारद कै अब आगे के सुनो हवाल ॥ मलखे आल्हा बौरी जैहैं हैहैं तहां युद्ध विकराल ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदय दिवाकर भे पूरबमें किरणनकीनजगत उजियार ॥ हुकुम पायकै मलखाने को सवियाँ फौज भई तय्यार १ सजि पचशब्दा गा आल्हाका तापर होत भयो असवार ॥