आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें.८ आल्हखण्ड । ३२४ पांच रोज को धावा करिकै दशहरिपुरै पहुँचे आय ६८ ऊदन रहिगे एक कोस में माहिल गये अगाड़ी धाय ॥ बड़ी खातिरी आल्हा करिकै अपने पास लीन बैठाय ६६ आल्हा बोले तहँ माहिल ते मामा हाल देउ बतलाय ॥ ऊदन देवा इन्दल बेटा तीनों रहे कहांपर भाय ७० दृग नहिं देखन इन तीनों को ताते चित्त बहुत घबड़ाय ॥ इतना सुनि कै माहिल बोले साँची सुनो बनाफरराय ७१ ख्यलै नेवारा गे नदिया में ऊदन इन्दल साथ लिवाय ॥ ऊदन देवा इकमिल हैकै औ इन्दलको दीन बहाय ७२ टरिजा टरिजा माहिल मामा धरती खोदि लेउँ गड़वाय ॥ ऐसी बातें फिरि बोले ना ठाकुर साँच दीन बतलाय ७३ है मर्दाना ऊदन बाना मामा काह गये बौराय ॥ किहे दिल्लगी की साँची है हमरोचित्त बहुत घबड़ाय ७४ इतना सुनिकै माहिल बोले साँची कहा बनाफरराय ॥ पोथा पढ़िकै धरिदीन्ह्यो सब अकिल तुम्हरी गई हिराय ७५ कौनिअदावति नलपुष्कलकी भारत पढ़े बनाफरराय ॥ कैसि दुर्दशा नलकी कीन्ह्यो पुष्कल नलको जुआँ खिलाय ७६ बिना वस्त्र के महराजा भे साजा सबै साज कर्तार ॥ तिनकी प्यारी दमयन्ती जो सोऊ छूटिगई त्यहि बार ७७ त्यहि दमयन्ती के ब्याहे में आये पवन अंग्नि सुरराज ॥ उद्यम कीन्ह्यो नल ब्याहे को चाहे दूत भये नलराज ७८ ब्याह न कीन्ह्यो दमयन्ती ने विन्ती बहुत कीन नलराज ॥ गन्ती कीन्ह्यो दमयन्ती ना लज्जितभये तहाँ सुरराज ७६ बारह बरसै वनवाजी मा राजी भये इन्द्र महराज ॥