आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
.८ आल्हखण्ड । ३२४ पांच रोज को धावा करिकै दशहरिपुरै पहुँचे आय ६८ ऊदन रहिगे एक कोस में माहिल गये अगाड़ी धाय ॥ बड़ी खातिरी आल्हा करिकै अपने पास लीन बैठाय ६६ आल्हा बोले तहँ माहिल ते मामा हाल देउ बतलाय ॥ ऊदन देवा इन्दल बेटा तीनों रहे कहांपर भाय ७० दृग नहिं देखन इन तीनों को ताते चित्त बहुत घबड़ाय ॥ इतना सुनि कै माहिल बोले साँची सुनो बनाफरराय ७१ ख्यलै नेवारा गे नदिया में ऊदन इन्दल साथ लिवाय ॥ ऊदन देवा इकमिल हैकै औ इन्दलको दीन बहाय ७२ टरिजा टरिजा माहिल मामा धरती खोदि लेउँ गड़वाय ॥ ऐसी बातें फिरि बोले ना ठाकुर साँच दीन बतलाय ७३ है मर्दाना ऊदन बाना मामा काह गये बौराय ॥ किहे दिल्लगी की साँची है हमरोचित्त बहुत घबड़ाय ७४ इतना सुनिकै माहिल बोले साँची कहा बनाफरराय ॥ पोथा पढ़िकै धरिदीन्ह्यो सब अकिल तुम्हरी गई हिराय ७५ कौनिअदावति नलपुष्कलकी भारत पढ़े बनाफरराय ॥ कैसि दुर्दशा नलकी कीन्ह्यो पुष्कल नलको जुआँ खिलाय ७६ बिना वस्त्र के महराजा भे साजा सबै साज कर्तार ॥ तिनकी प्यारी दमयन्ती जो सोऊ छूटिगई त्यहि बार ७७ त्यहि दमयन्ती के ब्याहे में आये पवन अंग्नि सुरराज ॥ उद्यम कीन्ह्यो नल ब्याहे को चाहे दूत भये नलराज ७८ ब्याह न कीन्ह्यो दमयन्ती ने विन्ती बहुत कीन नलराज ॥ गन्ती कीन्ह्यो दमयन्ती ना लज्जितभये तहाँ सुरराज ७६ बारह बरसै वनवाजी मा राजी भये इन्द्र महराज ॥
इन्दलहरण । ३२५ ९ आल्हा मैने साँची जानो ऊदनकीन्ह साँचयहकाज ८० इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर गरुई हाँक दीन ललकार ॥ टरिजा टरिजा उरई वाले तोरे चुगुलिन का बयपार ८१ साँची साँची आल्हा ठाकुर तुम्हरे। इन्दल गयो हिराय ॥ कहौं असाँचा आल्हा ठाकुर साँचा सहों पुत्रका घाय ८२ करों दिल्लगी अस कबहुँ ना साँची सुनो बनाफरराय ॥ ऊदन बोले ह्याँ देवा ते हमरो चित्त बहुत घबड़ाय ८३ दशहरिपुरवा माहिल पहुँचे कैसी खबरि सुनावै जाय ॥ पुत्र शोक सम दुख दूसर ना जानतगाथ भली तुम भाय ८४ पुत्र शोक सों दशरथ मरिगे कीरति रही जगत में आज ॥ कीरतिसागर भट नागर जे आगर सबैग़ुणन रघुराज ८५ तेई खिवैया अब नैया के भैया काह करें धौं आज ॥ यहु दिन आये लग ध्यावै जो कलयुगसत्रुझकशिरताज ८६ सोई कलयुग के ऊदन हम साँचे कर्म्म कीन रघुराज ॥ दया न छोड़ा द्विज गाइन ते पीठि न दीन प्राणकेकाज ८७ नहिं अभिमानी बातें ठानी बालक विप्र साथ महराज ॥ परम पियारे द्विज तुम का हौ निर्मलएकक्षत्रराज्यहिभ्राज ८८ ऐसी स्तुति ऊदन कीन्ह्यो देवा चलत भयो ततकाल ॥ आयकै पहुँच्यो त्यहि मंदिर में ज्यहिमें देशराजको लाल ८६ ठाढ़े दीख्यो जब देवा को चलिभा उरई का सरदार ॥ भल भल रोंका आल्हा ठाकुर करिकै बहुतभांति सतकार ६० पै नहिं मान्यो जब माहिल ने आयसु दियो बनाफरराय ॥ देखिकै सूरति फिरि देवा की आल्हागये बहुत घबड़ाय ६१ कैसी गुजरी है तीरथ में देवा साँच देय बतलाय ॥
१० आल्हखण्ड । ३२६ परम पियारो पुत्र हमारो इन्दल राख्यो कहाँ छिपाय ६२ पूत न होवैं बहु कलयुग में यामें भूतन को अधिकार ॥ सेव करावैं बालापन में ज्वाने भये बसैं ससुराल ६३ पूत सपूतों इन्दल प्यारो कहँ पर मैनपुरी चौहान ॥ इतना सुनिकै देवा बोला साँची कहौं शपथभगवान ६४ बंश पिथौरा के नजदीकी आहिन सत्य बनाफरराय ॥ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे भाई सरिस चारिहू भाय ६५ कमती जानैं जो काहू को तो म्वहिं सजादेयँ भगवान ॥ कोऊ लैगा छलि जादू सों इन्दल तुम्हरौ पूत परान ६६ ऊदन बिगड़े तहँ मेला में जैबे पता लगावन काज ॥ तिल तिल पृथ्वी मेला ढूँढ़ा भारी भीर तहाँ महराज ६७ पता न लाग्यो जब इन्दल को माहिल कहा तवै समुझाय ॥ आल्हा ठाकुर को समुझावव ऊदन कूच देउ करवाय ६८ कहा मानिकै तब माहिल का डाँड़े परा लहुरवा भाय ॥ जौन देश में इन्दल बैठैं ऊदन लैहैं खोज लगाय ६६ बातैं सुनिकै ये देवा की आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥ जो कछु भाषा माहिल ठाकुर साँची जना बनाफरराय १०० पुत्र शोच सों उर धड़कत भो जियेर धीर धरा ना जाय ॥ आल्हा बोले तब देवा ते तुमऊदनको लवो बुलाय १०१ उनहीं पाँयन देवा चलिभा ऊदन खबरि दीन बतलाय ॥ बड़े शोच में बड़ भैया हैं तुमकोतुरतबुलानिभाय १०२ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे सम्मुख गये तड़ाका आय ॥ आवत जान्यो जब ऊदन को आल्हाशीशलीननिहुराय १०३ औ दिशि दीख्यो ना ऊदनके मानों शत्रु ठाढ़ भो आय ॥
इन्दलहरण । ३२७ ११ हाथ जोरिके ऊदन बोले चरणन वार बार शिरनाय १०४ मोहलति पावों छा महिना कै इन्दल खोजिदिखाओं आय ॥ इतना सुनिकै आल्हा जरिगे अपनो कोड़ा लीन उठाय १०५ पीटन लाग्यो जब ऊदन को सुनवाँ सुनत गेई तहँ आय ॥ कहि समुझायो सो आल्हाको आल्हा तुरत दीन डरियाय १०६ टरिजा टरिजा री सम्मुख ते नहिं शिरकाटि देउँ भुइँ डारि ॥ ऊदन मारा है इन्दल को साँची खबरि मिली म्वहिं नारि १०७ सुनवाँ बोली फिरि आल्हाते साँची सुनो बनाफरराय ॥ हम तुम जी हैं जो दुनिया में हैहैं पुत्र नाथ अधिकाय १०८ मिली सहोदर फिरि भाई ना आई कौन साँकरे काज ॥ सुन्दरगढ़ को चाचा हमरो तुमको कैद कीन महराज १०६ बनि सौदागर उदयसिंह ने तुम्हरी कैद दीन छुड़वाय ॥ बराबरस के ऊदन ठाकुर माड़ोली न वापका दायँ ११० लड़ि गजराजा सों ऊदन ने मलखे ब्याह दीन करवाय ॥ नरपति राजासों लड़िकै फिरि फुलवालये लहुरवा भाय १११ हथी पछारा इन दिल्ली में द्वारे पृथीराज के जाय ॥ ऐसे नामी इन ऊदन का मारब नहीं मुनासिब आय ११२ इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर जूरा पकड़ि तड़ाका लीन ॥ खैंचि तमाचा शिर माँ मारा सुनवाँ गमनमहल को कीन ११३ मारन लाग्यो फिरि ऊदन को द्यावलि सुनत पहुँची आय ॥ औ ललकारा फिरि आल्हाको मारो नहीं बनाफरराय ११४ इतना सुनिकै आल्हा बोले माता बैठु धाम में जाय ॥ जैसे ऊदन तुम को प्यारे तैसे पूत हमारो आय ११५ हम समुझावा भल ऊदन को तुम ना जाउ लहुरवा भाय ॥
१२ \qquad आल्हाखण्ड । ३२८ पूत हमारे के मारन को \qquad ऊदन मेला गये लिवाय ११६ बातें सुनिकै ये आल्हा की \qquad द्यावलि ठाढ़ि रही शिरनाय ॥ ऊदन ठाकुर को आल्हा ने \qquad कोड़न चर्सा दीनउड़ाय ११७ औ ललकारा फिरि ऊदन को \qquad आल्हा दाँतन ओठ चबाय ॥ धिक धिक तेरी रजपूती का \qquad इन्दल बिना पहुँचे आय ११८ दशहरिपुरवा अब आये ना \qquad नहिंहानिदरौं खङ्ग के घाय ॥ जहँ मनभावै तहँ चलिजावै \qquad साँची शपथ शारदामाय ११९ सुनिकै बातें ये आल्हा की \qquad ऊदन चला बहुत घबड़ाय ॥ सुनवाँ फुलवा द्यावलि तीनों \qquad पृथ्वी गिरीं पछारा खाय १२० देवा ऊदन दोऊ ठाकुर \qquad सिरसागढ़ै पहुँचे जाय ॥ खबरि पायकै मलखाने ने \qquad फाटकबन्दलीन करवाय १२१ यह गति देख्यो उदयसिंहने \qquad ठाढ़ो लाग तहाँ पछिताय ॥ कोऊ साथी नहिं विपदा में \qquad यह देवाते कह्यो सुनाय १२२ \qquad\qquad सवैया ॥ जाकि सुता हरिके गृह शोभित चन्द्रललाट महेश प्रवीनो । इन्द्र गयन्द दयो हय रबिको देवन धेनु द्रुमादिक दीनो ॥ शिरी मुनिरायजू कोपकियो तब गण्डकधारि सबै जलपीनो । एते बड़ेको विपत्तिपरी तब सिंधुकि काहु सहाय न कीनो १२३ इतना सुनिकै देवा बोला \qquad साँची सुनो लहुरवा भाय ॥ साथ तुम्हारो हम छाँड़व ना \qquad चहुतनधजीधजीउड़िजाय १२४ पै हम बांचे बहु पुराण हैं \qquad देखी कथा अनेकन भाय ॥ विपतिमें साथी कोउ विरलाहै \qquad साँची सुनो बनाफरराय १२५
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सवैया ॥ रागवही ज्यहि रामबसै अरुध्यान वही जो धनी के घेरेका । प्रीति वही जो सदा निबहै अरु दाग वही कटु बचनकहेका ॥ सुखसम्पत्ति अनेक भरी पर आवै नहीं कोउ काम परेका । काहेकोआदम शोचतहै कोउ मित्रनहीं है विपत्ति परेका १२६ ठाकुर वही जो दुख सुख बूझै सेवक वो मनलाग रहेका । भाई वही जो भारहि खैंचत पुत्र वही परिवार बढ़ेका ॥ नारी वही जो जरै पियके सँग शूर वही सनमुखखलड़ेका । सम्पत्तिमेंतो अनेकमिलैं पर मित्रवही जो विपत्ति परेका १२७
इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कही समय की बात ॥ अब मन भाई यह हमरे है नरवर चलैं आजहीतात १२८ यह मन भाय गई देवाके दोऊ भये बेगि तय्यार ॥ सात रोजकी मैजलि करिकै नरवर पहुँचिगये सरदार १२६ यह सुधि पहुँची जब मोहबे में आल्हा तजा लहुरवाभाय ॥ बारहु रानिन सों परिमालिक महलन गिरे मूर्च्छाखाय १३० तुरत पालकी को मँगवायो दशहरिपुरै पहुँचे जाय ॥ औधिरकात्यो भल आल्हा को रहिगा चुप बनाफरराय १३१ कायल हैगे आल्हाठाकुर राजा लौटि परा पछिताय ॥ ऊदन बैठे ह्याँ कुँवना पर हिरिया गई तहाँ परआय १३२ देखिकै सूरति बघऊदन कै हिरिया गई तुरत पहिंचान ॥ हँसिकै हिरिया बोलन लागी साँचीसुनोबनाफरज्वान १३३ कौनि मुसीबत तुमपर परिगै जो तजि दियो ढालतलवार ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले मालिनिठीककहैयहिवार १३४
१४ आल्हखण्ड । ३३० परी मुसीबत हमरे ऊपर पृथ्वी मोहबा लीन लुटाय ॥ छोड़ बेंदुला फुलवा सुनवाँ लीन्ह्यो जीति पिथौराराय १३५ करब नौकरी हम मकरँद कै महलन खबरि जनावै जाय ॥ इतना सुनिकै हिरियामालिनि महलन अटी तुरतही आय १३६ जहँ पर माता मकरन्दाकी ऊदन कथा गई तहँ गाय ॥ आवन सुनिकै बघऊदन का माता मकरँद लीन बुलाय १३७ जो कछु गाथा मालिनि भाषी माता मकरँद गई सुनाय ॥ इतना सुनिकै मकरँद चलिभा कुँवना ऊपर पहुँचा आय १३८ कुशल प्रश्न करि सब आपस में मकरँद बोला अतिघबड़ाय ॥ हाल बताओ ऊदनठाकुर हमरे धीर धरा ना जाय १३६ हिरियामालिनि की बातें सुनि माता बैठि महलं पछिताय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले मालिनि बात दिल्लगी भाय १४० सुनिकै बातें बघऊदन की मकरँद घरका चला लिवाय ॥ ऊदन पहुँचे रनिवासे में देवा टिका द्वार पर आय १४१ हाल बतायो सब महलन में जैसे इन्दल गये हिराय ॥ मारा पीटा जस आल्हा ने सोऊ कथा गये सबगाय १४२ बनी रसोई फिरि महलन में संध्याकाल पहुँचा आय ॥ मकरँद ऊदन भोजन करिकै सोये विकट नींदको पाय १४३ चले दिवाकर घर अपने को पक्षिन लियो बसेरा धाय ॥ लिहे अञ्जली दोउ हाथन में सुरजन अर्ध देयँ द्विजराय १४४ खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय १४५ परे आलसी निजनिज शय्या घों घों करठ रहे घर्राय ॥ गुरू पिता दोऊ पद जिनके तिनके चरणन शीशनवाय १४६
इन्दलहरण । ३३१ १५ करौं तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकन्त ॥ शम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १४७ इति श्रीलखनऊनिवार्सि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामदेशान्तर्गतपँड़रीकलां निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद कृतऊदननरवरगमनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ सवैया ॥ कौनफली सबकाल बली यहि पुण्यथलीमनमाँझ बिचारा । निंदिकै काहि बखानकरौं क्यहि कौनसों बैरकरौं यहिब्वारा ॥ याहि लियों ठहराय मनै प्रभु एकसों एक हैं देव उदारा । बेद पुराण बतावत हैं ललिते सब ते बढ़िकै ॐकारा १ सुमिरन ॥ इकलो अक्षर ॐकार को अब हम शिरसों करें प्रणाम ॥ ब्रह्मा विष्णू औ शिवशंकर दुर्गा केर ताहि में धाम १ एक मात्रा में शिवशंकर दुर्गा अर्द्ध करें विश्राम ॥ एक मात्रा में ब्रह्माजी एक म रहें हमारे राम २ इकलो अक्षर यहु जो ध्यावै पूरण होयँ तासु के काम ॥ यहिते बढ़िकै हिन्दूमत में दूसर नहीं बेद में नाम ३ अज अविनाशी घट घट वासी पूरण ब्रह्म चराचर राम ॥ बेद व्याकरण दोउ साखी हैं खण्डनकरै कौन यह नाम ४ नाम न रहै जब दुनियाँ मा तब सब होइहैं पशू समान ॥ कीरति गावों बघऊदन कै सुनिये खूब ध्यान धरिज्ञान ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदयदिवाकर भे पूरब में किरणनकीन जगत उजियारा। सोयकै जागे बघऊदन तब प्रातःकृत्य कीन सरदार १
१६ आल्हदण्ड । ३३२ ऊदन देवा मकरँद ठाकुर तीनों एक जगा भे आय ॥ ऊदन बोले तब देवा ते दादा शकुन देउ बतलाय २ भाई भौजी माता बेटी फुलवा ऐसि छूटिगै नारि ॥ पता लगाये बिन घर जावैं दादा डरै जानसों मारि ३ माता तलफति घरमा होई भौजी होई हाल बिहाल ॥ मल्हना रानी रोवति होई होइहैं दुखी रजापरिमाल ४ हाल बतावों का फुलवा के मुर्दासरिस होयगी बाल ॥ जेठ दशहरा दुशमन द्वैगा कहिये काह करैं यहिकाल ५ इकलो बेटा म्वरे भैया के सबविधि रूपशील गुणवान ॥ क्षमा न करिहैं सो बेटा बिन यह हम ठीक कीन अनुमान ६ इतना सुनिकै देवा बोला भैया उदयसिंह सरदार ॥ प्रश्न हमारो यह बोलत है योगी बनो फेरि यहिवार ७ यह मनभाई उदयसिंह के मकरँद साथ भयो तय्यार ॥ तिलकलगायो फिरिकेशरिका गेरुहा वस्त्र पहिरि सरदार ८ गुदरी डारी फिरि कांधेमाँ त्यहिमाँपरी ढाल तलवार ॥ डमरू लीन्ह्यो मकरन्दा ने बँसुरी उदयसिंह सरदार ६ खँझड़ी लीन्ह्यो देवाठाकुर मकरँद बोलिउठा त्यहिबार ॥ महल हमारे पहिले चलिये पाछे अनत चलेंगे यार १० सम्मत करिकै तीनों योगी पहुँचे जाय राजदरवार ॥ बैठ सिंहासन नरपति राजा देवा कीन्ह्यो राम जुहार ११ पै पहिंचाना जब नरपति ना मकरँद हाथ जोरि शिरनाय॥ जितनी गाथा बघऊदन की सो राजा को दीन बताय १२ हाल जानिकै महाराजा ने तुरतै हुकुम दीन फर्माय ॥ तहँते चलिभे मकरँद ऊदन माता पास पहुँचे आय १३
इन्दलहरण । ३३३ १७ मर्म जानिकै महतारी ने आशिर्वाद दीन हरषाय ॥ मकरँदचलिभा निजमहलनको पहुँचा नारिपास सो जाय १४ कही हकीकति सब रानी सों कुसुमा बोली शीश नवाय ॥ पहिले जैयो तुम झुन्नागढ़ तहँपर पता लगैयो जाय १५ घर घर जादू है झुन्नागढ़ कन्ता सत्य कहौं समुझाय ॥ तुमहूं जावो ऊदन सँग में हमरो चित्त बहुतघबड़ाय १६ इतना कहिकै कुसुमारानी पुरिया चारि दीन पकराय ॥ रखिहौ मुखमाँ यह पुरिया जब जादूसकी निकट नहिंआय १७ लैकै पुरिया मकरन्दा फिरि तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ देवा ऊदन जहाँ ठाढ़े थे मकरँद तहाँ पहुँचा आय १८ सम्मत करिकै तीनों योगी झुन्नागढ़ै चले फिरिधाय ॥ सातरोजकी मैजलि करिकै झुन्नागढ़ै पहुँचे आय १६ बाजा डमरू मकरन्दा का खँझड़ी मैनपुरी चौहान ॥ बाजी बँसुरी तहँ ऊदन की गावनलाग राग कल्यान २० तान कान में ज्यहिके जावे त्यहिके जाय प्रान पर आन ॥ मोहित हैगे नरनारी सब लागे हृदय तान के बान २१ भा खलभल्ला औ हल्लाअति लल्ला छांड़ि चलीं तब बाल ॥ होश बहुल्ला ना छल्ला का ✪अल्लाध्यानकरैत्यहिकाल२२ भये दुपल्ला उरपल्ला तब कङ्कन कल्ला दीन भिड़ाय ॥ प्राणन तल्ला तज्यो इकल्ला लल्ला जौनु बनाफरराय २३ बड़ी भीर भै गलियारे में नाचै देशराज का लाल ॥ बाजै डमरू जस मकरँद कै देवा देय तैसही ताल २४ रूप देखिकै तिन योगिन का जादू करें अनेकन नारि ॥ ✪ ( अल्ला ) देवी का नाम है ॥
१८ आल्हखण्ड । ३३४ कुसुमारानी की पुरिया सों जादू गईं तहां सब हारि २५ रूप उजागर सब गुण आगर नागर देशराज का लाल ॥ विषय उमण्डी बलवण्डी जी रण्डी कुलै विडम्बी बाल २६ ती सब देखें बघऊदन को नैनन बैनन सैन चलाय ॥ धर्म न छाँड़ै यहु क्षत्री का ज्यहिका कहैं उदयसिंहराय २७ दीख कुदृष्टी ज्यहि ऊदन का त्यहिका डाटिदीन ततकाल ॥ नैनन सैनन अरु बैनन में डिगैन सिद्धपुरुष यिहु काल २८ हम नहिं भोगी नर योगी हैं रोगी विषय भरी तू बाल ॥ माना भगिनी अरु कन्यासम देखैं तीनिभाव सबकाल २६ तपै बिवण्डी पररण्डी है झण्डी नरक केरि अधिकाय ॥ यह हम जानतहैं नीकी विधि तुमते साँच देयँ बतलाय ३० बातें सुनिकै ई योगी की नारिन मूड़ लीने औंधाय ॥ बोलि न आवा क्यहु नारी ते घर घर चलन लगीं शर्माय ३१ खबरि पायकै कान्तामल ने योगिन द्वार लीन बुलवाय ॥ योगी आये जब द्वारे पर आसन तुरतदीन बिछवाय ३२ लैकै गडुवा दौरति आवा तुरतै पाँय पखारोसि आय ॥ पैर धोयकै तिन योगिन का लै जलधाम छिनाकाजाय ३३ पदै मनुस्मृति भलकान्तामल जानै अतिथिभाव अधिकाय ॥ पै पहिंचानत त्यहि योगीथे मकरँद बार बार सुसुकाय ३४ यह गति दीख्यो मकरन्दाकै बोल्यो तुरत बनाफरराय ॥ तुम पहिंचान्यो नहिंमकरँदको तुमको देखि देखिमुसुकायँ ३५ पाय इशारा यहु ऊदन का मुख तन दीख खूब धरिध्यान ॥ देवा ऊदन मकरन्दा का निश्चय फेरिलीन पहिंचान ३६ किह्यो खातिरी तब पहुनन कै लै रनिवास पहुँचा जाय ॥
इन्दलहरण । ३३५ १६ ऊदन मकरँद को रानी लखि खातिरफेरिकीनअधिकाय ३७ रानी पूछा फिरि मकरँद ते योगी बन्यो पूत कस आय ॥ इतना सुनिकै मकरँद ठाकुर इन्दलहरण गयोसबगाय ३८ सुनिकै बातें सब मकरँद की रानी बार बार पछिताय ॥ लिखी विधाता की मेटै को औ दैवागतिकही न जाय ३९ पूत सपूतौ इन्दल खोयो मातै पितै दुःख अधिकाय ॥ विधिना डारे अस बिपदा ना कोउ न सहै पुत्रका घाय ४० भरे घुचघुचा सुनि ऊदन के नैनन नीर परे दिखराय ॥ उठिकै ऊदन रनिवासे ते देबी धाम पहुँचे आय ४१ बैठिकै मठियामा बघऊदन सुमिरयो तहाँ शारदामाय ॥ ध्यान लगायो जगदम्बा का सब अवलम्बा दीनभुलाय ४२ शोच भूलिगा तब ऊदन का मनमाँ खुशीभई अधिकाय ॥ तहँते चलिकै बघऊदन फिरि महलन अतातुरतही आय ४३ बनी रसोई रनिवासे में भोजन कीन सबन सुखपाय ॥ राति अँधरिया फिरि आवत भै सोये बिकट नींदको पाय ४४ बलखबुखारे निशि स्वप्ना माँ पहुँचा देशराजका लाल ॥ सोयकै जाग्यो बघऊदन जब लाग्यो सबतेकहनहवाल ४५ बलखबुखारे के जैबे को तीनों वीर भये तय्यार ॥ कान्तामल्हू सँग में हैगा चारों चलतभये सरदार ४६ अटक उतरिकै काबुल हैकै पहुँचे बलखबुखारे जाय ॥ शहर पनाहै चौगिर्दा ते बड़बड़महलपरै दिखलाय ४७ साँचे योगी चारो बानिकै पहुँचे शहर बीच में आय ॥ बाजी खँझड़ी तहँ देवा की मकरँद डमरु रहा बजाय ४८ कर इकतारा कान्तामल के ऊदन बाँसुरी रहा बजाय ॥
२० आल्हखण्ड । ३३६ ता ता थेई ता ता थेई थिरकनलाग लहुरवाभाय ४६ टप्पा ठुमरी भजन रेखता धुर्पद सरंगीत कल्यान ॥ राग विहगरो जयजयवन्ती तूरै गजल पर्जपर तान ५० कमर झुकावै भाव बनावै लाला देशराज का लाल ॥ रूप देखिकै तिन योगिन का अबलनसबलखड़ीतहँमाल ५१ कोऊ अँशिया पहिरति आवै जूरा कोऊ सँवारति बाल ॥ कोऊ दुश्ट्टा गलसों ओढै कोऊ चली मोरकी चाल ५२ कोऊ महाउर लिये हाथ में कोऊ चली छाँड़ि कै बाल ॥ कोऊ मेंहदी तजिकै दौरी बौरी भई तहाँपर बाल ५३ ऐसी बंशी प्यारी बाजै राजै ऊदन ओठ विशाल ॥ गाजै छाजै ध्वनि उपराजै लाजैं देखि देखि मनवाल ५४ हेला मेला अलबेला भा ठेला ठेल गैल में भाय ॥ कोऊ चमेला कोऊ बेलाका वारन तेल लगावत जाय ५५ बड़ी भीर भय गलियारन में कहूँ तिलडरा भूमि ना जाय ॥ नचै बँदुला का चढ़वैया आल्हा केर लहुरवा भाय ५६ दावति आयें नृप ड्योढ़ी को चागें रूप शील अधिकाय ॥ जायकै पहुँचे जब फाटकपर बाँदिन भीरभई अतिआय ५७ खबरि सुनाई रनिवासै में रानिन महलन लीनबुलाय ॥ झूठ लफोड़ा अस नाहीं थे जसकुछ आजपरै दिखलाय ५८ तबै जमाना कुछ साँचा था जाँचा चता भाग को जाय ॥ ब्राह्मण साधु न पर परतीती नीती यही सदाकी आय ५६ चलै अनीती तजि रीती जो ताको देश देय धिकार ॥ नृप अभिनन्दन के महलन में योगी पहुँचिगये त्यहिवार ६० कहाँते आयो औ कहँ जैहौ अपनो हाल देउ बतलाय ॥
इन्दलहरण । ३३७ २१ सुनिकै बानी महरानी कै बोला तुरत बनाफरराय ६१ हमतो योगी बंगाले के जावैं हरद्वार को माय ॥ भिक्षावृत्ती करि हम खावैं तुमते साँच दीन बतलाय ६२ रानी बोली फिरि योगिन ते बारे डारयो मूड़ मुड़ाय ॥ कौनि व्यवस्था तुमपर परिगै सोऊ साँच देउ बतलाय ६३ सुनिकै बानी यह रानी कै बोला मैनपुरी चौहान ॥ गीता गायो जो अर्जुन ते स्वामी कृष्णचन्द्र भगवान ६४ पढ़ि पढ़ि गीता बैरागी है हम सब लीन योग को धार ॥ लिखी विधाता की मेटै को रानी मानो कही हमार ६५ इतना सुनिकै रानी बोली अब तुम भजन सुनावोगाय ॥ बातें सुनिकै महरानी की नाचनलाग लहुरवा भाय ६६ बेटी आई अभिनन्दन कै देखै सोऊ तमाशा धाय ॥ बाजै खँझड़ी तहँ देवा कै मकरँद डमरू रहा बजाय ६७ भैरोंवाली पुरिया डारी सबकी सुधिबुधि गई हिराय ॥ ऊदन बोले तब बेटी ते भोजन हमै देउ करवाय ६८ कीनि तयारी जब ब्यारी कै लाग्यो चित्त तबै मचलाय ॥ कलके भूखे हम गावत हैं आरी भयन पेटके घाय ६९ सुनिकै बातें ये ऊदन की बेटी चलि भै साथ जिवाय ॥ जायकै पहुँची पँचमहलापर पीड़ा तहाँ दीन डरवाय ७० ऊदन बोले तब बेटी ते तुमको मंत्र देयँ बतलाय ॥ सुनिकै बातें ई योगी की बेटी बाँदिन दीन हटाय ७१ ऊदन बोले तब बेटी ते हमसे साँच देउ बतलाय ॥ इन्दलठाकुर तुम्हरे घर में ठहरे कौन जगहपर आय ७२ जो अभिलाषा फिरि तुम्हरीहो अबहीं पूरी देयँ करवाय ॥ २२
[Header] २२ आल्हखण्ड । ३३८
मोहिं तपस्या को बल पूरो तुमहूँ राख्यो नाहिं छिपाय ७३ भूत भविष्यत बर्त्तमान की गाथा सबै सकैं बतलाय ॥ बातें सुनिकै ई योगी की बेटी पिंजरा लई उठाय ७४ करिकै बाहर फिरि पिंजराके तुरतै मानुष दीन बनाय ॥ यही तरासों नित प्रति बेटी निशि में पास लेय पौढ़ाय ७५ इन्दल दीख्यो जब ऊदन को तब यह बोल्यो बचन सुनाय ॥ धोखे भूले ना योगी के चाचा यहाँ पहुँचे आय ७६ बातें सुनिकै ये इन्दल की बेटी मूड़ लीन निहुराय ॥ ऊदन बोले तब बेटी ते तुम्हरो ब्याह देब करवाय ७७ सुवा बनावो तुम इन्दल को हम को मंत्र देउ बतलाय ॥ परो उदासी है मोहबे में करिवे ब्याह वहाँते आय ७८ बेटी बोली तब ऊदन ते चाचा साँचेयँ बतलाय ॥ डोला हमरो पहिले जाई तौ हम मानुष देब बनाय ७६ नहीं तो कन्ता अब जैहैंना रैहैं सदा हमारे पास ॥ वारा बरसै जब तप कीनी तब विधि पूरिकीन मम आश ८० कैसे जीवे बिन स्वामी के चाचा कहैं छोड़िकै लाज ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले बेटी धरो धीर मनआज ८१ चोरी चोरा म्वहिं भावै ना तुमने साफ देयँ बतलाय ॥ कौन डसरिहा उदयसिंहको रोंकी ब्याह यहाँपर आय ८२ बांधिकै मुशकें अभिनन्दनकी भौंरी तुरत लेव करवाय ॥ देश देश औ जगमें जाहिर नामी सबै बनाफरराय ८३ महिनाभर के फिरि अर्सा में ह्याँपर ब्याह करब हम आय ॥ इन्दल बोले चितरेखा ते यहही ठीकठाक ठहराय ८४ कहा न टारो तुम चाचाको तौ विधि फेरि मिलै हैं आय ॥
इन्दलहरण । ३३६ २३ जो कछु कहैं चाचा हमरे सो नहिं टरै भूमिटरिजाय ८५ बेटी बोली फिरि ऊदन ते चाचा साँच देयँ बतलाय ॥ किरिया करलो तुम आवनकी तौ फिरि जाबो इन्हेंलिवाय ८६ सुनिकै बातें चितरेखा की ऊदन गङ्गालीन उठाय ॥ सुवा बनायो तब बेटी ने पिंजरा तुरत दीन बैठाय ८७ मन्त्र बतायो फिरि ऊदन को औ लै पिंजरा दीन गहाय ॥ ऊदन चलिभे फिरि महलन ते पहुँचे फेरि द्वार में आय ८८ पिंजरा दीख्यो जब देवाने तब मन खुशीभयोअधिकाय ॥ गीत बंदभे फिरि योगिन के तहँते कूच दीन करवाय ८६ चारो योगी चलि मारग में बैठे एक बृक्षतर जाय ॥ बाहर पिंजरा के सुवना करि ऊदन मानुष दीन बनाय ६० मानुष हैगे बघइन्दल जब तब सब खुशीभये अधिकाय ॥ विदाममांगि कै कान्तामल फिरि कुन्नागढ़ै पहुँचा जाय ६१ ऊदन देवा इन्दल मकरँद चारो चले तहाँते ज्वान ॥ आयकै पहुँचे सिरसागढ़ में जहँपर बसै वीरमलखान ६२ मलखे दीख्यो जब ऊदन को भेंट्यो बड़े प्रेमसों आय ॥ देवा बोल्यो मलखाने ते तुम सुनिलेउ बनाफरराय ६३ विपदा आई जब ऊदन पर फाटक बन्द लीन करवाय ॥ यहु दिन लायो नारायण जब तब तुम मिले बनाफरराय ६४ कोऊ विपदामा साथी ना साँचो साँच परा दिखराय ॥ मलखे बोले तब देवा ते तुमको साँच देयँ बतलाय ६५ लषण राम की तुम गाथा को जानो भलीभांति सरदार ॥ छोटेभाई हम आल्हा के यह सब जानिगयो संसार ६६ करें लड़ाई बड़भाई ते तौ सब क्षत्रीधर्म नशाय ॥
२४ आल्हखण्ड । ३४० धर्म न छाँड़्यो भीमसेन ने बनमाँ रह्यो मूलफलखाय ९७ किह्यो दुर्दशा दुर्योधन ने योधन भीमसेन अधिकाय ॥ हुकुम युधिष्ठिर का पायो ना आयो धन बल सबै गवाँय ९८ अब बतलाओ तुम इन्दल को पायो खोज कहाँपर भाय ॥ इतना सुनिकै बघऊदन ने सबियाँ कथा दीन बतलाय ९९ मलखे बोले फिरि ऊदन ते दशहरिपुरै चलो तुम भाय ॥ ऊदन बोले मलखाने ते दादा साँच देयँ बतलाय १०० हमहूँ मकरँद नरवर जैबै इन्दल जावो आप लिवाय ॥ कसम जो खाई चितरेखा ते करिबेब्याह तुम्हारो आय १०१ कहि समुझायो तुम दादा ते नरवर मिली उदयसिंहराय ॥ इतना सुनिकै इन्दल बोले चाचा सुनो बनाफरराय १०२ तुम ना जैहौ दशहरिपुर को तौ इन्दल कै जाय बलाय ॥ कौन बुलाई घर इन्दल का जैवो वच्छ तड़ाका आय १०३ सुनिकै बातें बघइन्दल की ऊदन कहा बहुत समुझाय ॥ मलखे दादा के सँग जावो नरवर मिलवतुम्हैं हम आय १०४ इतना कहिकै बघऊदन ने तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ मकरँद ऊदन सिरसागढ़ ते नरवर गढ़ै पहुंचे जाय १०५ मलखे देवा इन्दल ठाकुर इनहून कूच दीन करवाय ॥ लागि कचहरी परिमालिक कै तीनों तहां पहुंचे आय १०६ राजा दीख्यो जब इन्दल को तब मन खुशी भयो अधिकाय ॥ मलखे बोले तब राजा ते दोऊ हाथ जोरि शिर नाय १०७ सवैया ॥ आज जो काज कियो बघऊदन लाजरही औ बढ़ी प्रभुताई । राजन आपके पुण्य प्रकाशते भासरही जग में ठकुराई ॥
इन्दलहरण । २४१ २५ पारसहै जिनके घरमा तिनकी लघुता कहि कोन दिखाई । राजनराज समाजबढ़्यो औचढ़योललिते यशसिंधुउफाई १०८ इतना कहिकै मलखाने ने औरो हाल दीन बतलाय ॥ बिदामांगिकै परिमालिक ते दशहरिपुरै पहुँचे आय १०६ मलखे देवा इन्दल सँगमाँ महलन गये बनाफरराय ॥ रूप देखिकै इन तीनों का आल्हा ठाढ़ भये हर्षाय ११० बड़ी खुशहाली मन अन्तरभै औ यह बोले बचन सुनाय ॥ कहाँ बनाफर बयऊदन हैं हमरे परम सनेही भाय १११ नेही गेही नरदेही को इनसोंअधिक कौनदिखलाय ॥ परम सनेही यहि देही का नेही टिका कहाँपर जाय ११२ डाटा डपटा नहीं ऊदन का पाला प्रीति रीति अधिकाय ॥ गुणही प्यारे हैं मानुष के जानौयुगनयुगनतुमभाय ११३ होय निर्गुणी जो दुनिया मा जहँ तहँ बैठै पेट खलाय ॥ यहु यश गैहैं जे आगे नर खैहैं पुवा कचौरी भाय ११४ कलियुग आवाहै दुनियामा सब सों कलह देय करवाय ॥ भूप युधिष्ठिर यहि डरिभागे गलिगैशैलहिमालयजाय११५ क्षण क्षण बुद्धी उलटै पुलटै पण्डित मूर्ख बनावैभाय ॥ उड़ै सुहारा सम परदारा आरा चलै पेट में भाय ११६ बश नहिं इन्द्री अब काहूकी कलियुग नीच मीच सुखदाय ॥ ऋषी कहावैं जे मनइनमा तिनहुनकामदेय बहँकाय११७ यहु परितापी अरु पापी अति व्यापीभयो जगत में आय ॥ हाय रुपैया यहि समया में दैया बापू रहा कहाय ११८ बिना कन्हैया के ध्याये ते विपदा कौन हटावै आय ॥
२६ आल्हखण्ड । ३४२ यहु सब जानतहैं अपने मन कलियुगअधिकरलपटाय ११९ खायँ पछारा मन कलियुग में जप तप पुण्य देयँ बिसराय ॥ कोऊ ज्ञानी अरु ध्यानी ना रघुवर पार लगावैं भाय १२० यह संजीवनि जबतक रहिहै रघुवर नाम चिंतवन् भाय ॥ यहि परितापी अरु पापी ते कोउकोउबचीसमरमें आय१२१ कलह करायो यहि कलियुगने ऊदन नहीं परै दिखराय ॥ इतना सुनिकै मलखे बोले दोऊ हाथजोरि शिरनाय १२२ गये बनाफर हैं नरवरगढ़ मकरँद ठाकुर गये लिवाय ॥ किह्यो शिकायत नहिं ऊदनने यहसब भाग्य करावै भाय १२३ पूर शनैश्वर माहिल मामा सोना लखत ल्वाह द्वैजाय ॥ आय हकीकी यहु मल्हना का फीकीकहै रातदिन भाय १२४ पै अरसान्यो त्यहि ऊदन ना क्षत्री रूप लहुरवा भाय ॥ तुम कछु शोचो अब दादा ना होनी मेटि कौनपै जाय १२५ यह अनहोनी शुभदाई भै इन्दल ब्याह करो अबभाय ॥ ऊदन मिलि हैं नरवरगढ़ माँ साँचो मिलनदीनबतलाय १२६ बहु शिरनाई यह गाई है दादै आप बुझायो जाय ॥ मोरि ढिठाई जड़ताई को करि हैं क्षमा बनाफरराय १२७ कसम जो खाई चित्ररेखा सँग करि वै ब्याह तुम्हारो आय ॥ आयसु पावैं जो दादाकी राजन न्यवतदेयँ पठनाय १२८ आल्हा बोले मलखाने ते पहिले हाल देउ बतलाय ॥ कौन देश को इन्दल हरिगे मिलिगे कौनरीतिसों भाय १२६ कछू हकीकति तुम गाई ना अबहीं न्यवत पठावो भाय ॥ इतना सुनिकै मलखे ठाकुर दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १३० जितनी कीरति बघऊदन की सो आल्हा को गये सुनाय ॥
इन्दलहरण । ३४३ २७ हाल जानि के आल्हा ठाकुर मनमें सोचिसाचिअधिकाय १३१ आयसु दीन्हो मलखाने को भावै करो तौन तुम भाय ॥ इतना सुनिकै मलखे चलि भे सुनवाँ महल पहुँचे जाय १३२ सुनवाँ दीख्यो मलखाने को आदर भाव कीन चाधिकाय ॥ हाथ पकरिकै फिरि इन्दल का मलखे भाभीदीन गहाय १३३ यह गति जानैं नारायण फिरि कितनी खुशीभई अधिकाय ॥ पूँछन लागी जब ऊदन का मलखेगये कथा सब गाय १३४ अब सुखदाई दिन आवा है भौजी पूत विवाहब जाय ॥ कायल द्वैकै बड़भाई ने हमते हुकुमदीन फरमाय १३५ यही महीना मा भौंरी हैं पण्डित साइति दीन बताय ॥ करो तयारी अब ब्याहे की नरवर मिली बनाफरराय १३६ नाम बनाफर का सुनतैखन फुल्लवा तहाँ पहुँची आय ॥ जितनी गाथा बघऊदन की बाँदिनतहां दीनवतलाय १३७ बड़ी खुशहाली भै फुल्लवा के द्यावलि बार बार बलिजाय ॥ तहँते चलिकै मलखे ठाकुर पण्डिततुरतलीनबुलवाय १३८ पूँछिकै साइति मलखे ठाकुर राजन न्यवन दीन पठवाय ॥ ब्याह नगीचे न्यवतहरी सब दशहरिपुरै पहुंचेआय १३६ माँय मन्तरा कै बयरिया मै पण्डित अटा तड़ांका आय ॥ रानी आई मोहबे वाली भारी भीर भई अधिकाय १४० करि अवलम्बा जगदम्बा का अम्बा बार बार शिरनाय ॥ भई तयारी फिरि व्याहे की इन्दलचढ़ापालकी जाय १४१ बाजे डंका अहलंका के हाहाकार शब्द गा छाय ॥ कुँवाँ विवाह्यो फिरि इन्दल ने सुनवाँ पैर दीन लटकाय १४२ यहो नेग जब पूरा द्वैगा इन्दल चढ़ा पालकी आय ॥