आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दलहरण । ३३६ २३ जो कछु कहैं चाचा हमरे सो नहिं टरै भूमिटरिजाय ८५ बेटी बोली फिरि ऊदन ते चाचा साँच देयँ बतलाय ॥ किरिया करलो तुम आवनकी तौ फिरि जाबो इन्हेंलिवाय ८६ सुनिकै बातें चितरेखा की ऊदन गङ्गालीन उठाय ॥ सुवा बनायो तब बेटी ने पिंजरा तुरत दीन बैठाय ८७ मन्त्र बतायो फिरि ऊदन को औ लै पिंजरा दीन गहाय ॥ ऊदन चलिभे फिरि महलन ते पहुँचे फेरि द्वार में आय ८८ पिंजरा दीख्यो जब देवाने तब मन खुशीभयोअधिकाय ॥ गीत बंदभे फिरि योगिन के तहँते कूच दीन करवाय ८६ चारो योगी चलि मारग में बैठे एक बृक्षतर जाय ॥ बाहर पिंजरा के सुवना करि ऊदन मानुष दीन बनाय ६० मानुष हैगे बघइन्दल जब तब सब खुशीभये अधिकाय ॥ विदाममांगि कै कान्तामल फिरि कुन्नागढ़ै पहुँचा जाय ६१ ऊदन देवा इन्दल मकरँद चारो चले तहाँते ज्वान ॥ आयकै पहुँचे सिरसागढ़ में जहँपर बसै वीरमलखान ६२ मलखे दीख्यो जब ऊदन को भेंट्यो बड़े प्रेमसों आय ॥ देवा बोल्यो मलखाने ते तुम सुनिलेउ बनाफरराय ६३ विपदा आई जब ऊदन पर फाटक बन्द लीन करवाय ॥ यहु दिन लायो नारायण जब तब तुम मिले बनाफरराय ६४ कोऊ विपदामा साथी ना साँचो साँच परा दिखराय ॥ मलखे बोले तब देवा ते तुमको साँच देयँ बतलाय ६५ लषण राम की तुम गाथा को जानो भलीभांति सरदार ॥ छोटेभाई हम आल्हा के यह सब जानिगयो संसार ६६ करें लड़ाई बड़भाई ते तौ सब क्षत्रीधर्म नशाय ॥