आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ आल्हखण्ड । ३४० धर्म न छाँड़्यो भीमसेन ने बनमाँ रह्यो मूलफलखाय ९७ किह्यो दुर्दशा दुर्योधन ने योधन भीमसेन अधिकाय ॥ हुकुम युधिष्ठिर का पायो ना आयो धन बल सबै गवाँय ९८ अब बतलाओ तुम इन्दल को पायो खोज कहाँपर भाय ॥ इतना सुनिकै बघऊदन ने सबियाँ कथा दीन बतलाय ९९ मलखे बोले फिरि ऊदन ते दशहरिपुरै चलो तुम भाय ॥ ऊदन बोले मलखाने ते दादा साँच देयँ बतलाय १०० हमहूँ मकरँद नरवर जैबै इन्दल जावो आप लिवाय ॥ कसम जो खाई चितरेखा ते करिबेब्याह तुम्हारो आय १०१ कहि समुझायो तुम दादा ते नरवर मिली उदयसिंहराय ॥ इतना सुनिकै इन्दल बोले चाचा सुनो बनाफरराय १०२ तुम ना जैहौ दशहरिपुर को तौ इन्दल कै जाय बलाय ॥ कौन बुलाई घर इन्दल का जैवो वच्छ तड़ाका आय १०३ सुनिकै बातें बघइन्दल की ऊदन कहा बहुत समुझाय ॥ मलखे दादा के सँग जावो नरवर मिलवतुम्हैं हम आय १०४ इतना कहिकै बघऊदन ने तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ मकरँद ऊदन सिरसागढ़ ते नरवर गढ़ै पहुंचे जाय १०५ मलखे देवा इन्दल ठाकुर इनहून कूच दीन करवाय ॥ लागि कचहरी परिमालिक कै तीनों तहां पहुंचे आय १०६ राजा दीख्यो जब इन्दल को तब मन खुशी भयो अधिकाय ॥ मलखे बोले तब राजा ते दोऊ हाथ जोरि शिर नाय १०७ सवैया ॥ आज जो काज कियो बघऊदन लाजरही औ बढ़ी प्रभुताई । राजन आपके पुण्य प्रकाशते भासरही जग में ठकुराई ॥