आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दलहरण । ३२७ ११ हाथ जोरिके ऊदन बोले चरणन वार बार शिरनाय १०४ मोहलति पावों छा महिना कै इन्दल खोजिदिखाओं आय ॥ इतना सुनिकै आल्हा जरिगे अपनो कोड़ा लीन उठाय १०५ पीटन लाग्यो जब ऊदन को सुनवाँ सुनत गेई तहँ आय ॥ कहि समुझायो सो आल्हाको आल्हा तुरत दीन डरियाय १०६ टरिजा टरिजा री सम्मुख ते नहिं शिरकाटि देउँ भुइँ डारि ॥ ऊदन मारा है इन्दल को साँची खबरि मिली म्वहिं नारि १०७ सुनवाँ बोली फिरि आल्हाते साँची सुनो बनाफरराय ॥ हम तुम जी हैं जो दुनिया में हैहैं पुत्र नाथ अधिकाय १०८ मिली सहोदर फिरि भाई ना आई कौन साँकरे काज ॥ सुन्दरगढ़ को चाचा हमरो तुमको कैद कीन महराज १०६ बनि सौदागर उदयसिंह ने तुम्हरी कैद दीन छुड़वाय ॥ बराबरस के ऊदन ठाकुर माड़ोली न वापका दायँ ११० लड़ि गजराजा सों ऊदन ने मलखे ब्याह दीन करवाय ॥ नरपति राजासों लड़िकै फिरि फुलवालये लहुरवा भाय १११ हथी पछारा इन दिल्ली में द्वारे पृथीराज के जाय ॥ ऐसे नामी इन ऊदन का मारब नहीं मुनासिब आय ११२ इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर जूरा पकड़ि तड़ाका लीन ॥ खैंचि तमाचा शिर माँ मारा सुनवाँ गमनमहल को कीन ११३ मारन लाग्यो फिरि ऊदन को द्यावलि सुनत पहुँची आय ॥ औ ललकारा फिरि आल्हाको मारो नहीं बनाफरराय ११४ इतना सुनिकै आल्हा बोले माता बैठु धाम में जाय ॥ जैसे ऊदन तुम को प्यारे तैसे पूत हमारो आय ११५ हम समुझावा भल ऊदन को तुम ना जाउ लहुरवा भाय ॥