आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड । ३२६ परम पियारो पुत्र हमारो इन्दल राख्यो कहाँ छिपाय ६२ पूत न होवैं बहु कलयुग में यामें भूतन को अधिकार ॥ सेव करावैं बालापन में ज्वाने भये बसैं ससुराल ६३ पूत सपूतों इन्दल प्यारो कहँ पर मैनपुरी चौहान ॥ इतना सुनिकै देवा बोला साँची कहौं शपथभगवान ६४ बंश पिथौरा के नजदीकी आहिन सत्य बनाफरराय ॥ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे भाई सरिस चारिहू भाय ६५ कमती जानैं जो काहू को तो म्वहिं सजादेयँ भगवान ॥ कोऊ लैगा छलि जादू सों इन्दल तुम्हरौ पूत परान ६६ ऊदन बिगड़े तहँ मेला में जैबे पता लगावन काज ॥ तिल तिल पृथ्वी मेला ढूँढ़ा भारी भीर तहाँ महराज ६७ पता न लाग्यो जब इन्दल को माहिल कहा तवै समुझाय ॥ आल्हा ठाकुर को समुझावव ऊदन कूच देउ करवाय ६८ कहा मानिकै तब माहिल का डाँड़े परा लहुरवा भाय ॥ जौन देश में इन्दल बैठैं ऊदन लैहैं खोज लगाय ६६ बातैं सुनिकै ये देवा की आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥ जो कछु भाषा माहिल ठाकुर साँची जना बनाफरराय १०० पुत्र शोच सों उर धड़कत भो जियेर धीर धरा ना जाय ॥ आल्हा बोले तब देवा ते तुमऊदनको लवो बुलाय १०१ उनहीं पाँयन देवा चलिभा ऊदन खबरि दीन बतलाय ॥ बड़े शोच में बड़ भैया हैं तुमकोतुरतबुलानिभाय १०२ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे सम्मुख गये तड़ाका आय ॥ आवत जान्यो जब ऊदन को आल्हाशीशलीननिहुराय १०३ औ दिशि दीख्यो ना ऊदनके मानों शत्रु ठाढ़ भो आय ॥