भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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इन्दलहरण । ३३७ २१ सुनिकै बानी महरानी कै बोला तुरत बनाफरराय ६१ हमतो योगी बंगाले के जावैं हरद्वार को माय ॥ भिक्षावृत्ती करि हम खावैं तुमते साँच दीन बतलाय ६२ रानी बोली फिरि योगिन ते बारे डारयो मूड़ मुड़ाय ॥ कौनि व्यवस्था तुमपर परिगै सोऊ साँच देउ बतलाय ६३ सुनिकै बानी यह रानी कै बोला मैनपुरी चौहान ॥ गीता गायो जो अर्जुन ते स्वामी कृष्णचन्द्र भगवान ६४ पढ़ि पढ़ि गीता बैरागी है हम सब लीन योग को धार ॥ लिखी विधाता की मेटै को रानी मानो कही हमार ६५ इतना सुनिकै रानी बोली अब तुम भजन सुनावोगाय ॥ बातें सुनिकै महरानी की नाचनलाग लहुरवा भाय ६६ बेटी आई अभिनन्दन कै देखै सोऊ तमाशा धाय ॥ बाजै खँझड़ी तहँ देवा कै मकरँद डमरू रहा बजाय ६७ भैरोंवाली पुरिया डारी सबकी सुधिबुधि गई हिराय ॥ ऊदन बोले तब बेटी ते भोजन हमै देउ करवाय ६८ कीनि तयारी जब ब्यारी कै लाग्यो चित्त तबै मचलाय ॥ कलके भूखे हम गावत हैं आरी भयन पेटके घाय ६९ सुनिकै बातें ये ऊदन की बेटी चलि भै साथ जिवाय ॥ जायकै पहुँची पँचमहलापर पीड़ा तहाँ दीन डरवाय ७० ऊदन बोले तब बेटी ते तुमको मंत्र देयँ बतलाय ॥ सुनिकै बातें ई योगी की बेटी बाँदिन दीन हटाय ७१ ऊदन बोले तब बेटी ते हमसे साँच देउ बतलाय ॥ इन्दलठाकुर तुम्हरे घर में ठहरे कौन जगहपर आय ७२ जो अभिलाषा फिरि तुम्हरीहो अबहीं पूरी देयँ करवाय ॥ २२