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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

इन्दलहरण । ३३७ २१ सुनिकै बानी महरानी कै बोला तुरत बनाफरराय ६१ हमतो योगी बंगाले के जावैं हरद्वार को माय ॥ भिक्षावृत्ती करि हम खावैं तुमते साँच दीन बतलाय ६२ रानी बोली फिरि योगिन ते बारे डारयो मूड़ मुड़ाय ॥ कौनि व्यवस्था तुमपर परिगै सोऊ साँच देउ बतलाय ६३ सुनिकै बानी यह रानी कै बोला मैनपुरी चौहान ॥ गीता गायो जो अर्जुन ते स्वामी कृष्णचन्द्र भगवान ६४ पढ़ि पढ़ि गीता बैरागी है हम सब लीन योग को धार ॥ लिखी विधाता की मेटै को रानी मानो कही हमार ६५ इतना सुनिकै रानी बोली अब तुम भजन सुनावोगाय ॥ बातें सुनिकै महरानी की नाचनलाग लहुरवा भाय ६६ बेटी आई अभिनन्दन कै देखै सोऊ तमाशा धाय ॥ बाजै खँझड़ी तहँ देवा कै मकरँद डमरू रहा बजाय ६७ भैरोंवाली पुरिया डारी सबकी सुधिबुधि गई हिराय ॥ ऊदन बोले तब बेटी ते भोजन हमै देउ करवाय ६८ कीनि तयारी जब ब्यारी कै लाग्यो चित्त तबै मचलाय ॥ कलके भूखे हम गावत हैं आरी भयन पेटके घाय ६९ सुनिकै बातें ये ऊदन की बेटी चलि भै साथ जिवाय ॥ जायकै पहुँची पँचमहलापर पीड़ा तहाँ दीन डरवाय ७० ऊदन बोले तब बेटी ते तुमको मंत्र देयँ बतलाय ॥ सुनिकै बातें ई योगी की बेटी बाँदिन दीन हटाय ७१ ऊदन बोले तब बेटी ते हमसे साँच देउ बतलाय ॥ इन्दलठाकुर तुम्हरे घर में ठहरे कौन जगहपर आय ७२ जो अभिलाषा फिरि तुम्हरीहो अबहीं पूरी देयँ करवाय ॥ २२

[Header] २२ आल्हखण्ड । ३३८

मोहिं तपस्या को बल पूरो तुमहूँ राख्यो नाहिं छिपाय ७३ भूत भविष्यत बर्त्तमान की गाथा सबै सकैं बतलाय ॥ बातें सुनिकै ई योगी की बेटी पिंजरा लई उठाय ७४ करिकै बाहर फिरि पिंजराके तुरतै मानुष दीन बनाय ॥ यही तरासों नित प्रति बेटी निशि में पास लेय पौढ़ाय ७५ इन्दल दीख्यो जब ऊदन को तब यह बोल्यो बचन सुनाय ॥ धोखे भूले ना योगी के चाचा यहाँ पहुँचे आय ७६ बातें सुनिकै ये इन्दल की बेटी मूड़ लीन निहुराय ॥ ऊदन बोले तब बेटी ते तुम्हरो ब्याह देब करवाय ७७ सुवा बनावो तुम इन्दल को हम को मंत्र देउ बतलाय ॥ परो उदासी है मोहबे में करिवे ब्याह वहाँते आय ७८ बेटी बोली तब ऊदन ते चाचा साँचेयँ बतलाय ॥ डोला हमरो पहिले जाई तौ हम मानुष देब बनाय ७६ नहीं तो कन्ता अब जैहैंना रैहैं सदा हमारे पास ॥ वारा बरसै जब तप कीनी तब विधि पूरिकीन मम आश ८० कैसे जीवे बिन स्वामी के चाचा कहैं छोड़िकै लाज ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले बेटी धरो धीर मनआज ८१ चोरी चोरा म्वहिं भावै ना तुमने साफ देयँ बतलाय ॥ कौन डसरिहा उदयसिंहको रोंकी ब्याह यहाँपर आय ८२ बांधिकै मुशकें अभिनन्दनकी भौंरी तुरत लेव करवाय ॥ देश देश औ जगमें जाहिर नामी सबै बनाफरराय ८३ महिनाभर के फिरि अर्सा में ह्याँपर ब्याह करब हम आय ॥ इन्दल बोले चितरेखा ते यहही ठीकठाक ठहराय ८४ कहा न टारो तुम चाचाको तौ विधि फेरि मिलै हैं आय ॥

इन्दलहरण । ३३६ २३ जो कछु कहैं चाचा हमरे सो नहिं टरै भूमिटरिजाय ८५ बेटी बोली फिरि ऊदन ते चाचा साँच देयँ बतलाय ॥ किरिया करलो तुम आवनकी तौ फिरि जाबो इन्हेंलिवाय ८६ सुनिकै बातें चितरेखा की ऊदन गङ्गालीन उठाय ॥ सुवा बनायो तब बेटी ने पिंजरा तुरत दीन बैठाय ८७ मन्त्र बतायो फिरि ऊदन को औ लै पिंजरा दीन गहाय ॥ ऊदन चलिभे फिरि महलन ते पहुँचे फेरि द्वार में आय ८८ पिंजरा दीख्यो जब देवाने तब मन खुशीभयोअधिकाय ॥ गीत बंदभे फिरि योगिन के तहँते कूच दीन करवाय ८६ चारो योगी चलि मारग में बैठे एक बृक्षतर जाय ॥ बाहर पिंजरा के सुवना करि ऊदन मानुष दीन बनाय ६० मानुष हैगे बघइन्दल जब तब सब खुशीभये अधिकाय ॥ विदाममांगि कै कान्तामल फिरि कुन्नागढ़ै पहुँचा जाय ६१ ऊदन देवा इन्दल मकरँद चारो चले तहाँते ज्वान ॥ आयकै पहुँचे सिरसागढ़ में जहँपर बसै वीरमलखान ६२ मलखे दीख्यो जब ऊदन को भेंट्यो बड़े प्रेमसों आय ॥ देवा बोल्यो मलखाने ते तुम सुनिलेउ बनाफरराय ६३ विपदा आई जब ऊदन पर फाटक बन्द लीन करवाय ॥ यहु दिन लायो नारायण जब तब तुम मिले बनाफरराय ६४ कोऊ विपदामा साथी ना साँचो साँच परा दिखराय ॥ मलखे बोले तब देवा ते तुमको साँच देयँ बतलाय ६५ लषण राम की तुम गाथा को जानो भलीभांति सरदार ॥ छोटेभाई हम आल्हा के यह सब जानिगयो संसार ६६ करें लड़ाई बड़भाई ते तौ सब क्षत्रीधर्म नशाय ॥

२४ आल्हखण्ड । ३४० धर्म न छाँड़्यो भीमसेन ने बनमाँ रह्यो मूलफलखाय ९७ किह्यो दुर्दशा दुर्योधन ने योधन भीमसेन अधिकाय ॥ हुकुम युधिष्ठिर का पायो ना आयो धन बल सबै गवाँय ९८ अब बतलाओ तुम इन्दल को पायो खोज कहाँपर भाय ॥ इतना सुनिकै बघऊदन ने सबियाँ कथा दीन बतलाय ९९ मलखे बोले फिरि ऊदन ते दशहरिपुरै चलो तुम भाय ॥ ऊदन बोले मलखाने ते दादा साँच देयँ बतलाय १०० हमहूँ मकरँद नरवर जैबै इन्दल जावो आप लिवाय ॥ कसम जो खाई चितरेखा ते करिबेब्याह तुम्हारो आय १०१ कहि समुझायो तुम दादा ते नरवर मिली उदयसिंहराय ॥ इतना सुनिकै इन्दल बोले चाचा सुनो बनाफरराय १०२ तुम ना जैहौ दशहरिपुर को तौ इन्दल कै जाय बलाय ॥ कौन बुलाई घर इन्दल का जैवो वच्छ तड़ाका आय १०३ सुनिकै बातें बघइन्दल की ऊदन कहा बहुत समुझाय ॥ मलखे दादा के सँग जावो नरवर मिलवतुम्हैं हम आय १०४ इतना कहिकै बघऊदन ने तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ मकरँद ऊदन सिरसागढ़ ते नरवर गढ़ै पहुंचे जाय १०५ मलखे देवा इन्दल ठाकुर इनहून कूच दीन करवाय ॥ लागि कचहरी परिमालिक कै तीनों तहां पहुंचे आय १०६ राजा दीख्यो जब इन्दल को तब मन खुशी भयो अधिकाय ॥ मलखे बोले तब राजा ते दोऊ हाथ जोरि शिर नाय १०७ सवैया ॥ आज जो काज कियो बघऊदन लाजरही औ बढ़ी प्रभुताई । राजन आपके पुण्य प्रकाशते भासरही जग में ठकुराई ॥

इन्दलहरण । २४१ २५ पारसहै जिनके घरमा तिनकी लघुता कहि कोन दिखाई । राजनराज समाजबढ़्यो औचढ़योललिते यशसिंधुउफाई १०८ इतना कहिकै मलखाने ने औरो हाल दीन बतलाय ॥ बिदामांगिकै परिमालिक ते दशहरिपुरै पहुँचे आय १०६ मलखे देवा इन्दल सँगमाँ महलन गये बनाफरराय ॥ रूप देखिकै इन तीनों का आल्हा ठाढ़ भये हर्षाय ११० बड़ी खुशहाली मन अन्तरभै औ यह बोले बचन सुनाय ॥ कहाँ बनाफर बयऊदन हैं हमरे परम सनेही भाय १११ नेही गेही नरदेही को इनसोंअधिक कौनदिखलाय ॥ परम सनेही यहि देही का नेही टिका कहाँपर जाय ११२ डाटा डपटा नहीं ऊदन का पाला प्रीति रीति अधिकाय ॥ गुणही प्यारे हैं मानुष के जानौयुगनयुगनतुमभाय ११३ होय निर्गुणी जो दुनिया मा जहँ तहँ बैठै पेट खलाय ॥ यहु यश गैहैं जे आगे नर खैहैं पुवा कचौरी भाय ११४ कलियुग आवाहै दुनियामा सब सों कलह देय करवाय ॥ भूप युधिष्ठिर यहि डरिभागे गलिगैशैलहिमालयजाय११५ क्षण क्षण बुद्धी उलटै पुलटै पण्डित मूर्ख बनावैभाय ॥ उड़ै सुहारा सम परदारा आरा चलै पेट में भाय ११६ बश नहिं इन्द्री अब काहूकी कलियुग नीच मीच सुखदाय ॥ ऋषी कहावैं जे मनइनमा तिनहुनकामदेय बहँकाय११७ यहु परितापी अरु पापी अति व्यापीभयो जगत में आय ॥ हाय रुपैया यहि समया में दैया बापू रहा कहाय ११८ बिना कन्हैया के ध्याये ते विपदा कौन हटावै आय ॥

२६ आल्हखण्ड । ३४२ यहु सब जानतहैं अपने मन कलियुगअधिकरलपटाय ११९ खायँ पछारा मन कलियुग में जप तप पुण्य देयँ बिसराय ॥ कोऊ ज्ञानी अरु ध्यानी ना रघुवर पार लगावैं भाय १२० यह संजीवनि जबतक रहिहै रघुवर नाम चिंतवन् भाय ॥ यहि परितापी अरु पापी ते कोउकोउबचीसमरमें आय१२१ कलह करायो यहि कलियुगने ऊदन नहीं परै दिखराय ॥ इतना सुनिकै मलखे बोले दोऊ हाथजोरि शिरनाय १२२ गये बनाफर हैं नरवरगढ़ मकरँद ठाकुर गये लिवाय ॥ किह्यो शिकायत नहिं ऊदनने यहसब भाग्य करावै भाय १२३ पूर शनैश्वर माहिल मामा सोना लखत ल्वाह द्वैजाय ॥ आय हकीकी यहु मल्हना का फीकीकहै रातदिन भाय १२४ पै अरसान्यो त्यहि ऊदन ना क्षत्री रूप लहुरवा भाय ॥ तुम कछु शोचो अब दादा ना होनी मेटि कौनपै जाय १२५ यह अनहोनी शुभदाई भै इन्दल ब्याह करो अबभाय ॥ ऊदन मिलि हैं नरवरगढ़ माँ साँचो मिलनदीनबतलाय १२६ बहु शिरनाई यह गाई है दादै आप बुझायो जाय ॥ मोरि ढिठाई जड़ताई को करि हैं क्षमा बनाफरराय १२७ कसम जो खाई चित्ररेखा सँग करि वै ब्याह तुम्हारो आय ॥ आयसु पावैं जो दादाकी राजन न्यवतदेयँ पठनाय १२८ आल्हा बोले मलखाने ते पहिले हाल देउ बतलाय ॥ कौन देश को इन्दल हरिगे मिलिगे कौनरीतिसों भाय १२६ कछू हकीकति तुम गाई ना अबहीं न्यवत पठावो भाय ॥ इतना सुनिकै मलखे ठाकुर दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १३० जितनी कीरति बघऊदन की सो आल्हा को गये सुनाय ॥

इन्दलहरण । ३४३ २७ हाल जानि के आल्हा ठाकुर मनमें सोचिसाचिअधिकाय १३१ आयसु दीन्हो मलखाने को भावै करो तौन तुम भाय ॥ इतना सुनिकै मलखे चलि भे सुनवाँ महल पहुँचे जाय १३२ सुनवाँ दीख्यो मलखाने को आदर भाव कीन चाधिकाय ॥ हाथ पकरिकै फिरि इन्दल का मलखे भाभीदीन गहाय १३३ यह गति जानैं नारायण फिरि कितनी खुशीभई अधिकाय ॥ पूँछन लागी जब ऊदन का मलखेगये कथा सब गाय १३४ अब सुखदाई दिन आवा है भौजी पूत विवाहब जाय ॥ कायल द्वैकै बड़भाई ने हमते हुकुमदीन फरमाय १३५ यही महीना मा भौंरी हैं पण्डित साइति दीन बताय ॥ करो तयारी अब ब्याहे की नरवर मिली बनाफरराय १३६ नाम बनाफर का सुनतैखन फुल्लवा तहाँ पहुँची आय ॥ जितनी गाथा बघऊदन की बाँदिनतहां दीनवतलाय १३७ बड़ी खुशहाली भै फुल्लवा के द्यावलि बार बार बलिजाय ॥ तहँते चलिकै मलखे ठाकुर पण्डिततुरतलीनबुलवाय १३८ पूँछिकै साइति मलखे ठाकुर राजन न्यवन दीन पठवाय ॥ ब्याह नगीचे न्यवतहरी सब दशहरिपुरै पहुंचेआय १३६ माँय मन्तरा कै बयरिया मै पण्डित अटा तड़ांका आय ॥ रानी आई मोहबे वाली भारी भीर भई अधिकाय १४० करि अवलम्बा जगदम्बा का अम्बा बार बार शिरनाय ॥ भई तयारी फिरि व्याहे की इन्दलचढ़ापालकी जाय १४१ बाजे डंका अहलंका के हाहाकार शब्द गा छाय ॥ कुँवाँ विवाह्यो फिरि इन्दल ने सुनवाँ पैर दीन लटकाय १४२ यहो नेग जब पूरा द्वैगा इन्दल चढ़ा पालकी आय ॥

[Header] २८ आल्हाखण्ड । ३४४

[Text] सजे बराती तहँ ठाढ़े थे आल्हा कूचदीनकरवाय १४३ चलिकै पहुँचे फिरि नरवरगढ़ ऊदन मिले तहां पर आय ॥ लैके फौजै मकरन्दा मिलि आल्हा सहितचलेहर्षाय १४४ अटक उतरिकै काबुल ह्वैकै पहुँचे मास अन्त में जाय ॥ रहो बुखारो आठ कोस जब तब टिकिरहे बनाफरराय १४५ टिकिगा लश्कर राजपूतन का क्षत्रिन छोरि घरे हथियार ॥ आल्हा ठाकुर के तम्बू माँ बैठे बड़े बड़े सरदार १४६ बोले पण्डित तब आल्हा ते तुम सुनि लेउ बनाफरराय ॥ ऐपनावारी की विरिया है रूपन बारी देउ पठाय १४७ इतना सुनिकै रूपन बोला दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ हम नहिं जैहैं बलखबुखारे अबकी आनदेउपठवाय १४८ इतना सुनिकै मलखे बोले रूपन साँच देउ बतलाय ॥ जौने घोड़ा का जी चाहै तौनै देयँ तुरत मँगवाय १४६ घोड़ करलिया रूपन् माँग्यो मलखे तुरत दीन कसवाय ॥ ऐपनावारी बारी लैके बैठा घोड़ पीठि में जाय १५० ढाल खङ्ग लै मलखाने ते रूपन कूच दीन करवाय ॥ डेढ़ पहर के फिरि अर्सा मा पहुँचाराराजद्वार पर जाय १५१ हुकुम दर्रै हुकुम दरर्रै नाहर घोड़े के असवार ॥ कहाँ ते आये औ कहँ जैहै कहँ है देश रावरे क्यार १५२ इतना सुनिकै रूपन बोला तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ नगर महोबाते आयन हम इन्दलब्याहकरनको भाय १५३ ऐपनावारी हम लै आये रूपन बारी नाम हमार ॥ खबरि जनावो महराजा को हमरो नेग देयँ अबदार १५४ इतना सुनिकै द्वारपाल कह रूपन बारी बात सुनाय ॥

[Header] इन्दलहरण । ३४५ २६

काह नेग द्वारे को चहिये सोऊ देयँ आप बतलाय १५५ रूपन बोला द्वारपाल सों यह तुम खबरि सुनाबो जाय ॥ एक पहर भर चलै सिरोही यहही नेग देयँ पठवाय १५६ सुनिकै बातैं ये बारी की आरी द्वारपाल अधिकाय ॥ शोचि समझिकै महराजा सों रूपन कथा सुनाई जाय १५७ इतना सुनिकै अभिनन्दन ने हंसामल को लयो बुलाय ॥ पकरिकै लावो त्यहि बारी को द्वारे जौन रहा बराय १५८ इतना सुनिकै हंसामल ने अपनी लई ढाल तलवार ॥ औरो क्षत्री चलि ठाढ़े भे अपने बाँधि बाँधि हथियार १५९ द्वारे देखें जब बारी को आरी भये सिपाही ज्वान ॥ भीर देखिकै रूपन बारी लाग्योकरन घोरघमसान १६० चली सिरोही भल द्वारे पर औ बहिचली रक्त की धार ॥ रूपन बारी के मुर्चा पर अंधा धुंध चलै तलवार १६१ रूपन मारे तलवारी सों घोड़ा करै टाप की मार ॥ बड़े लड़ैया काबुल वाले मनसों गये तहाँपर हार १६२ धर्म बनाफर का जाहिर है जिनके जपै तपै का काम ॥ विजय अधर्मिन की दीखी ना रावण कीन बहुतसंग्राम १६३ कंस सुयोधन जरासंध अरु अधरम रूप मरा शिशुपाल ॥ काल कलेवा सबको कीन्ह्यो रहिगा धर्मएक सबकाल १६४ ताते धर्मी आल्हा ठाकुर रूपन खूब करै तलवार ॥ देखि वीरता यह रूपन की हंसा कहा बचनललकार १६५ सँभरिकै बैठै अब घोड़ा पर बारी भली मचाई रार ॥ जियत न जैहै दरवाजे ते हमरी देखि लेय तलवार १६६ इतना सुनिके रूपन बोला क्षत्री गानो कही हमार ॥

३० आल्हखण्ड । ३४६ नेग आपनो हम भरिपावा राजन आय आपके द्वार १७७ दायज लेहैं आल्हा ठाकुर अब हम जान चहत सरदार ॥ इतना कहिकै रूपन बारी फाटक निकरिगयो वा पार १७८ मारु मारु कहि क्षत्री दौरे रूपन घोड़ दीन दौराय ॥ आयकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में ज्यहि में बैठ बनाफरराय १७६ खबरि सुनाई ह्याँ आल्हा को हाँपर शूर लागि पछिताय ॥ तब अभिनन्दन सब लरिकनते बोला दोऊ भुजा उठाय १८० बाजै डङ्का अहसङ्का के लश्कर सबै होय तय्यार ॥ जान न पावैं मोहबे वाले मारो ढूँढ़ि ढूँढ़ि सरदार १८१ हुकुम पायकै महाराजा को सातो पुत्र भये तय्यार ॥ झीलम बख्तर पहिरि सिपाही हाथम लई ढालतलवार १८२ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ धरिगे हौदा तिन हाथिनपर क्षत्री चढ़े समरके काज १८३ को गति बरणै तहँ घोड़न कै जिनपर चढ़े शूर शिरताज ॥ सजिगा हाथी अभिनन्दन का तापर बैठिगयो महराज १८४ सुमिरि भवानी सुत गणेशको राजा कूच दीन करवाय ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे चहचह धुरीरहीं चिल्लाय १८५ मारु मारु करि मौहरि बाजीं बाजीं हाय हाय करनाल ॥ मारू बाजा सुनि बोलत भा बेटा देशराज का लाल १८६ जनु अभिनन्दन चढ़िआवत है लक्षण जानि परै यहिकाल ॥ हँसिकै बोला मलखाने ते बेटा देशराज का लाल १८७ सजिये दादा मलखाने अब देवा होउ आप तय्यार ॥ और सिपाही जे मोहबे के तेऊ बाँधि लेयँ हथियार १८८ सुनिकै बातें बघऊदन की सतियाँ शूर भये तय्यार ॥

इन्दलहरण । ३४७ ३१ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग व्यवहार १७९ बलखबुखारे का अभिनन्दन सोऊ गयो समर में आय ॥ प्रथम लड़ाई भै तोपन कै धुवना रहा सरगमें छाय १८० लागै गोला ज्यहि हाथी के मानो ब्यार सेंधिकैजाय ॥ जउने ऊँट के गोला लागै तुरतै गिरै समर अललाय १८१ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के धुनकत रुई सरिरो काड़ि जाय ॥ लागै गोला ज्यहि घोड़ाके मानों गिरह कबूनरखाय १८२ जौने रथमा गोला लागै पहिया धुरी अलग है जाय ॥ गिरैं कगारा जस नदिया में तैसे गिरैं ऊँट गजधाय १८३ सन् सन् सन् सन् गोलीछूटैं लोटैं शूर पछारारखाय ॥ छाँड़ि आसरा जिंदगानी का खेलन लागे ल्वाह अघाय १८४ भाला बलछी छूटन लागे कहुँ कहुँ कड़ाबीन की मार ॥ मारैं तेगा बर्दवानका ऊना चलै विलाइति क्यार १८५ चलै कटारी बूँदी वाली अंधाधुंध चलै तलवार ॥ मुएडन केरे मुड़चौरा भै औ रुण्डन के लगे पहार १८६ बड़ी लड़ाई अभिनन्दन की नदिया बही रक्तकी धार ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर उदयसिंह सरदार १८७ सातौ लड़िका अभिनन्दन के जामाझार करै तलवार ॥ चढ़ा चौंड़िया इकदन्तापर बकशीजौनु पिथौराक्यार १८८ हनि हनि मारै रजपूतन का चौंड़ा समरधनी मैदान ॥ कागति बरणौं मैं देवाकै ठाकुर मैनपुरी चौहान १८६ हंसा ठाकुर के मुर्च्चापर पहुँचा समरधनी मलखान ॥ घोड़ी कबूतरी टापन मारै घायल होयँ अनेकन ज्वान १६० को गति बरणे मलखाने कै बेटा बच्छराज का लाल ॥

३१ आल्हखण्ड । ३४८ स्यहिकी समता का हंसा ना पै तहँ युद्ध करै विकराल १६१ कोगति वरणै तहँ हंसा कै धंसा बड़े बड़े सरदार ॥ भई प्रशंसा तहँ हंसा कै क्षत्रीडारि भागि तलवार १६२ बड़ा प्रतापी अरि परितापी सुर्खा घोड़े पर असवार ॥ गनि गनि मारै रजपूतन को क्षत्री खेलै खूब शिकार १६३ भागीं फ़ौजें मोहबेवाली आली खानदान को ज्वान ॥ आयकै गर्ज्यौ त्यहि समयामें नाहरसमरधनी मलखान १६४ अकसर मलखे के जियरे पर अरुझे बड़े बड़े सरदार ॥ जीति न पावैं मलखाने ते औमुहँ फेरिलेयँ त्यहिवार १६५ देवा बोला तब ऊदन ते ठाकुर बेंदुल के असवार ॥ अकसर मलखे के ऊपर माँ क्षत्री अरुझे तीनिहजार १६६ भागीं सेना मुहबेवाली अकसर लड़ै वीर मलखान ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभा संग मचला चौंड़ियाज्वान १६७ ब्रह्मा मकरँद जगनायकजी येऊ चलतभये त्यहिवार ॥ जोगा भोगा देवा ठाकुर मन्नागूजर परम जुझार १६८ ये सब पहुँचे समरभूमि में हाथमें लिये नाँगि तलवार ॥ बलखबुखारे के क्षत्रिन को मारनलागि ढूँढ़िसरदार १६६ बड़ी कसामसि समरभूमि मै कहुँ तिलडरा भूमि ना जाय ॥ छाय लालरीगै अकाश में सबरँग ध्वजारहे फहराय २०० घोड़ा हींसैं समरभूमि में सावन यथा मेघ गहरायँ ॥ हाथी चिघरैं रणमण्डल में कायर समर न रोंकैं पायँ २०१ शूर सिपाही ईजतवाले ते तहँ मारु मारु बग्याँयँ ॥ कऊ तमंचा को धरि धमकै कोऊदेयँ गुर्ज के घाय २०२ कोऊ मारै तलवारी सों कोऊ मारैं ढाल घुमाय ॥

इन्दलहरण । ३४६ ३३ पटा बनेठी बाना जानैं तेनर मारैं गदा चलाय २०३ बलखबुखारे का अभिनन्दन मलखे साथ करै तलवार ॥ हंसा ठाकुर उदयसिंह ये दोऊ लड़ैं तहाँ सरदार २०४ सुख्खालड़िका अभिनन्दनका मकरँद नरपति राजकुमार ॥ अपने अपने दउ मुर्चा मा मारैं एक एक ललकार २०५ देवाठाकुर औ मोहन का परिगा समर बरोबरि आय ॥ बड़ी लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो कायर भागे पीठि दिखाय२०६ जितने कायर दुहुँतरफा के तरलोथिन के रहे लुकाय ॥ हेला आवै जब हाथिन का तब बिन मरे मौत है जाय २०७ कागति बरणौं मैं कायर कै मनमा बार बार पछितायँ ॥ हाय रुपैयन के लालच ते हमरे गई प्राणपर आय २०८ करत नौकरी क्यहु बनियांके हल्दी धनियां के बयपार ॥ तौ नहिं बिपदा हमपर आवत छूटत नहीं लोग परिवार २०६ कायर सोचैं यह अपने मन शूरन होयँ अनन्दाचार ॥ गिरि उठि मारैं समरभूमि में दोऊ हाथ करैं तलवार २१० छाँड़ि आसरा जिंदगानी का क्षत्रिन कीन घोरघमसान ॥ दोउदल अरुझे समरभूमिमा मारैं एकएक को ज्वान २११ कटिकटि कङ्क्षागिरैं समर में उठि उठि रुण्डकरैं तलवार ॥ मुण्डन केरे मुड़ चौरा भे औ रुण्डन के लगेपहार २१२ परीं लहासैं जो मनइन की तिनकाखावैं श्वान सियार ॥ मेला हैगा तहँ गीधन का चील्हनसीधाका व्यवहार २१३ नचैं योगिनी खप्परलीन्हे मज्जैं भूत प्रेत बैताल ॥ धरु धरु धरु धरु मारो मारो बोलै वच्छराजका लाल २१४ ऊदन ताकै ज्यहि हौदाका बैंदुल तहाँ देइ पहुँचाय ॥

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३४ आल्हखण्ड । ३५० सातो लड़का अभिनन्दन के आल्हा कैदलीनकरवाय २१५ तब अभिनन्दन रिसहा ह्वैकै अपनो हाथी दीन बढ़ाय ॥ आल्हा ठाकुर पचशब्दापर राजा पास पहुँचे आय २१६ तब ललकारो अभिनन्दनने आल्हा कूच देउ करवाय ॥ जियत न जैहौ तुम सम्मुखने जोविधिआपवचावैआय २१७ इतना सुनिकै आल्हा बोले राजन साँच देयँ बतलाय ॥ बिना बियाहे हम बेटा को कैसे लौटि मोहोवे जायँ २१८ भलो आपनो जो तुम चाहौ सबकी कैद लेउ छुड़वाय ॥ हँसी खुशी सों बेटी ब्याहो काहे रारि बढ़ावो भाय २१६ बिना बियाहे हम जैबै ना बहुतन धजीधजी उड़िजाय ॥ इतना सुनिकै अभिनन्दनने मास्यो भालातुरतचलाय २२० वार बचाई तब आल्हा ने साँकरि हाथी दीन गहाय ॥ आल्हा बोले पचशब्दा ते अब गाढ़े में होउ सहाय २२१ घूमो हाथी तब आल्हा को रणमा साँकरिहा घुमाय ॥ जितने साथी अभिनन्दन के ते सब भागे पीठिदिखाय २२२ झुके सिपाही मोहवे वालै मारैं एक एक को धाय ॥ अलखे ऊदन देवा मकरँद सबियाॅलशकरदीनभगाय २२३ भागी फौजैं अभिनन्दन की इकलो रहा आप नरराज ॥ कियो लड़ाई भल इकलेई कैदी भयो फेरि महराज २२४ गंगा कीन्ही फिरि फौजन में इन्दल ब्याह द्याव करवाय। सातों लड़िकन सों महाराजा आल्हाठाकुरदीन छुड़ाय २२५ तुरतै पण्डित को बुलवायो सोऊ साइति दीन बताय ॥ भई तयारी फिरि भौरिन कै मड़ये तेरे पहुँचे जाय २२६

इन्दलहरण । ३५१ ३५ सवैया ॥ आमको खम्भगड़ो तहँ सुन्दर माड़व मालिन ठीक बनायो । कै गठि बन्धन बैठिगयो नृप स्वच्छ कुशानिज हाथ उठायो ॥ दान दयेउ कन्या अभिनन्दन वन्दन कै रघुनाथ मनायो । चन्दन अक्षत फूलनलै ललिते मनमोद गणेशचढ़ायो २२७ बड़ी खुशी सों अभिनन्दनने बेटी ब्याह दीन करवाय ॥ बिदा करायो चितरेखा को औधनदीन्ह्योखूब लुटाय २२८ भये अयाचक सब याचक गण जय जयकार रहे सब गाय ॥ बाजे डंका अहर्तंका के आल्हा कूचदीनकरवाय २२६ एक महीना के भीतर में दशहरि पुरै पहुंचे आय ॥ घरछन करिकै दरवाजे सों सुनवाँ लैगय वधूलिवाय २३० दगीं सलामी की तोपैं बहु ध्रुवना रहा रगमें छाय ॥ मनियादेवन की पूजाकरि बैठीं धाम आपने आय २३१ आल्हा बैठे फिरि महलन में ऊदन बैठे शीश नवाय ॥ माहिलठाकुर की गाथा को आल्हाठाकुर दीनसुनाय २३२ चुगुलशिरोमणि माहिलठाकुर ठाकुर रहे तहाँ सब गाय ॥ होय भलाई मम चुगुलिन में इतनाकहा ललुरवाभाय २३३ खेत छूटिगा दिन नायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ ब्याहपूर भा अब इन्दल का सुमिरौं तुम्हें शारदामाय २३४ पारलगायो महरानी तुम दानीयुगन युगन अधिकाय ॥ कोउअभिमानीजगरहिगा ना ज्यहिपरकोपकीनतुममाय २३५ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतकथाकसगाय २३६

३६ आल्हखण्ड । ३५२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहै चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर २३७ माथ नवावौं पितु अपने को ह्यांते करौं तरँग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त २३८ इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गत पँडरीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुध कृपाशङ्कर सूनु पं० ललिताप्रसादकृत इन्द्लपाणिग्रहण बर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥ इन्दलहरण सम्पूर्ण शुभमस्तु ॥ इति ॥

अथ आल्हाखण्ड ॥ आल्हानिकासी ॥ सवैया ॥ राम औ श्याम अकाम भजै सो तजै जगके सब पातकभाई । बामन पद प्रक्षालनके जलसों भइ गंग पुराणन गाई ॥ ज्ञात सबै बिख्यात सबय ललिते ज्यहि भांति धरापरआई । गाई बताई न जाय कछू अब कीरति गंग धरापर छाई १ सुमिरन ॥ ध्याय भवानी शिवशंकर को सुमिरन करै गंगको भाय ॥ सो तरिजावै भवसागर सों पावै अमर रूपको जाय १ गावै नित प्रति रघुनन्दन को नरपुर फेरि न जन्मै आय ॥ बड़ा महातम रघुनन्दन कत नारद वालमीकि कहगाय २ गीधअजामिल शबरीगणिका चारो कीरति रहे बताय ॥ कलियुग तुलसीकी समताको दूसर कौन बतावा जाय ३ ॥

२ आल्हखण्ड । ३५४ तैसे कीरति यदुनन्दन की द्वापर फैलिगई अधिकाय ॥ सूर औ मीराबाई कलियुग पायो स्वाद भूमिमें आय ४ ललिते चक्खन को ललचायो गायो आल्हा छन्द बनाय ॥ कहौं निकासी अब आल्हा कै सुमिरन देवनको बिसराय ५ अथ कथाप्रसंग ॥ एक समइया की बातैं हैं यारो मानो कही हमार ॥ लिल्ही घोड़ीपर चढ़ि बैठो माहिल उरई का सरदार १ तिकृतिकृतिकृतिकूटिटुईहाँकत दिल्ली शहर पहुँचा जाय ॥ लागिकचहरी दिल्लीपति की जिनका कही पिथौराराय २ आवत दीख्यो तिन माहिलका अपने पास लीन बैठाय ॥ बड़ी खातिरी करि माहिल कै पूँछन लाग पिथौराराय ३ काहे आये उरई वाले आपन हाल देउ बतलाय ॥ इतना सुनिकै माहिल बोले साँची सुनो पिथौराराय ४ मलखे सुलखे आल्हा ऊदन इनका दीखे देश डेराय ॥ आज बनाफर की समता को ठाकुर आन नहीं दिखलाय ५ चार चौहदी के डाँड़े पर मलखे किलालीन बनवाय ॥ जो कछु चाहैं आल्हा ऊदन सो सब करिकै देयँ दिखाय ६ कौन दूसरिहा है आल्हा का सम्मुख बात करै जो जाय ॥ मान न रहिगे क्यहु नरेश के चारो बढ़े बनाफरराय ७ हमका मानैं भल मामा करि खातिर करैं रोज अधिकाय ॥ हमहूं जानत हैं ब्रह्मा सम राजन साँच दीन बतलाय ८ अधिक पियारे पै तिनते तुम मानो कही पिथौराराय ॥ तुम्हें लरिकईं सों जानत हौं सीधो सादो आप स्वभाव ६ तिनकी धरती का स्वामी मैं त्यहिका पास लियो बैठाय ॥

आल्हानिकासी । ३५५ २ तुम अस राजा को दुनियामें ज्यहितेप्रीतकरौअधिकाय १० इतना सुनिकै पिरथी बोले माहिल उरई के सरदार ॥ यतन बताओ यहि समया में जासों जायँ बनाफर हार ११ इतना सुनिकै माहिल बोले मानो कही पिथौराशय ॥ पाँच बछेड़ा मोहबे वाले तिनका आप लेउ मँगवाय १२ बेंदुल हंसामनि हरनागर पपिहा और कबूतरि पाँच ॥ उड़न बछेड़ा ये पाँचों हैं इनबल लड़ैं बनाफर साँच १३ पाँचो घोड़न के पाये ते साँचो विजय होय महराज ॥ जीति न पैहौ तिन पाँचो ते साँचोसाँच पाँच शिरताज १४ इतना सुनिकै पिरथीपतिने तुरतै लीन्ही कलम उठाय ॥ लिखिकै चिट्ठी परिमालिकको औ माहिलको दीनसुनार १५ सुनिकै चिट्ठी पिरथीपतिकै माहिल बड़ा खुशी हैजाय ॥ तुरतै धावन को बुलवायो पिरथी चिट्ठी दीन पठाय १६ लैके चिट्ठी धावन चलिभा पहुँचा नगर मोहोबे आय ॥ जहाँ कचहरी परिमालिक कै धावन तहाँ पहुँचा जाय १७ कीन दण्डवत महराजा को चिट्ठी फेरि दीन पकराय ॥ लैके चिट्ठी पृथीराज की आँकुइआँकुनजरिकैजाय १८ तुरत बुलायो निज धावन को की आल्हा को लाउ बुलाय ॥ इतना सुनिकै धावन चलिभा दशहरिपुरै पहुँचा जाय १६ तुम्हें बुलावत महराजा हैं यह आल्हा ते कह्यो सुनाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा ऊदन पहुँचे नगर मोहोबे आय २० जहाँ कचहरी परिमालिक की दोनों गये बनाफरराय ॥ हाथ जोरिकै आल्हा ऊदन ठाढ़े भये शीश को नाय २१ आल्हा बोले परिमालिक ते राजन् साँच देउ बतलाय ॥

१ आल्हखण्ड । ३५६ कौनसी विपदा तुमपर आई जो सेवकको लीन बुलाय २१ इतना सुनिकै राजा बोले साँची सुनो बनाफरराय ॥ बेंदुल हंसामनि हरनागर पपिहा और कबूतरि भाय २३ पाँचो घोड़ा पिरथी माँगे, सो अब दीन चही पहुँचाय ॥ चिट्ठी आई महराजा की धावन बैठ बनाफरराय २४ इतना सुनिकै आल्हा बोले राजन साँच देयँ बतलाय ॥ अपने घोड़ा हम देबे ना चहु चढ़िआवै पिथौराराय २५ लड़ि भिड़ि लेबे हम पिरथी ते देबे समरभूमि समुझाय ॥ जियत न पाई कोउ घोड़नको साँची सुनो चँदेलेराय २६ इतना सुनिकै राजा बोले मानो कही बनाफरराय ॥ रारि मिटावो दै घोड़न को यामें भलापरै दिखलाय २७ घोड़ा अइहैं नहिं दिल्ली को मोहबा तुरत लेउँ लुटवाय ॥ ऐसी चिट्ठी पृथीराज की सो पढ़िलेउ बनाफरराय २८ घोड़ा पैहैं जो पिरथी, ना मोहवा तुरत गाँसिहैं आय ॥ कितन्यो घोड़ा लड़ि मरिहैं ऐसे पाँच देउ पठवाय २९ अंकुश विषका तुम गाड़ो ना मानो कही बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३० काह हकीकति है पिरथी कै मोहवानगर मँझावें आय ॥ दतिया जीति उरैछा जीत्यों जीत्यो सेतुबंधलों जाय ३१ जीति पेशावर मुलतानाली बूँदी थर थर थर्राय ॥ राज्य कमायूंका लै लीन्ह्यों झंडाअटक दिह्योंगड़वाय ३२ जितनी तिरिया हैं मेवात में संध्या समय नित्त पछितायें ॥ काह हकीकति है पिरथी कै दिल्ली काल्हिलेउँ लुटवाय ३३ एक पिथौरा कै गिनती ना लाखन चढ़ें पिथौरा आय ॥