भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 347

[Header] २८ आल्हाखण्ड । ३४४

[Text] सजे बराती तहँ ठाढ़े थे आल्हा कूचदीनकरवाय १४३ चलिकै पहुँचे फिरि नरवरगढ़ ऊदन मिले तहां पर आय ॥ लैके फौजै मकरन्दा मिलि आल्हा सहितचलेहर्षाय १४४ अटक उतरिकै काबुल ह्वैकै पहुँचे मास अन्त में जाय ॥ रहो बुखारो आठ कोस जब तब टिकिरहे बनाफरराय १४५ टिकिगा लश्कर राजपूतन का क्षत्रिन छोरि घरे हथियार ॥ आल्हा ठाकुर के तम्बू माँ बैठे बड़े बड़े सरदार १४६ बोले पण्डित तब आल्हा ते तुम सुनि लेउ बनाफरराय ॥ ऐपनावारी की विरिया है रूपन बारी देउ पठाय १४७ इतना सुनिकै रूपन बोला दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ हम नहिं जैहैं बलखबुखारे अबकी आनदेउपठवाय १४८ इतना सुनिकै मलखे बोले रूपन साँच देउ बतलाय ॥ जौने घोड़ा का जी चाहै तौनै देयँ तुरत मँगवाय १४६ घोड़ करलिया रूपन् माँग्यो मलखे तुरत दीन कसवाय ॥ ऐपनावारी बारी लैके बैठा घोड़ पीठि में जाय १५० ढाल खङ्ग लै मलखाने ते रूपन कूच दीन करवाय ॥ डेढ़ पहर के फिरि अर्सा मा पहुँचाराराजद्वार पर जाय १५१ हुकुम दर्रै हुकुम दरर्रै नाहर घोड़े के असवार ॥ कहाँ ते आये औ कहँ जैहै कहँ है देश रावरे क्यार १५२ इतना सुनिकै रूपन बोला तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ नगर महोबाते आयन हम इन्दलब्याहकरनको भाय १५३ ऐपनावारी हम लै आये रूपन बारी नाम हमार ॥ खबरि जनावो महराजा को हमरो नेग देयँ अबदार १५४ इतना सुनिकै द्वारपाल कह रूपन बारी बात सुनाय ॥

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य) · पृष्ठ 347, कुल 618 में से · BharatKosha