भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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[Header] इन्दलहरण । ३४५ २६

काह नेग द्वारे को चहिये सोऊ देयँ आप बतलाय १५५ रूपन बोला द्वारपाल सों यह तुम खबरि सुनाबो जाय ॥ एक पहर भर चलै सिरोही यहही नेग देयँ पठवाय १५६ सुनिकै बातैं ये बारी की आरी द्वारपाल अधिकाय ॥ शोचि समझिकै महराजा सों रूपन कथा सुनाई जाय १५७ इतना सुनिकै अभिनन्दन ने हंसामल को लयो बुलाय ॥ पकरिकै लावो त्यहि बारी को द्वारे जौन रहा बराय १५८ इतना सुनिकै हंसामल ने अपनी लई ढाल तलवार ॥ औरो क्षत्री चलि ठाढ़े भे अपने बाँधि बाँधि हथियार १५९ द्वारे देखें जब बारी को आरी भये सिपाही ज्वान ॥ भीर देखिकै रूपन बारी लाग्योकरन घोरघमसान १६० चली सिरोही भल द्वारे पर औ बहिचली रक्त की धार ॥ रूपन बारी के मुर्चा पर अंधा धुंध चलै तलवार १६१ रूपन मारे तलवारी सों घोड़ा करै टाप की मार ॥ बड़े लड़ैया काबुल वाले मनसों गये तहाँपर हार १६२ धर्म बनाफर का जाहिर है जिनके जपै तपै का काम ॥ विजय अधर्मिन की दीखी ना रावण कीन बहुतसंग्राम १६३ कंस सुयोधन जरासंध अरु अधरम रूप मरा शिशुपाल ॥ काल कलेवा सबको कीन्ह्यो रहिगा धर्मएक सबकाल १६४ ताते धर्मी आल्हा ठाकुर रूपन खूब करै तलवार ॥ देखि वीरता यह रूपन की हंसा कहा बचनललकार १६५ सँभरिकै बैठै अब घोड़ा पर बारी भली मचाई रार ॥ जियत न जैहै दरवाजे ते हमरी देखि लेय तलवार १६६ इतना सुनिके रूपन बोला क्षत्री गानो कही हमार ॥