आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० आल्हखण्ड । ३४६ नेग आपनो हम भरिपावा राजन आय आपके द्वार १७७ दायज लेहैं आल्हा ठाकुर अब हम जान चहत सरदार ॥ इतना कहिकै रूपन बारी फाटक निकरिगयो वा पार १७८ मारु मारु कहि क्षत्री दौरे रूपन घोड़ दीन दौराय ॥ आयकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में ज्यहि में बैठ बनाफरराय १७६ खबरि सुनाई ह्याँ आल्हा को हाँपर शूर लागि पछिताय ॥ तब अभिनन्दन सब लरिकनते बोला दोऊ भुजा उठाय १८० बाजै डङ्का अहसङ्का के लश्कर सबै होय तय्यार ॥ जान न पावैं मोहबे वाले मारो ढूँढ़ि ढूँढ़ि सरदार १८१ हुकुम पायकै महाराजा को सातो पुत्र भये तय्यार ॥ झीलम बख्तर पहिरि सिपाही हाथम लई ढालतलवार १८२ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ धरिगे हौदा तिन हाथिनपर क्षत्री चढ़े समरके काज १८३ को गति बरणै तहँ घोड़न कै जिनपर चढ़े शूर शिरताज ॥ सजिगा हाथी अभिनन्दन का तापर बैठिगयो महराज १८४ सुमिरि भवानी सुत गणेशको राजा कूच दीन करवाय ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे चहचह धुरीरहीं चिल्लाय १८५ मारु मारु करि मौहरि बाजीं बाजीं हाय हाय करनाल ॥ मारू बाजा सुनि बोलत भा बेटा देशराज का लाल १८६ जनु अभिनन्दन चढ़िआवत है लक्षण जानि परै यहिकाल ॥ हँसिकै बोला मलखाने ते बेटा देशराज का लाल १८७ सजिये दादा मलखाने अब देवा होउ आप तय्यार ॥ और सिपाही जे मोहबे के तेऊ बाँधि लेयँ हथियार १८८ सुनिकै बातें बघऊदन की सतियाँ शूर भये तय्यार ॥