आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दलहरण । ३४७ ३१ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग व्यवहार १७९ बलखबुखारे का अभिनन्दन सोऊ गयो समर में आय ॥ प्रथम लड़ाई भै तोपन कै धुवना रहा सरगमें छाय १८० लागै गोला ज्यहि हाथी के मानो ब्यार सेंधिकैजाय ॥ जउने ऊँट के गोला लागै तुरतै गिरै समर अललाय १८१ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के धुनकत रुई सरिरो काड़ि जाय ॥ लागै गोला ज्यहि घोड़ाके मानों गिरह कबूनरखाय १८२ जौने रथमा गोला लागै पहिया धुरी अलग है जाय ॥ गिरैं कगारा जस नदिया में तैसे गिरैं ऊँट गजधाय १८३ सन् सन् सन् सन् गोलीछूटैं लोटैं शूर पछारारखाय ॥ छाँड़ि आसरा जिंदगानी का खेलन लागे ल्वाह अघाय १८४ भाला बलछी छूटन लागे कहुँ कहुँ कड़ाबीन की मार ॥ मारैं तेगा बर्दवानका ऊना चलै विलाइति क्यार १८५ चलै कटारी बूँदी वाली अंधाधुंध चलै तलवार ॥ मुएडन केरे मुड़चौरा भै औ रुण्डन के लगे पहार १८६ बड़ी लड़ाई अभिनन्दन की नदिया बही रक्तकी धार ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर उदयसिंह सरदार १८७ सातौ लड़िका अभिनन्दन के जामाझार करै तलवार ॥ चढ़ा चौंड़िया इकदन्तापर बकशीजौनु पिथौराक्यार १८८ हनि हनि मारै रजपूतन का चौंड़ा समरधनी मैदान ॥ कागति बरणौं मैं देवाकै ठाकुर मैनपुरी चौहान १८६ हंसा ठाकुर के मुर्च्चापर पहुँचा समरधनी मलखान ॥ घोड़ी कबूतरी टापन मारै घायल होयँ अनेकन ज्वान १६० को गति बरणे मलखाने कै बेटा बच्छराज का लाल ॥