भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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इन्दलहरण । ३४३ २७ हाल जानि के आल्हा ठाकुर मनमें सोचिसाचिअधिकाय १३१ आयसु दीन्हो मलखाने को भावै करो तौन तुम भाय ॥ इतना सुनिकै मलखे चलि भे सुनवाँ महल पहुँचे जाय १३२ सुनवाँ दीख्यो मलखाने को आदर भाव कीन चाधिकाय ॥ हाथ पकरिकै फिरि इन्दल का मलखे भाभीदीन गहाय १३३ यह गति जानैं नारायण फिरि कितनी खुशीभई अधिकाय ॥ पूँछन लागी जब ऊदन का मलखेगये कथा सब गाय १३४ अब सुखदाई दिन आवा है भौजी पूत विवाहब जाय ॥ कायल द्वैकै बड़भाई ने हमते हुकुमदीन फरमाय १३५ यही महीना मा भौंरी हैं पण्डित साइति दीन बताय ॥ करो तयारी अब ब्याहे की नरवर मिली बनाफरराय १३६ नाम बनाफर का सुनतैखन फुल्लवा तहाँ पहुँची आय ॥ जितनी गाथा बघऊदन की बाँदिनतहां दीनवतलाय १३७ बड़ी खुशहाली भै फुल्लवा के द्यावलि बार बार बलिजाय ॥ तहँते चलिकै मलखे ठाकुर पण्डिततुरतलीनबुलवाय १३८ पूँछिकै साइति मलखे ठाकुर राजन न्यवन दीन पठवाय ॥ ब्याह नगीचे न्यवतहरी सब दशहरिपुरै पहुंचेआय १३६ माँय मन्तरा कै बयरिया मै पण्डित अटा तड़ांका आय ॥ रानी आई मोहबे वाली भारी भीर भई अधिकाय १४० करि अवलम्बा जगदम्बा का अम्बा बार बार शिरनाय ॥ भई तयारी फिरि व्याहे की इन्दलचढ़ापालकी जाय १४१ बाजे डंका अहलंका के हाहाकार शब्द गा छाय ॥ कुँवाँ विवाह्यो फिरि इन्दल ने सुनवाँ पैर दीन लटकाय १४२ यहो नेग जब पूरा द्वैगा इन्दल चढ़ा पालकी आय ॥