भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 345

२६ आल्हखण्ड । ३४२ यहु सब जानतहैं अपने मन कलियुगअधिकरलपटाय ११९ खायँ पछारा मन कलियुग में जप तप पुण्य देयँ बिसराय ॥ कोऊ ज्ञानी अरु ध्यानी ना रघुवर पार लगावैं भाय १२० यह संजीवनि जबतक रहिहै रघुवर नाम चिंतवन् भाय ॥ यहि परितापी अरु पापी ते कोउकोउबचीसमरमें आय१२१ कलह करायो यहि कलियुगने ऊदन नहीं परै दिखराय ॥ इतना सुनिकै मलखे बोले दोऊ हाथजोरि शिरनाय १२२ गये बनाफर हैं नरवरगढ़ मकरँद ठाकुर गये लिवाय ॥ किह्यो शिकायत नहिं ऊदनने यहसब भाग्य करावै भाय १२३ पूर शनैश्वर माहिल मामा सोना लखत ल्वाह द्वैजाय ॥ आय हकीकी यहु मल्हना का फीकीकहै रातदिन भाय १२४ पै अरसान्यो त्यहि ऊदन ना क्षत्री रूप लहुरवा भाय ॥ तुम कछु शोचो अब दादा ना होनी मेटि कौनपै जाय १२५ यह अनहोनी शुभदाई भै इन्दल ब्याह करो अबभाय ॥ ऊदन मिलि हैं नरवरगढ़ माँ साँचो मिलनदीनबतलाय १२६ बहु शिरनाई यह गाई है दादै आप बुझायो जाय ॥ मोरि ढिठाई जड़ताई को करि हैं क्षमा बनाफरराय १२७ कसम जो खाई चित्ररेखा सँग करि वै ब्याह तुम्हारो आय ॥ आयसु पावैं जो दादाकी राजन न्यवतदेयँ पठनाय १२८ आल्हा बोले मलखाने ते पहिले हाल देउ बतलाय ॥ कौन देश को इन्दल हरिगे मिलिगे कौनरीतिसों भाय १२६ कछू हकीकति तुम गाई ना अबहीं न्यवत पठावो भाय ॥ इतना सुनिकै मलखे ठाकुर दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १३० जितनी कीरति बघऊदन की सो आल्हा को गये सुनाय ॥