भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 618 में से

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पृष्ठ 354

इन्दलहरण । ३५१ ३५ सवैया ॥ आमको खम्भगड़ो तहँ सुन्दर माड़व मालिन ठीक बनायो । कै गठि बन्धन बैठिगयो नृप स्वच्छ कुशानिज हाथ उठायो ॥ दान दयेउ कन्या अभिनन्दन वन्दन कै रघुनाथ मनायो । चन्दन अक्षत फूलनलै ललिते मनमोद गणेशचढ़ायो २२७ बड़ी खुशी सों अभिनन्दनने बेटी ब्याह दीन करवाय ॥ बिदा करायो चितरेखा को औधनदीन्ह्योखूब लुटाय २२८ भये अयाचक सब याचक गण जय जयकार रहे सब गाय ॥ बाजे डंका अहर्तंका के आल्हा कूचदीनकरवाय २२६ एक महीना के भीतर में दशहरि पुरै पहुंचे आय ॥ घरछन करिकै दरवाजे सों सुनवाँ लैगय वधूलिवाय २३० दगीं सलामी की तोपैं बहु ध्रुवना रहा रगमें छाय ॥ मनियादेवन की पूजाकरि बैठीं धाम आपने आय २३१ आल्हा बैठे फिरि महलन में ऊदन बैठे शीश नवाय ॥ माहिलठाकुर की गाथा को आल्हाठाकुर दीनसुनाय २३२ चुगुलशिरोमणि माहिलठाकुर ठाकुर रहे तहाँ सब गाय ॥ होय भलाई मम चुगुलिन में इतनाकहा ललुरवाभाय २३३ खेत छूटिगा दिन नायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ ब्याहपूर भा अब इन्दल का सुमिरौं तुम्हें शारदामाय २३४ पारलगायो महरानी तुम दानीयुगन युगन अधिकाय ॥ कोउअभिमानीजगरहिगा ना ज्यहिपरकोपकीनतुममाय २३५ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतकथाकसगाय २३६

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