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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

अथ आल्हखण्ड ॥ बलखबुखारे की लड़ाई अथवा इन्दल हरण व विवाह वर्णन ॥ सवैया ॥ बाजत झांझ मृदंग तहाँ औ सबै मुरचंगनसों स्वर गावैं । बाजत तार सितारनके यकत इनकी गति कौन बतावैं ॥ राजत बीण तहाँ तबला अवर जहँ झुंडन झुंडन आवैं । गाजत कृष्ण तहाँ ललिते अब जहाँ शिव गोपीरूप बनावैं १ सुमिरन ॥ मैया भैया और बपैया सब दिशि देखा खूब निहार ॥ बिना चरैया गैयावाला दैया कौन होय रखवार १ बूड़ै नैया भवसागर में कोउ न मिलै खिवैया हाल ॥ मैया यशुमति केर कन्हैया भैया साँच कहैं सुरपाल २ पारलगैया म्वरि नैया के गैयापाल कृष्ण महराज ॥ और खेवैया को नैया का जाकीशरण लेयँ हम आज ३

२ आल्हखण्ड । ३१८ तुम्ही गुसैयाँ दीनबन्धु हौ ओ ब्रह्मण्यदेव ब्रजराज ॥ लाज रखैया बाम्हन तनकी साँचे एक कृष्ण महराज ४ शरणहि ताकत विप्र सुदामा पायो सकल सम्पदा राज ॥ छूटि सुमिरनी गई कृष्ण की इन्दल ब्याह बखानों आज ५ अथ कथाप्रसंग ॥ परब दशहरा की जग जाहिर बुड़की हेतु जाय संसार ॥ भारी मेला श्रीगंगा को हिंडनक्यार पूर त्यवहार १ बहुतक छैला अलबेला तहँ घोड़न उपर भये असवार ॥ करी तयारी श्रीगंगा की चक्कस लिये बुलबुलनक्यार २ जेठदुपहरी भारी ह्वैकै ब्यारी करैं वृक्षतर आय ॥ देखि गँवाँरी तहँ नारी नर बोला तुरत बनाफरराय ३ कहाँ तयारी नर नारी करि ब्यारी किह्यो यहाँपर आय ॥ देखि बनाफर को नर नारी बोले साँच देयँ बतलाय ४ कीन तयारी हम विठूर की भारी पर्ब दशहरा केरि ॥ चकित ह्वैकै ऊदन दीख्य चारिउ दिशातर्फ फिरिहेरि ५ भारी मेला अलबेला तहँ रेला चला जाय सबराह ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया आयो जहाँ बैठ नरनाह ६ हाथ जोरिकै तहँ आल्हा के ऊदन बोले शीश नवाय ॥ करें तयारी हम गंगा की दादा हुकुमदेउ फरमाय ७ इतना सुनिकै आल्हा बोले साँची सुनो लहुरवा भाय ॥ देश देशके राजा अइहैं होई भीर भार अधिकाय ८ रारि मचैहौ तुम मेला में हमपर ऐरी आपदा आय ॥ ताते जावो नहिं मेला को मानो कही लहुरवा भाय ९ इतना सुनिकै माहिल बोले तुम सुनिलेउ बनाफरराय ॥

इन्दलहरण । २१६ ३. लड़िका ऊदन अब नाहीं हैं जो तहँ रारि मचैहैं जाय १० बातें सुनिकै ये माहिल की आल्हा बोले बचन बनाय ॥ तुम चलिजावो माहिल मामा तौ हम ऊदन देयँ पठाय ११ इतना सुनिकै माहिल बोले हम तो करब जाय असनान ॥ करो तयारी ऊदनठाकुर आल्हाबचन मानिपरमान १२ आल्हा बोले फिरि देबाते तुमहूं जाउ साथ यहिकाल ॥ पै तुम बच्यो बघऊदन को जहँपर होय रारिको हाल १३ इतना कहिकै आल्हाठाकुर महलन फेरिगयो अलसाय ॥ करै तयारी ऊदन लागे बाँके घोड़ लीन कसवाय १४ कच्छी मच्छी हरियल मुश्की सुर्खा सुरंगा रङ्ग बिरंग ॥ तुर्का गर्रा पँचकल्यानी सब्ज़ा स्याह एकही रंग १५ चुने सिपाही लिये संग में जिनते हारिगई तलवार ॥ संजा रिसाला घोड़नवाला लग भग जानो एक हजार १६ सजे सिपाही पंद्रासौ लग एकते एक लड़ैया ज्वान ॥ बाजे डंका अहर्तंका के घूमन लागे लाल निशान १७ इन्दल आये त्यहि समया में ऊदन पास पहुंचे आय ॥ हमहूं चलिबे श्री गंगा को चाचा लेवो साथ लिवाय १८ इतना सुनिकै ऊदन बोले बेटा मानो कही हमार ॥ दादा भौजी जो रोकैं ना हमरे साथ होउ तय्यार १६ इन्दल चलिभे तब महलन को माता पास पहुंचे जाय ॥ हाथ जोरिकै इन्दल बोले मातैं बार बार शिरनाय २० हुकुम कराय देउ दडुवा सों आवों चाचा साथ नहाय ॥ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटै बारबार समुझाय २१ पर्व दशहरा की टरिजावै फिरि तुम आयो गङ्ग नहाय ॥

४ आल्हखण्ड । ५२० भारी मेला है बिठूर का जो तुम जेहो पूत हिराय २२ हौ इकलौता म्वरी कोखि में ताते मोर प्राण घबड़ाय ॥ इतना सुनिकै इन्दल बोले माता साँच देयँ बतलाय २३ जान न पावैं जो गंगा को तौ मरिजयँ जहरको खाय ॥ हुकुम देवावै की दइवाते की अब घेरै बैठि पछिताय २४ सुनिकै बातें ये इन्दल की सुनवाँ गई सनाका खाय ॥ गई तड़ाका ढिग आल्हा के इन्दल हाल बतावा जाय २५ बातें सुनिकै सब सुनवाँ की आल्हा बोले वचन सुनाय ॥ लिखी विधाता की मेटै को अब तुम देवो पूत पठाय २६ जहर खायकै जो मरिजाई तौहू शोच होय अधिकाय ॥ पार लगैहैं श्रीगंगाजी यहमत ठीक लीन ठहराय २७ इतना सुनिकै सुनवाँ चलिभै इन्दल पास पहुँची आय ॥ औ बुलवायो बघऊदन को सबियाँ हाल कह्यो समुझाय २८ इन्दल बिगरे हैं महलन में गंगा इन्हें देउ अन्हवाय ॥ पै हम सौंपति त्वहिं इन्दलको देवर बार बार शिरनाय २९ किह्यो बखेड़ा नहिं मेला मैं रेला होय तहाँ अधिकाय ॥ वहाँ न जायो इन्दल लैकेँ मान्यो कही वनाफरराय ३० इतना सुनिकै ऊदन इन्दल दोऊ चलिभे शीश नवाय ॥ जायकै पहुँचे फिरि फौजन में लश्कर कूच दीन करवाय ३१ बायें घोड़ा है देवा का दहिने बेंदुल का असवार ॥ बीच म जावै इन्दल ठाकुर कम्मर परी एक तलवार ३२ पांच दिनौना मारग लागे छठयें दिवस पहुंचे जाय ॥ भारी मेला भा बिठूर मौ आवा तहां कनौजीराय ३३ बाजै डंका तहँ ऊदन का लाखनि धावन लीन बुलाय ॥

[Page Header] इन्दलहरण । ३२१ ५

कहि समुझावा त्यहि धावनको डंका बन्द देउ करवाय ३४ हुकुम कनौजी का नाहीं है डंका कोऊ बजावै आय ॥ इतना सुनिकै धावन चलिकै डंका बजत दीन रुकवाय ३५ कहा न मान्यो जब बघऊदन देवा ठाकुर उठा रिसाय ॥ तुम्हें मुनासिव यह चहिये ना सबसों बैर बढ़ावो भाय ३६ चलिकै मिलिये अब लाखनिसों उनसों हुकुम लेउ करवाय ॥ हीनी तुम्हरी कछु हैहै ना मानो कही बनाफरराय ३७ सुनिकै बातें ये देवा की ऊदन मानिगयो त्यहिकाल ॥ पाँच दुमाला दुइ हीरा लै चलिभा देशराजका लाल ३८ नचै पतुरिया त्यहि तम्बूमें ज्यहिमें रहें कनौजीराय ॥ ऊदन ठाकुर तहँ पहुँचतभा राखी भेंट अगाड़ी जाय ३६ हाथ पकरिकै लाखनिराना अपने पास लीन बैठाय ॥ कही हकीकति बघऊदन ने लाखनिहुकुमदीनफरमाय ४० बाजै डंका इक ऊदन का औरन बन्द देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे तम्बुन फेरि पहुंचे आय ४१ सुनो हकीकति अभिनन्दनकी हंसा ताको राजकुमार ॥ त्यहिकी बेटी चित्तरेखा मेला हेतु भई तय्यार ४२ नटिनी सँगमें त्यहि बेटी के जादू क्यार जिन्हें व्यपार ॥ बलखबुखारे को राजा जो त्यहिअभिनन्दननामउदार ४३ त्यहि का बेटा हंसाठाकुर चलिभा बहिनी साथलिवाय ॥ सवालाख लश्कर को लैके ब्रह्मावर्त्त पहुँचा आय ४४ तम्बू गड़िगे त्यहि रेती माँ भारी ध्वजारही फहराय ॥ संग सहेली त्यहि बहिनी की बोली बेटी बचन सुनाय ४५ चलिये हनवन जल्दी करिये अब दिनगयो यामभरआय ॥ २१

६ आल्हखण्ड । ३२२ सुनिकै बातें ये सखियन की बेटी चली तड़ाकाधाय ४६ भा भटभेरा तहँ इन्दल का देखत रूपगई ललचाय ॥ मन अरु नैना यकमिल ह्वैंगे सखियनदेखिगई सकुचाय ४७ फिरिफिरिचितवैदिशिइन्दलके हनवन करै गंगको वारि ॥ बिधिउ न जानै गति नारी की दशरथ मरे नारिसों हारि ४८ सोई नारी फिरि फिरि चितवै कैसी करै आजु त्रिपुरारि ॥ इन्दल निकले जलके बाहर सोऊनिकलिपरीसुकुमारि ४६ दिह्यो दक्षिणा द्विज देवन को दोऊ मोहबे के सरदार ॥ तहँते चलिभे फिरि तम्बू को देखत मेला केरि बहार ५० चचा भतीजे दोऊ ठाकुर तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ बेटी प्यारी अभिनन्दन की सोऊ चली तहाँ ते धाय ५१ आयकै पहुँची सो तम्बुन में औ सखियनसों लगीबतान ॥ ऐस रँगीला और सजीला मेला नहीं दूसरो ज्यान ५२ करिकै जादू याको हरिये करिये सखी सबई अबसाज ॥ मन नहिं हटको हमरो मानै ना अब करै तुम्हारी लाज ५३ सवैया ॥ होत अकाज न लाजरहै यह राज समाज लखे दुख छावै । जो कुलकानि न आनिकरौं कुलटा उलटा म्वहिंलोगबतावै॥ भावै यहै हमको सजनी रजनी बिन पीतम आनि मिलावै । पावै जबै ज्यहि नेहलग्गो ललिते मनमें तबहीं सुखआवै ५४ सुनिकै बातें चितरेखा की सखियनकहा बहुतसमुझाय ॥ धीरज राखो अपने मन माँ पीतम मिली तुम्हारो आय ५५ इतना कहिकै संग सहेली हेली तुरंत भई तय्यार ॥

इन्दलहरण । ३२३ ७ लय अलबेली संग सहेली आई देखन गङ्ग बहार ५६ ऊदन इन्दल देवा ठाकुर तीनों गये तहाँपर आय ॥ नाव मँगायो मल्लाहिन ते बैठयोसुमिरि शारदामाय ५७ बैठी नावन में चितरेखा बेखा नटिनिन केरि बनाय ॥ काह बतावैं हम लेखा त्यहि देखा रूप नहीं है भाय ५८ मै अवरेखा चितरेखा को लेखा कामदेव की नारि ॥ उठैं तरङ्गैं तहँ गंगा की जंगा करें वारिसों बारि ५६ लैकेँ पुरिया भैरोंवाली ऊदन उपर दीन सो डारि ॥ बीर महम्मद की पुरिया को देवा उपर चलावा नारि ६० नजर बन्दभै जब दूनों के तुरतै इन्दल लीन उतारि ॥ सुवा बनायो सो इन्दल को पिंजरा लीन तड़ाका डारि ६१ उतरिकै नावनसों जल्दी सो तम्बुन गई तड़ाका आय ॥ उतरी जादू जब ऊदन की तबनहिं इन्दल परे दिखाय ६२ जब नहिं दीख्यो तहँ इन्दलको ऊदन तुरत गये घबड़ाय ॥ जार मँगाये तहँ लोहे के सो गंगा माँ दये डराय ६३ मच्छ कच्छ बहुतक फँसिआये पै नहिं इन्दल परे दिखाय ॥ तिल तिल ढूंढ़ा भुइँ मेला में ऊदन देवा संग लिवाय ६४ पता न पायो जब इन्दल को तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ कही हकीकति तहँ माहिल ते नाहर उदयसिंह तहँ गाय ६५ सुनिकै बातें उदयसिंह की माहिल बोले वचन बनाय ॥ करो अँदेशा कछु जियरेना आल्है द्याव वहाँ समुझाय ६६ जादू कै कै कोउ इन्दल का साँचो लियो बनाफरराय ॥ घरने द्वैकै फिरि तुम ढूंढ़यो ह्वाँते कूच देउ करवाय ६७ इतना सुनिकै उदयसिंह ने डंका कूच दीन बजवाय ॥

.८ आल्हखण्ड । ३२४ पांच रोज को धावा करिकै दशहरिपुरै पहुँचे आय ६८ ऊदन रहिगे एक कोस में माहिल गये अगाड़ी धाय ॥ बड़ी खातिरी आल्हा करिकै अपने पास लीन बैठाय ६६ आल्हा बोले तहँ माहिल ते मामा हाल देउ बतलाय ॥ ऊदन देवा इन्दल बेटा तीनों रहे कहांपर भाय ७० दृग नहिं देखन इन तीनों को ताते चित्त बहुत घबड़ाय ॥ इतना सुनि कै माहिल बोले साँची सुनो बनाफरराय ७१ ख्यलै नेवारा गे नदिया में ऊदन इन्दल साथ लिवाय ॥ ऊदन देवा इकमिल हैकै औ इन्दलको दीन बहाय ७२ टरिजा टरिजा माहिल मामा धरती खोदि लेउँ गड़वाय ॥ ऐसी बातें फिरि बोले ना ठाकुर साँच दीन बतलाय ७३ है मर्दाना ऊदन बाना मामा काह गये बौराय ॥ किहे दिल्लगी की साँची है हमरोचित्त बहुत घबड़ाय ७४ इतना सुनिकै माहिल बोले साँची कहा बनाफरराय ॥ पोथा पढ़िकै धरिदीन्ह्यो सब अकिल तुम्हरी गई हिराय ७५ कौनिअदावति नलपुष्कलकी भारत पढ़े बनाफरराय ॥ कैसि दुर्दशा नलकी कीन्ह्यो पुष्कल नलको जुआँ खिलाय ७६ बिना वस्त्र के महराजा भे साजा सबै साज कर्तार ॥ तिनकी प्यारी दमयन्ती जो सोऊ छूटिगई त्यहि बार ७७ त्यहि दमयन्ती के ब्याहे में आये पवन अंग्नि सुरराज ॥ उद्यम कीन्ह्यो नल ब्याहे को चाहे दूत भये नलराज ७८ ब्याह न कीन्ह्यो दमयन्ती ने विन्ती बहुत कीन नलराज ॥ गन्ती कीन्ह्यो दमयन्ती ना लज्जितभये तहाँ सुरराज ७६ बारह बरसै वनवाजी मा राजी भये इन्द्र महराज ॥

इन्दलहरण । ३२५ ९ आल्हा मैने साँची जानो ऊदनकीन्ह साँचयहकाज ८० इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर गरुई हाँक दीन ललकार ॥ टरिजा टरिजा उरई वाले तोरे चुगुलिन का बयपार ८१ साँची साँची आल्हा ठाकुर तुम्हरे। इन्दल गयो हिराय ॥ कहौं असाँचा आल्हा ठाकुर साँचा सहों पुत्रका घाय ८२ करों दिल्लगी अस कबहुँ ना साँची सुनो बनाफरराय ॥ ऊदन बोले ह्याँ देवा ते हमरो चित्त बहुत घबड़ाय ८३ दशहरिपुरवा माहिल पहुँचे कैसी खबरि सुनावै जाय ॥ पुत्र शोक सम दुख दूसर ना जानतगाथ भली तुम भाय ८४ पुत्र शोक सों दशरथ मरिगे कीरति रही जगत में आज ॥ कीरतिसागर भट नागर जे आगर सबैग़ुणन रघुराज ८५ तेई खिवैया अब नैया के भैया काह करें धौं आज ॥ यहु दिन आये लग ध्यावै जो कलयुगसत्रुझकशिरताज ८६ सोई कलयुग के ऊदन हम साँचे कर्म्म कीन रघुराज ॥ दया न छोड़ा द्विज गाइन ते पीठि न दीन प्राणकेकाज ८७ नहिं अभिमानी बातें ठानी बालक विप्र साथ महराज ॥ परम पियारे द्विज तुम का हौ निर्मलएकक्षत्रराज्यहिभ्राज ८८ ऐसी स्तुति ऊदन कीन्ह्यो देवा चलत भयो ततकाल ॥ आयकै पहुँच्यो त्यहि मंदिर में ज्यहिमें देशराजको लाल ८६ ठाढ़े दीख्यो जब देवा को चलिभा उरई का सरदार ॥ भल भल रोंका आल्हा ठाकुर करिकै बहुतभांति सतकार ६० पै नहिं मान्यो जब माहिल ने आयसु दियो बनाफरराय ॥ देखिकै सूरति फिरि देवा की आल्हागये बहुत घबड़ाय ६१ कैसी गुजरी है तीरथ में देवा साँच देय बतलाय ॥

१० आल्हखण्ड । ३२६ परम पियारो पुत्र हमारो इन्दल राख्यो कहाँ छिपाय ६२ पूत न होवैं बहु कलयुग में यामें भूतन को अधिकार ॥ सेव करावैं बालापन में ज्वाने भये बसैं ससुराल ६३ पूत सपूतों इन्दल प्यारो कहँ पर मैनपुरी चौहान ॥ इतना सुनिकै देवा बोला साँची कहौं शपथभगवान ६४ बंश पिथौरा के नजदीकी आहिन सत्य बनाफरराय ॥ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे भाई सरिस चारिहू भाय ६५ कमती जानैं जो काहू को तो म्वहिं सजादेयँ भगवान ॥ कोऊ लैगा छलि जादू सों इन्दल तुम्हरौ पूत परान ६६ ऊदन बिगड़े तहँ मेला में जैबे पता लगावन काज ॥ तिल तिल पृथ्वी मेला ढूँढ़ा भारी भीर तहाँ महराज ६७ पता न लाग्यो जब इन्दल को माहिल कहा तवै समुझाय ॥ आल्हा ठाकुर को समुझावव ऊदन कूच देउ करवाय ६८ कहा मानिकै तब माहिल का डाँड़े परा लहुरवा भाय ॥ जौन देश में इन्दल बैठैं ऊदन लैहैं खोज लगाय ६६ बातैं सुनिकै ये देवा की आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥ जो कछु भाषा माहिल ठाकुर साँची जना बनाफरराय १०० पुत्र शोच सों उर धड़कत भो जियेर धीर धरा ना जाय ॥ आल्हा बोले तब देवा ते तुमऊदनको लवो बुलाय १०१ उनहीं पाँयन देवा चलिभा ऊदन खबरि दीन बतलाय ॥ बड़े शोच में बड़ भैया हैं तुमकोतुरतबुलानिभाय १०२ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे सम्मुख गये तड़ाका आय ॥ आवत जान्यो जब ऊदन को आल्हाशीशलीननिहुराय १०३ औ दिशि दीख्यो ना ऊदनके मानों शत्रु ठाढ़ भो आय ॥

इन्दलहरण । ३२७ ११ हाथ जोरिके ऊदन बोले चरणन वार बार शिरनाय १०४ मोहलति पावों छा महिना कै इन्दल खोजिदिखाओं आय ॥ इतना सुनिकै आल्हा जरिगे अपनो कोड़ा लीन उठाय १०५ पीटन लाग्यो जब ऊदन को सुनवाँ सुनत गेई तहँ आय ॥ कहि समुझायो सो आल्हाको आल्हा तुरत दीन डरियाय १०६ टरिजा टरिजा री सम्मुख ते नहिं शिरकाटि देउँ भुइँ डारि ॥ ऊदन मारा है इन्दल को साँची खबरि मिली म्वहिं नारि १०७ सुनवाँ बोली फिरि आल्हाते साँची सुनो बनाफरराय ॥ हम तुम जी हैं जो दुनिया में हैहैं पुत्र नाथ अधिकाय १०८ मिली सहोदर फिरि भाई ना आई कौन साँकरे काज ॥ सुन्दरगढ़ को चाचा हमरो तुमको कैद कीन महराज १०६ बनि सौदागर उदयसिंह ने तुम्हरी कैद दीन छुड़वाय ॥ बराबरस के ऊदन ठाकुर माड़ोली न वापका दायँ ११० लड़ि गजराजा सों ऊदन ने मलखे ब्याह दीन करवाय ॥ नरपति राजासों लड़िकै फिरि फुलवालये लहुरवा भाय १११ हथी पछारा इन दिल्ली में द्वारे पृथीराज के जाय ॥ ऐसे नामी इन ऊदन का मारब नहीं मुनासिब आय ११२ इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर जूरा पकड़ि तड़ाका लीन ॥ खैंचि तमाचा शिर माँ मारा सुनवाँ गमनमहल को कीन ११३ मारन लाग्यो फिरि ऊदन को द्यावलि सुनत पहुँची आय ॥ औ ललकारा फिरि आल्हाको मारो नहीं बनाफरराय ११४ इतना सुनिकै आल्हा बोले माता बैठु धाम में जाय ॥ जैसे ऊदन तुम को प्यारे तैसे पूत हमारो आय ११५ हम समुझावा भल ऊदन को तुम ना जाउ लहुरवा भाय ॥

१२ \qquad आल्हाखण्ड । ३२८ पूत हमारे के मारन को \qquad ऊदन मेला गये लिवाय ११६ बातें सुनिकै ये आल्हा की \qquad द्यावलि ठाढ़ि रही शिरनाय ॥ ऊदन ठाकुर को आल्हा ने \qquad कोड़न चर्सा दीनउड़ाय ११७ औ ललकारा फिरि ऊदन को \qquad आल्हा दाँतन ओठ चबाय ॥ धिक धिक तेरी रजपूती का \qquad इन्दल बिना पहुँचे आय ११८ दशहरिपुरवा अब आये ना \qquad नहिंहानिदरौं खङ्ग के घाय ॥ जहँ मनभावै तहँ चलिजावै \qquad साँची शपथ शारदामाय ११९ सुनिकै बातें ये आल्हा की \qquad ऊदन चला बहुत घबड़ाय ॥ सुनवाँ फुलवा द्यावलि तीनों \qquad पृथ्वी गिरीं पछारा खाय १२० देवा ऊदन दोऊ ठाकुर \qquad सिरसागढ़ै पहुँचे जाय ॥ खबरि पायकै मलखाने ने \qquad फाटकबन्दलीन करवाय १२१ यह गति देख्यो उदयसिंहने \qquad ठाढ़ो लाग तहाँ पछिताय ॥ कोऊ साथी नहिं विपदा में \qquad यह देवाते कह्यो सुनाय १२२ \qquad\qquad सवैया ॥ जाकि सुता हरिके गृह शोभित चन्द्रललाट महेश प्रवीनो । इन्द्र गयन्द दयो हय रबिको देवन धेनु द्रुमादिक दीनो ॥ शिरी मुनिरायजू कोपकियो तब गण्डकधारि सबै जलपीनो । एते बड़ेको विपत्तिपरी तब सिंधुकि काहु सहाय न कीनो १२३ इतना सुनिकै देवा बोला \qquad साँची सुनो लहुरवा भाय ॥ साथ तुम्हारो हम छाँड़व ना \qquad चहुतनधजीधजीउड़िजाय १२४ पै हम बांचे बहु पुराण हैं \qquad देखी कथा अनेकन भाय ॥ विपतिमें साथी कोउ विरलाहै \qquad साँची सुनो बनाफरराय १२५

[Page Header] इन्दलहरण । ३२६ १३

सवैया ॥ रागवही ज्यहि रामबसै अरुध्यान वही जो धनी के घेरेका । प्रीति वही जो सदा निबहै अरु दाग वही कटु बचनकहेका ॥ सुखसम्पत्ति अनेक भरी पर आवै नहीं कोउ काम परेका । काहेकोआदम शोचतहै कोउ मित्रनहीं है विपत्ति परेका १२६ ठाकुर वही जो दुख सुख बूझै सेवक वो मनलाग रहेका । भाई वही जो भारहि खैंचत पुत्र वही परिवार बढ़ेका ॥ नारी वही जो जरै पियके सँग शूर वही सनमुखखलड़ेका । सम्पत्तिमेंतो अनेकमिलैं पर मित्रवही जो विपत्ति परेका १२७

इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कही समय की बात ॥ अब मन भाई यह हमरे है नरवर चलैं आजहीतात १२८ यह मन भाय गई देवाके दोऊ भये बेगि तय्यार ॥ सात रोजकी मैजलि करिकै नरवर पहुँचिगये सरदार १२६ यह सुधि पहुँची जब मोहबे में आल्हा तजा लहुरवाभाय ॥ बारहु रानिन सों परिमालिक महलन गिरे मूर्च्छाखाय १३० तुरत पालकी को मँगवायो दशहरिपुरै पहुँचे जाय ॥ औधिरकात्यो भल आल्हा को रहिगा चुप बनाफरराय १३१ कायल हैगे आल्हाठाकुर राजा लौटि परा पछिताय ॥ ऊदन बैठे ह्याँ कुँवना पर हिरिया गई तहाँ परआय १३२ देखिकै सूरति बघऊदन कै हिरिया गई तुरत पहिंचान ॥ हँसिकै हिरिया बोलन लागी साँचीसुनोबनाफरज्वान १३३ कौनि मुसीबत तुमपर परिगै जो तजि दियो ढालतलवार ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले मालिनिठीककहैयहिवार १३४

१४ आल्हखण्ड । ३३० परी मुसीबत हमरे ऊपर पृथ्वी मोहबा लीन लुटाय ॥ छोड़ बेंदुला फुलवा सुनवाँ लीन्ह्यो जीति पिथौराराय १३५ करब नौकरी हम मकरँद कै महलन खबरि जनावै जाय ॥ इतना सुनिकै हिरियामालिनि महलन अटी तुरतही आय १३६ जहँ पर माता मकरन्दाकी ऊदन कथा गई तहँ गाय ॥ आवन सुनिकै बघऊदन का माता मकरँद लीन बुलाय १३७ जो कछु गाथा मालिनि भाषी माता मकरँद गई सुनाय ॥ इतना सुनिकै मकरँद चलिभा कुँवना ऊपर पहुँचा आय १३८ कुशल प्रश्न करि सब आपस में मकरँद बोला अतिघबड़ाय ॥ हाल बताओ ऊदनठाकुर हमरे धीर धरा ना जाय १३६ हिरियामालिनि की बातें सुनि माता बैठि महलं पछिताय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले मालिनि बात दिल्लगी भाय १४० सुनिकै बातें बघऊदन की मकरँद घरका चला लिवाय ॥ ऊदन पहुँचे रनिवासे में देवा टिका द्वार पर आय १४१ हाल बतायो सब महलन में जैसे इन्दल गये हिराय ॥ मारा पीटा जस आल्हा ने सोऊ कथा गये सबगाय १४२ बनी रसोई फिरि महलन में संध्याकाल पहुँचा आय ॥ मकरँद ऊदन भोजन करिकै सोये विकट नींदको पाय १४३ चले दिवाकर घर अपने को पक्षिन लियो बसेरा धाय ॥ लिहे अञ्जली दोउ हाथन में सुरजन अर्ध देयँ द्विजराय १४४ खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय १४५ परे आलसी निजनिज शय्या घों घों करठ रहे घर्राय ॥ गुरू पिता दोऊ पद जिनके तिनके चरणन शीशनवाय १४६

इन्दलहरण । ३३१ १५ करौं तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकन्त ॥ शम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १४७ इति श्रीलखनऊनिवार्सि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामदेशान्तर्गतपँड़रीकलां निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद कृतऊदननरवरगमनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ सवैया ॥ कौनफली सबकाल बली यहि पुण्यथलीमनमाँझ बिचारा । निंदिकै काहि बखानकरौं क्यहि कौनसों बैरकरौं यहिब्वारा ॥ याहि लियों ठहराय मनै प्रभु एकसों एक हैं देव उदारा । बेद पुराण बतावत हैं ललिते सब ते बढ़िकै ॐकारा १ सुमिरन ॥ इकलो अक्षर ॐकार को अब हम शिरसों करें प्रणाम ॥ ब्रह्मा विष्णू औ शिवशंकर दुर्गा केर ताहि में धाम १ एक मात्रा में शिवशंकर दुर्गा अर्द्ध करें विश्राम ॥ एक मात्रा में ब्रह्माजी एक म रहें हमारे राम २ इकलो अक्षर यहु जो ध्यावै पूरण होयँ तासु के काम ॥ यहिते बढ़िकै हिन्दूमत में दूसर नहीं बेद में नाम ३ अज अविनाशी घट घट वासी पूरण ब्रह्म चराचर राम ॥ बेद व्याकरण दोउ साखी हैं खण्डनकरै कौन यह नाम ४ नाम न रहै जब दुनियाँ मा तब सब होइहैं पशू समान ॥ कीरति गावों बघऊदन कै सुनिये खूब ध्यान धरिज्ञान ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदयदिवाकर भे पूरब में किरणनकीन जगत उजियारा। सोयकै जागे बघऊदन तब प्रातःकृत्य कीन सरदार १

१६ आल्हदण्ड । ३३२ ऊदन देवा मकरँद ठाकुर तीनों एक जगा भे आय ॥ ऊदन बोले तब देवा ते दादा शकुन देउ बतलाय २ भाई भौजी माता बेटी फुलवा ऐसि छूटिगै नारि ॥ पता लगाये बिन घर जावैं दादा डरै जानसों मारि ३ माता तलफति घरमा होई भौजी होई हाल बिहाल ॥ मल्हना रानी रोवति होई होइहैं दुखी रजापरिमाल ४ हाल बतावों का फुलवा के मुर्दासरिस होयगी बाल ॥ जेठ दशहरा दुशमन द्वैगा कहिये काह करैं यहिकाल ५ इकलो बेटा म्वरे भैया के सबविधि रूपशील गुणवान ॥ क्षमा न करिहैं सो बेटा बिन यह हम ठीक कीन अनुमान ६ इतना सुनिकै देवा बोला भैया उदयसिंह सरदार ॥ प्रश्न हमारो यह बोलत है योगी बनो फेरि यहिवार ७ यह मनभाई उदयसिंह के मकरँद साथ भयो तय्यार ॥ तिलकलगायो फिरिकेशरिका गेरुहा वस्त्र पहिरि सरदार ८ गुदरी डारी फिरि कांधेमाँ त्यहिमाँपरी ढाल तलवार ॥ डमरू लीन्ह्यो मकरन्दा ने बँसुरी उदयसिंह सरदार ६ खँझड़ी लीन्ह्यो देवाठाकुर मकरँद बोलिउठा त्यहिबार ॥ महल हमारे पहिले चलिये पाछे अनत चलेंगे यार १० सम्मत करिकै तीनों योगी पहुँचे जाय राजदरवार ॥ बैठ सिंहासन नरपति राजा देवा कीन्ह्यो राम जुहार ११ पै पहिंचाना जब नरपति ना मकरँद हाथ जोरि शिरनाय॥ जितनी गाथा बघऊदन की सो राजा को दीन बताय १२ हाल जानिकै महाराजा ने तुरतै हुकुम दीन फर्माय ॥ तहँते चलिभे मकरँद ऊदन माता पास पहुँचे आय १३

इन्दलहरण । ३३३ १७ मर्म जानिकै महतारी ने आशिर्वाद दीन हरषाय ॥ मकरँदचलिभा निजमहलनको पहुँचा नारिपास सो जाय १४ कही हकीकति सब रानी सों कुसुमा बोली शीश नवाय ॥ पहिले जैयो तुम झुन्नागढ़ तहँपर पता लगैयो जाय १५ घर घर जादू है झुन्नागढ़ कन्ता सत्य कहौं समुझाय ॥ तुमहूं जावो ऊदन सँग में हमरो चित्त बहुतघबड़ाय १६ इतना कहिकै कुसुमारानी पुरिया चारि दीन पकराय ॥ रखिहौ मुखमाँ यह पुरिया जब जादूसकी निकट नहिंआय १७ लैकै पुरिया मकरन्दा फिरि तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ देवा ऊदन जहाँ ठाढ़े थे मकरँद तहाँ पहुँचा आय १८ सम्मत करिकै तीनों योगी झुन्नागढ़ै चले फिरिधाय ॥ सातरोजकी मैजलि करिकै झुन्नागढ़ै पहुँचे आय १६ बाजा डमरू मकरन्दा का खँझड़ी मैनपुरी चौहान ॥ बाजी बँसुरी तहँ ऊदन की गावनलाग राग कल्यान २० तान कान में ज्यहिके जावे त्यहिके जाय प्रान पर आन ॥ मोहित हैगे नरनारी सब लागे हृदय तान के बान २१ भा खलभल्ला औ हल्लाअति लल्ला छांड़ि चलीं तब बाल ॥ होश बहुल्ला ना छल्ला का ✪अल्लाध्यानकरैत्यहिकाल२२ भये दुपल्ला उरपल्ला तब कङ्कन कल्ला दीन भिड़ाय ॥ प्राणन तल्ला तज्यो इकल्ला लल्ला जौनु बनाफरराय २३ बड़ी भीर भै गलियारे में नाचै देशराज का लाल ॥ बाजै डमरू जस मकरँद कै देवा देय तैसही ताल २४ रूप देखिकै तिन योगिन का जादू करें अनेकन नारि ॥ ✪ ( अल्ला ) देवी का नाम है ॥

१८ आल्हखण्ड । ३३४ कुसुमारानी की पुरिया सों जादू गईं तहां सब हारि २५ रूप उजागर सब गुण आगर नागर देशराज का लाल ॥ विषय उमण्डी बलवण्डी जी रण्डी कुलै विडम्बी बाल २६ ती सब देखें बघऊदन को नैनन बैनन सैन चलाय ॥ धर्म न छाँड़ै यहु क्षत्री का ज्यहिका कहैं उदयसिंहराय २७ दीख कुदृष्टी ज्यहि ऊदन का त्यहिका डाटिदीन ततकाल ॥ नैनन सैनन अरु बैनन में डिगैन सिद्धपुरुष यिहु काल २८ हम नहिं भोगी नर योगी हैं रोगी विषय भरी तू बाल ॥ माना भगिनी अरु कन्यासम देखैं तीनिभाव सबकाल २६ तपै बिवण्डी पररण्डी है झण्डी नरक केरि अधिकाय ॥ यह हम जानतहैं नीकी विधि तुमते साँच देयँ बतलाय ३० बातें सुनिकै ई योगी की नारिन मूड़ लीने औंधाय ॥ बोलि न आवा क्यहु नारी ते घर घर चलन लगीं शर्माय ३१ खबरि पायकै कान्तामल ने योगिन द्वार लीन बुलवाय ॥ योगी आये जब द्वारे पर आसन तुरतदीन बिछवाय ३२ लैकै गडुवा दौरति आवा तुरतै पाँय पखारोसि आय ॥ पैर धोयकै तिन योगिन का लै जलधाम छिनाकाजाय ३३ पदै मनुस्मृति भलकान्तामल जानै अतिथिभाव अधिकाय ॥ पै पहिंचानत त्यहि योगीथे मकरँद बार बार सुसुकाय ३४ यह गति दीख्यो मकरन्दाकै बोल्यो तुरत बनाफरराय ॥ तुम पहिंचान्यो नहिंमकरँदको तुमको देखि देखिमुसुकायँ ३५ पाय इशारा यहु ऊदन का मुख तन दीख खूब धरिध्यान ॥ देवा ऊदन मकरन्दा का निश्चय फेरिलीन पहिंचान ३६ किह्यो खातिरी तब पहुनन कै लै रनिवास पहुँचा जाय ॥

इन्दलहरण । ३३५ १६ ऊदन मकरँद को रानी लखि खातिरफेरिकीनअधिकाय ३७ रानी पूछा फिरि मकरँद ते योगी बन्यो पूत कस आय ॥ इतना सुनिकै मकरँद ठाकुर इन्दलहरण गयोसबगाय ३८ सुनिकै बातें सब मकरँद की रानी बार बार पछिताय ॥ लिखी विधाता की मेटै को औ दैवागतिकही न जाय ३९ पूत सपूतौ इन्दल खोयो मातै पितै दुःख अधिकाय ॥ विधिना डारे अस बिपदा ना कोउ न सहै पुत्रका घाय ४० भरे घुचघुचा सुनि ऊदन के नैनन नीर परे दिखराय ॥ उठिकै ऊदन रनिवासे ते देबी धाम पहुँचे आय ४१ बैठिकै मठियामा बघऊदन सुमिरयो तहाँ शारदामाय ॥ ध्यान लगायो जगदम्बा का सब अवलम्बा दीनभुलाय ४२ शोच भूलिगा तब ऊदन का मनमाँ खुशीभई अधिकाय ॥ तहँते चलिकै बघऊदन फिरि महलन अतातुरतही आय ४३ बनी रसोई रनिवासे में भोजन कीन सबन सुखपाय ॥ राति अँधरिया फिरि आवत भै सोये बिकट नींदको पाय ४४ बलखबुखारे निशि स्वप्ना माँ पहुँचा देशराजका लाल ॥ सोयकै जाग्यो बघऊदन जब लाग्यो सबतेकहनहवाल ४५ बलखबुखारे के जैबे को तीनों वीर भये तय्यार ॥ कान्तामल्हू सँग में हैगा चारों चलतभये सरदार ४६ अटक उतरिकै काबुल हैकै पहुँचे बलखबुखारे जाय ॥ शहर पनाहै चौगिर्दा ते बड़बड़महलपरै दिखलाय ४७ साँचे योगी चारो बानिकै पहुँचे शहर बीच में आय ॥ बाजी खँझड़ी तहँ देवा की मकरँद डमरु रहा बजाय ४८ कर इकतारा कान्तामल के ऊदन बाँसुरी रहा बजाय ॥

२० आल्हखण्ड । ३३६ ता ता थेई ता ता थेई थिरकनलाग लहुरवाभाय ४६ टप्पा ठुमरी भजन रेखता धुर्पद सरंगीत कल्यान ॥ राग विहगरो जयजयवन्ती तूरै गजल पर्जपर तान ५० कमर झुकावै भाव बनावै लाला देशराज का लाल ॥ रूप देखिकै तिन योगिन का अबलनसबलखड़ीतहँमाल ५१ कोऊ अँशिया पहिरति आवै जूरा कोऊ सँवारति बाल ॥ कोऊ दुश्ट्टा गलसों ओढै कोऊ चली मोरकी चाल ५२ कोऊ महाउर लिये हाथ में कोऊ चली छाँड़ि कै बाल ॥ कोऊ मेंहदी तजिकै दौरी बौरी भई तहाँपर बाल ५३ ऐसी बंशी प्यारी बाजै राजै ऊदन ओठ विशाल ॥ गाजै छाजै ध्वनि उपराजै लाजैं देखि देखि मनवाल ५४ हेला मेला अलबेला भा ठेला ठेल गैल में भाय ॥ कोऊ चमेला कोऊ बेलाका वारन तेल लगावत जाय ५५ बड़ी भीर भय गलियारन में कहूँ तिलडरा भूमि ना जाय ॥ नचै बँदुला का चढ़वैया आल्हा केर लहुरवा भाय ५६ दावति आयें नृप ड्योढ़ी को चागें रूप शील अधिकाय ॥ जायकै पहुँचे जब फाटकपर बाँदिन भीरभई अतिआय ५७ खबरि सुनाई रनिवासै में रानिन महलन लीनबुलाय ॥ झूठ लफोड़ा अस नाहीं थे जसकुछ आजपरै दिखलाय ५८ तबै जमाना कुछ साँचा था जाँचा चता भाग को जाय ॥ ब्राह्मण साधु न पर परतीती नीती यही सदाकी आय ५६ चलै अनीती तजि रीती जो ताको देश देय धिकार ॥ नृप अभिनन्दन के महलन में योगी पहुँचिगये त्यहिवार ६० कहाँते आयो औ कहँ जैहौ अपनो हाल देउ बतलाय ॥