भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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आल्हानिकासी । ३५६ बाजे डंका अदहंतंका के हाहाकार शब्दगा छाय ५८ आगे आल्हा हैं पपिहापर ऊदन बेंदुलपर असवार ॥ हंसामनि घोड़े के ऊपर इन्दल आल्हाकेर कुमार ५९ आय कै पहुँचे सब मोहबे में मल्हना महल पहुँचे जाय ॥ बड़ी खुशाली सों महरानी आदरभावकीन अधिकाय ६० खबरि पायकै सब रानी फिरि मल्हना महल पहुँचीं आय ॥ रोवनलागीं सब रानी तहँ दारुण बिपतिकहीना जाय६१ मल्हनाबोली फिरि आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय ॥ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है जो अब कूचदेउ करवाय ६२ घाटि न जाना हम ब्रह्मासों चारो आय बनाफरराय ॥ कहा न मानो अब काहूको बैठो धाम आपने जाय ६३ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ अब नहिं रहिबे हम मोहबे माँ माता साँचदीन बतलाय ६४ गऊरक्त सम जलको जानै भोजन गऊमाँस सममान ॥ करै मेहरिया कै संगति जो होवै बहिनी संगसमान ६५ ऐसी बातें महराजा की माता काहगई बौराय ॥ जो हम बिलमैं अब मोहबेमाँ तौ सब क्षत्री धर्म नशाय ६६ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है राखो हमें फेरि जो माय ॥ दर्शन द्वैगे सब मातन के अब हम कूच द्यहूँ करवाय६७ इतना कहिकै ऊदन ठाकुर डोला तुरत लीन मँगवाय ॥ औ ललकारा फिरि माता का अब तुम कूच देउ करवाय ६८ सुनि सुनि बातें उदयसिंह की मल्हना बार बार पछिताय ॥ तुरतै धावन को बुलवायो सिरसागढ़ै दीन पठवाय ६९ लागि कचहरी मलखाने कै धावन वहाँ पहुँचा जाय ॥