भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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कही हकीकति सब आल्हाकी धावन हाथ जोरि शिर नाय ७० सुनिकै बातें धावन मुख की मलखे घोड़ी लीन मँगाय ॥ मल्हना केरे फिरि महलन ते आल्हा कूच दीन करवाय ७१ बाजे डंका अहतंका के कनउज चले बनाफरराय ॥ ब्याकुल रैयत भै गोहबे कै काहू धीर धरा ना जाय ७२ भोजन कीन्ह्यो कोउ तादिनना सोवन रात दीन बिसराय ॥ जहँ तहँ गाथा बघऊदन की घर घर रहे नारिनर गाय ७३ चढ़ा कबूतरी पर मलखाने मारग मिला तुरतही आय ॥ कुशल पूँछिकै आल्हा ठाकुर आपनिकुशलदीन बतलाय ७४ जो कछु भाषा परिमालिक ने आल्हा सत्य सत्य गे गाय ॥ मलखे बोले तब आल्हा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ७५ चलिकै रहिये तुम सिरसा में करिहै काह चँदेलोराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दादा साँच देयँ बतलाय ७६ अब नहिं टिकिहैं हम सिरसा में चहु तुम कोटिनकरो उपाय ॥ राज्य छोड़िकै परिमालिक की जयचँद पुरी जायँ हम भाय ७७ जब सुधिआवै नृप बातन कै तब मन पीर होय अधिकाय ॥ बात के मारे जो मरिहै ना मरिहै काह लात के घाय ७८ आज तो घोड़ा पिरथी मांगा काल्हिको तिरिया लेत मँगाय ॥ यहु मर्दाना को बाना ना आपन घोड़ देयँ पठवाय ७६ इतना सुनिकै मलखे बोले मानो कही बनाफरराय ॥ सयन चिरैया ना घर छोड़ै नाव निजराव निजको जाय ८० अस गति नाहीं है पिरथी की तुम्हरे घोड़ लेयँ मँगवाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर बोले फेरि बचन समुझाय ८१ लिखी विधाता की मिटिहैना सिरसा लौटिजाउ मलखान ॥