आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हानिकासी । ३६१ ६ काह हकीकतिहै मानुष के सुख दुख देनहार भगवान ८२ बातें सुनिकै ये आल्हा की मलखे ठीक लीन ठहराय ॥ क्यहु समुझायेते मनिहैं ना आल्हाउदयसिंह दोउ भाय ८३ मिला भेंट करि सब काहू सों मलखे कूच दीन करवाय ॥ जायकै पहुंचे सिरसागढ़ में महलन खबरि बताई जाय ८४ नदी बेतवा को उतरत भे दूनों भाय बनाफरराय ॥ ढाई दिनके फिरि अर्सा में झावर गये बनाफर आय ८५ बिजुली चमकै कउँधा लपकै कहुँ कहुँ मेघ रहे गहराय ॥ मेढ़ुक बोलैं चौगिर्दा ते वीछी साँपनकी अधिकाय ८६ नचैं मुरैला कहुँ जंगल में झींगुर कहुं करैं झनकार ॥ किह्यो बसेरा तटयमुना के नाहर उदयसिंह त्यहिबार ८७ बनी रसोई रजपूतन की सबहिन जेंव लीन ज्यौनार ॥ भोर भुरहरे मुर्गा बोलत उतरे घाट कालपी क्यार ८८ तहँते चलिकै परडुल पहुंचे दूनों भाय बनाफरराय ॥ दिना द्वैक रहि त्यहि थान में तहँते कूच दीन करवाय ८९ जायकै पहुँचे अस .... में जहँ पानीको कष्टाय ॥ इन्दल बेंदुल दोउ प्यासे भे इनके ..... । ११० रहा न बीरा तहँ पानन का जो बनाफरराय ॥ ताकि व्यविरया इन्दल बेंदुल पानी .... ल्हुरवाभाय ११५ आधा पानी आधी माटी जाब तिन्हैं लीन लुटवाय ॥ हाय मुसीबत अस परिगैहै सेहुको अन्नदीन छिरकाय ११६ सुनवाँ रोई त्यहि समया में बुताफलहू दीन चलाय ॥ फाटै छाती नहिं द्यावलि कै चिं वापू रहे मचाय ११७ आल्हा सोचैं त्यहि समया में ऊदन छप्पर दीन गिराइ ॥