आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 618 में से
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१२ आल्हखण्ड । ३६४ तेलि तँबोली कलवारन की दुर्गति भई तहांपर आय ११८ लैलै टेंटुवा बनियां चलिभे मनमें बार बार पछिताय ॥ हाय रुपैया बैरी द्वैगा ह्वाँ अबगई प्राणपर आय ११६ भा खलभल्ला औ हल्ला अति पहुंचे बहुत राज दरबार ॥ रोय रोयकै बनियाँ बोलै राजन मानो कही हमार १२० अजयपाल औ रतीभान भे एकते एक शूर सरदार ॥ ऐसि दुर्दशा भै कबहूंना जैसी भई आय यहिवार १२१ ऊदन आये मोहबे वाले तिन सब लीन बजारलुटाय ॥ इतना सुनिकै जयचँद राजा लाखनिरानालीनबुलाय १२२ कहि समुझावा लखराना को तोपन आगिदेउ लगवाये ॥ सुनिकै बातें महराजा की लाखनिचला शीशकोनाय १२३ सवैया ॥ चर्खन में सब तोप चढ़ाय औ फौज तयार कियो लखराना । बाजत डंक निशंक तहाँ औ यथा घन सावन को गहराना ॥ विज्जु छटासों कटा करवे कहँ चमकत खड्ग तहाँ मरदाना । मौहर बाजत हाव किये लखिते यह भाव न जात बखाना १२४ भई तयारी समरभूमि की छत्रिनबांधि लीन हथियार ॥ मीराताल्हन बनरस वाला पहुंचा तबै राजदरबार १२५ किह्यो बन्दगी महराजा को औ यह हाल कह्योसमुझाय ॥ गरि मचायो नहिं कनउज में आल्हाऊदन लेउ बसाय १२६ मोर्चा फेरा इन पिरथी त द्वारे हाथी दीन पछार ॥ बड़े लड़ैया द्यावलिवाले इनसे हारि गई तलवार १२७ जयचंद बोले तब सय्यद ते नाहर बनरस के सरदार ॥